मंडली

मेरी करियट्ठी

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माँ रोटी बनाना बंद कर फ़ोन कान से लगाए काफ़ी देर सुनती रहीं। पल-पल बदलते चेहरे के रंग और बेचैनी के बीच आँखों ने बाँध तोड़ दिया और बरस पड़ीं। दोनों बहनें खाना भूल माँ को एकटक देख रही थीं।

“क्या हुआ माँ? चाचा जी ने क्या कहा?”, छुटकी ने पूछा।

“कुछ नहीं”, वह रोए जा रहीं थीं।

“बोलो ना माँ!” बड़की बोली।

“अगले हफ़्ते गाँव आ रहे हैं।”

“तुम रो क्यों रही हो?”

“मैंने कहा ना, कुछ नहीं!” माँ के चिल्लाते ही दोनों चुपचाप उठकर चलती बनी।

माँ, बड़की और छुटकी तीनों की वो रात एक-दूसरे से अपनी तकलीफ़ छुपाने में ही बीती। दोनों बहनें हैरान थीं कि आखिर हुआ क्या है। अगले दिन माँ ने मुस्कुराते हुए रोज़ की तरह सिर पर हाथ फेर जगाया तो दोनों माँ से लिपट गईं। बड़की बारहवीं के बाद प्राइवेट ही पढ़ते हुए ही स्कूल में पढ़ाने जाती। बिना कहे परिवार की ज़िम्मेदारी उठा ली थी। छुटकी ग्वारहवीं में पढ़ती और मस्त रहती।

उस दिन दुपहरिया में लौटने पर माँ और बगल की मामी को तैयार होकर बैठे देख बड़की थोड़ा हैरान हुई।

“कहाँ जा रही हो माँ?” घर में घुसते ही बोली।

“चल तू भी, कुछ काम है।”

“पर ट्यूशन के बच्चे?”

“छुटकी देख लेगी, तू चल!”

माँ और मामी के साथ रिक्शे पर बैठ रवाना हुई और रिक्शा रुका ‘रवि स्टूडियो’ के सामने।

“मामी! कितनी फोटो खिंचवाएंगी?”

मामी मुस्कुरा के रह गईं।

अंदर जाकर मामी ने बड़की को एक थैला देते हुए कपड़ा बदलने को कहा।

लाल चटक बनारसी साड़ी थी, मैचिंग के पेटीकोट और ब्लाउज व साथ थोड़े गहने भी।

“ये क्यों?” बड़की हैरान थी।

“बिना प्रश्न किए पहन लो”, माँ सख़्त लहजे में बोली।

“हम नहीं पहनने वाले, सुन लो”, अनहोनी की आशंका के बीच ही बड़की चिल्ला कर बोली। तभी माँ का झन्नाटेदार थप्पड़ उसके दायें गाल पर पड़ा। वह सहम गई।

मामी ने माँ को पकड़ लिया, “क्या करती हो जिज्जी!”

बड़की तिलमिला उठी, “जान ले लो पर ब्याह वाली फोटो नहीं खिंचवाएंगे।”

माँ ने आखिरी दाँव लगा ही दिया, “तो हमारा मरा मुँह देखना।”

सारी दुनिया एक ओर माँ की कसम एक ओर! बड़की ने रोते-रोते कपड़े बदले, मामी ने साड़ी पहना दी। स्टूडियो वाले ने मुड्डी सीधी करने को कहा तो सारा गुस्सा उसी पर निकाल आई और साथ ही ‘लइकी बड़का झगड़ाहिन बिया’ का ख़िताब भी मिल गया।

उस रोज़ उसने माँ से बात नहीं की। हर बार की तरह माँ ही उसे मनाने आईं पर उसके और छुटकी के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। स्कूल, ट्यूशन और पढ़ाई के बीच बँटी बड़की को घरेलू बातों के लिए वक्त नहीं था? वह सबकुछ भूल गई।

हफ़्ता गुज़रा। दूसरे शहर रहने वाले चाचा, चाची और साथ में चाची की अम्मा पधार गए। छोटे से घर में असुविधा तो थी पर माँ सब संभाल लेती थी। सात साल की उम्र में पिता जी की अचानक हुई मृत्यु के बाद चाचा जी ही संरक्षक थे। इन्हीं चाचा की मदद से वह बारहवीं तक पढ़ सकी थी पर अब वो अपने परिवार में व्यस्त थे।छुटकी की पढ़ाई और माँ की दवाई से लेकर सारे खर्च बड़की के कंधों पर ही था लेकिन बचपन में पड़े चाचा जी के थप्पड़ों का इतना डर उसके भीतर बैठा था कि वो आज भी उनके सामने ‘हाँ…,हूँ’ के अलावा कुछ भी बोल नहीं पाती, वो भी नज़र नीची किए।

उस दिन स्कूल से आने पर माँ ने कहा कि ट्यूशन की छुट्टी कर दो, चाचा जी कोई ज़रूरी बात करेंगे। बड़की को बात माननी पड़ी। शाम को चाचा जी, नानी पलंग पर बैठे, नीचे दरी पर माँ और चाची।  बड़की को बुलाया गया, वह माँ के पास बैठ गई।

“यहाँ आओ! हमारे पास बैठो” नानी बड़े प्यार से बोलीं।

माँ का इशारा पाकर वह सिर झुकाए नानी की बगल बैठ गई।

“तुम समझदार हो। स्थिति समझती हो, तो मैं सीधे मुद्दे पर आती हूँ।” नानी बहाव में बोले जा रहीं थीं।

“तुमसे छोटी एक बहन है, तुम्हारे चाचा की भी दो बेटियाँ और एक बेटा। इन सबकी ज़िम्मेदारी चाचा पर ही है। क्यों ना धीरे धीरे इसे पूरा किया जाए। अररिया, बिहार में एक लड़का है। वह तुम्हारी फोटो देख तुमसे ब्याह करने को तैयार है। कल सुबह वहाँ के लिए निकलना है।”

बाड़े में बंद बछिया सी बड़की ने माँ की ओर देखा। माँ ने झट सिर नीचे कर आँसू छुपा लिए।

नानी शुरू हुईं पर इस बार माँ से मुखातिब थीं,”देखो भाई! लड़का लाखों में एक है पर चाँद पर भी दाग है। उम्र में थोड़ा बड़ा है। यही कोई अड़तीस के करीब पर देखने में एकदम जवान।  पहली बीवी टायफाइड से गुज़र गई, तीन बेटे हैं, खेती बाड़ी, रुपया पैसा की भरमार है। अरे वो तो ब्याह को तैयार नहीं था। इस बार प्रधानी की पूरी तैयारी थी लेकिन गाँव में महिला सीट आ गई, इसीलिए ब्याह को तैयार हुआ। अपनी बड़की जाते ही प्रधान बनेगी, राज करेगी राज। छुटकी को भी वही पार लगा देंगे और तुम गंगा नहाओगी।”

माँ ने बड़की को देखा, वह सिर झुकाए बैठी रही। तभी चाची की आवाज आई, “दीदी! इसमें कोई बुराई नहीं है, वहीं जाकर मंदिर में ब्याह कर आएंगे, कल देखा देखी कर लेते हैं।”

“अभी अठारह की भी नहीं हुई है, लड़का बड़ा नहीं?” माँ दबी आवाज़ में बोली।

“लड़कों की उमर कौन देखता है पागल! जा त ही बढ़िया खाएगी, पहनेगी तो ये भी भर जाएगी।”

“मुझे तो सही लग रहा है, लड़की सुखी रहेगी। फिर और भी तो लड़कियों को निपटाना है।”

चाचा जी की आखिरी पंक्ति ने बड़की के सब्र को तोड़ दिया!

बेटियाँ “निपटाने” के लिए ही जन्म लेती हैं?

उसे साँस लेना दूभर हो रहा था, वह उठ कर छत पर आ गई।

छुटकी ने पूछा,”क्या हुआ?”

“कुछ भी नहीं!”

रात को माँ ने बोला कि सुबह तैयार हो जाना, अररिया चलना है।

सारी रात बड़की ख़ुद से जूझती रही, मेरे बाद छुटकी को भी ‘निपटाया’ जाएगा। बेटी होना अभिशाप है? ईश्वर ने उसे जन्म ही क्यों दिया? जिन खंभों को सहारा मान रही थी, वो खोखले निकले! रोते रोते कब आँख लग गई,पता ही नहीं चला!

माँ की आवाज़ पर उठी,”छ बज गए, तैयार हो जा, आठ बजे गाड़ी आएगी।”

“माँ! मैं कहीं नहीं जाऊंगी।”

“क्या दिक्कत है?” चाचा जी थे!

“अभी ब्याह नहीं करना।”

“क्यों?”

“मुझे पढ़ना है, पैसा कमाना है!”

“बहुत पैसा वाला घर है।”

“पर मुझे अपनी मेहनत से कमाना है।”

पहली बार बड़की ने इस हिम्मत से बात की थी, उसकी आवाज़ में विद्रोह के साथ आत्मविश्वास भी था।

तभी नानी बोल पड़ी,”पक्का रंग पाई हो, ना कद ना काठी, ना गुन ना गिहथान। सौ गाँव चप्पल रगड़ के भी ऐसा लड़का ना मिलेगा। रुपया पैसा भी इतना नहीं कि किसी का मुँह बंद करोगी, कहाँ ठिकाना होगा?”

बड़की को अपने रंग रूप के बारे में ये सब सुनने की आदत हो चुकी थी। फिर भी उसे अपने भीतर कुछ टूटता महसूस हुआ कि माँ की आवाज़ आई, “बस करो अम्मा! जिस छत के नीचे खड़ी हो, वो उसी के पैसे पर टिकी है। मेरी बेटी दुनिया की सबसे सुंदर लड़की है। पैसा कम कमाती है पर इज़्ज़त बहुत, पूछ लेना मोहल्ले में। और हाँ मेरा गुरूर हैं मेरी बेटियाँ….उसने ना कहा तो ना ही समझो।”

सब अपनी धुन में बड़बड़ाते रहे…..

“माँ! चाचा जी को कद्दू की सब्ज़ी और पूड़ी पसंद है, खिला कर विदा करना।”

कहते हुए बड़की बैग उठा स्कूल बस के लिए बस स्टैंड की ओर भागी। उसे लगा कि उसके पंख लग गए हैं। तभी माँ की आवाज़ आई….

“तू टिफिन भूल गई”

“याद नहीं रहा”

“माँ, तुमने कल ही क्यों नहीं मना किया”

“तो तू कब लड़ना सीखती, मेरी करियट्ठी”

पीछे खड़ी छुटकी की खिलखिलाहट से तीनों हँस पड़ीं …

लेखिका कहानियाँ, संस्मरण और कविताएँ लिखती हैं। इनकी कहानियाँ कभी मर्म उकेरती हैं, कभी इनसे मृदुल भावनाएँ टपकती है और कभी पलकें भिंगोने वाली करुणा। उनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखिका पेशे से शिक्षिका होते हुए भी एक कुशल गृहिणी हैं।

8 thoughts on “मेरी करियट्ठी

  1. Garima! Is my pride.
    Her writings are too deep and relevant. I wish Garima and Mandali the best of luck.
    Too touched me can relate totally.

    Thank You Garima!!
    Mahadev Grace you.

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