मेरी गर्लफेंड: भाग-12 – मंडली
मंडली

मेरी गर्लफेंड: भाग-12

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गतांक से आगे…

पूजा के जाते ही रुचि ने मुझे कहा, “वह लड़की कपिल की नहीं तुम्हारी गर्लफ्रैंड थी ना? मैंने आते ही कंप्यूटर वाल पर तुम दोनों की फ़ोटो देख ली थी। मुझे नहीं पता था तुम्हारे मन में क्या है, इसलिए मैंने उसे नहीं रोका। एक बात बताओ, क्या वह तुम्हें नहीं चाहती? वरना मुझसे लड़ने के बजाए झूठ बोलकर क्यों जाती?”

पता नहीं! ऐसे मामलों में उसे अनएक्सपेक्टेड हरकतें करने की आदत है। ख़ैर, तुम जाओ। मैं अपना मूड ठीक करता हूँ। 

क्यों? एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हो कि अपनी रिलेशनशिप में तुम खुश नहीं हो और उसे प्यार नहीं करते?

देखो रुचि, हमारा प्यार आजकल के टाइम वाला नहीं है। कुछ भी हो जाए पर वह मुझे छोड़ नहीं सकती। मैंने उससे हमेशा प्यार किया है और हमेशा करूँगा और मैं चाहूँ भी उसे छोड़ना तो यह मेरे बस में नहीं है। 

तो मुझे खाने पर बुलाकर कौन सी रिसर्च करनी थी? 

देखा? यह फर्क है उसमें और तुम नॉर्मल लड़कियों में। छोटी-मोटी बातों पर वह कभी गुस्सा भी नहीं होती है। मैं उसे मना लूँगा और वह मान जाएगी।

‘साले पागल’ कहकर रुचि कमरे के साथ-साथ मेरी ज़िंदगी के पन्नों से भी चली गयी। पूजा को छोड़कर कपिल वापस कमरे पर आ गया। उसकी आँखें मुझे ‘यह क्या था बे’ पूछ रहीं थीं। मैंने पूजा के बारे में पूछा तो उसने बताया, “पूजा थोड़ी देर रोयी, मैंने उसे पूछा कि उसने रुचि के सामने झूठ क्यों बोला तो उसने कहा कि मैं कुछ टाइम के लिए रोहित के पास नहीं थी, यह हो सकता है कि उसे कोई और पसंद आ गया हो। 

मुझे यह सुनकर बहुत बुरा लगा और मैंने बड़बड़ाना शुरू किया, “उसको पता ही नहीं है कि मैं उसे कितना प्यार करता हूँ। वह ऐसा कैसे बोल सकती है।” कपिल ने कहा “भाई मैं तुम दोनों को अच्छे से जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि तुम दोनों प्यार में है पर तुम्हारा प्यार उसके प्यार से बहुत अलग है।’

कुछ देर बार मैंने माँ को फ़ोन कर अपनी कुंडली माँगी। पूजा की तरफ़ के पंडित जी ने हमारे नाम के पहले अक्षर से हमारे साढ़े सत्ताईस गुण मिलाए थे, कुंडली-मिलान बाकी था। मेरी माँ मेरी पिटाई वाली बात से अब तक बहुत नाराज़ थीं। उनका कहना था कि साले से पिट कर उस घर में मुझे सच मे कभी इज़्ज़त नहीं मिलेगी। माँ की इन बातों को इग्नोर करते हुए मैंने कुंडली माँगकर पूजा के घर भिजवा दी।

मैंने पूजा को मैसेज करके मिलने के लिए बोला। उसने अपने होस्टल के बाहर बुला लिया। मैं पूजा का सामना करने के लिए माफ़ी के साथ तैयार था। मेरे सामने आते ही पूजा ने एक-दो बातें कहीं जिन पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया, चेहरे पर अटका था। उसकी आँखें औऱ नाक सूजी हुई थीं। शायद कई दिनों तक वह बहुत रोयी थी। मेरे कानों ने उसकी जिस बात पर गौर किया वह थी – मैं तुमसे अलग होना चाहती हूँ। मेरे कानों में सनसनाहट सी हो गयी। मैंने उसे अपनी गलती एक्सप्लेन करने की कोशिश की और फिर टौंट किया कि क्या दिल्ली में उसे कोई और मिल गया है। इन बातों पर भी जब वह नहीं पिघली तो मैं उसके पैरों पर बैठ गया। उसने मुझे समझाने की कोशिश की पर मेरे मुँह से बस इतना निकला, “पूजा तुम्हारे बग़ैर मुझसे मेरी ज़िंदगी इमैजिन नहीं हो रही है।”

वह हिम्मत करके मुझे हमारे रिलेशनशिप के बारे में बता रही थी पर मुझे यह बात परेशान कर रही थी कि मुझे रोता देखकर उसको बातें कैसे आ रही हैं। उसने अविनाश भैया का नाम भी लिया। एक पल में मुझे लगा कि मेरे पास प्यार, पूजा का फ्यूचर में साथ और बिताया गया अतीत, कुछ भी नहीं था मेरे पास। मैंने अविनाश भैया के नाम पर गौर करते हुए पूछा, “अब मुझे छोड़कर जा ही रही हो तो एक बात दो कि अविनाश भैया से प्यार करती थी क्या?” उसने इस बात पर बस मुझे थप्पड़ मारने से ही छोड़ा होगा और शांत होते हुए कहा, “तब मुझे तुमसे भी प्यार नहीं था पर सर के जाने से मुझे एक बात समझ आ गयी थी कि जो भी इंसान ज़िंदगी में हो उसे बहुत प्यार करो और उसका खूब साथ दो क्योंकि लोग ज़िंदगी में और दुनिया में हमेशा के लिए नहीं होते हैं। तुम अच्छे इंसान लगे और समय के साथ मुझे तुमसे प्यार भी हुआ। इसलिए मैंने तुम्हारी बहुत सारी गलतियाँ भी इग्नोर कीं, पर तुम इससे ज़्यादा प्यार और साथ डिज़र्व नहीं करते हो। हम चाहे दो दिन साथ और दस साल अलग रहें, प्यार मन में ही रहता है कहीं चला नहीं जाता। इसलिए दुबारा तुम्हें मेरे प्यार और मुझपे शक करने का मौका नहीं दूंगी।” 

वापस कमरे पर आया तो सोचने लगा कि उसे कैसी लाइफ चाहिए और मैं उसे कैसी लाइफ दूँगा। दिल्ली में पढ़ाई के बाद पूजा वहीं जॉब चाहेगी और वहाँ मैं उसके साथ रहकर क्या करूँगा? और उसके साथ रहकर छोटा-मोटा काम धंधा करता भी तो माँ-बाप को मेरे साथ रहने को कैसे तैयार करूँगा। बहुत सारी बातें सोचकर खुद को नीचा दिखाने की कोशिश की पर एक बार भी उससे अलग होने का मन नहीं माना। काफी सोचने के बाद मैंने पूजा को टेक्स्ट किया कि घरवालों को भी वह ही मैसेज करके हमारे अलग होने की बात बता दे। साथ ही मैंने अपनी माँ और उसकी फैमिली को मैंने कानपुर बुला लिया।

घरवालों के सामने हम दोनों ने कोई बात नहीं की। मैंने मेरी माँ को आने से पहले ज़रूर बता दिया था कि पूजा अलग होना चाहती है। मेरी माँ पूजा से चिढ़ी हुई थीं। सबके साथ बैठने पर माँ ने बातों ही बातों में कह दिया, “रोहित को तो बहुत अच्छे-अच्छे रिश्ते आ रहे हैं। बहुत पैसे वालों के घरों से और लड़कियाँ भी बहुत सुंदर पर इसका मन पूजा में लगा है। लोग चौहान खानदान की बहुत इज़्ज़त करते हैं।” इतना कहना ही था कि पूजा के पिता जी ने बताया कि उनकी सबकास्ट भी चौहान ही है। नाम के साथ हम दोनों ने कभी टाइटल नहीं लिखा। तुरन्त मेरी माँ ने कहा कि फिर ये शादी तो नहीं हो सकती। मैंने माँ से कारण पूछा और उन्होंने सबके सामने चिल्लाकर कहा, “अपनी बहन से शादी कर लेगा?”

एक जात और गोत्र के लड़का-लड़की भाई बहन होते हैं। हमारे यहाँ ऐसी शादी नहीं होती। पूजा ने तेज़ आवाज़ में माँ की बात दबाते हुए कहा, “गोत्र क्या है आपका?” माँ ने जवाब नहीं दिया। पूजा ने कहा कि अगर भाई बहन ही हैं तो हम दोनो कभी किसी और से शादी नहीं करेंगे। माँ ने पलटकर पूजा को डाँटने की कोशिश की, “अब तक मेरे बेटे से तुम खुद अलग होना चाहती थी। फिर ये नाटक क्यों कर रही हो?” पूजा ने जवाब दिया, “क्योंकि शादी करना या नहीं करना रोहित का और मेरा फैसला होगा, किसी के नहीं चाहने से शादी नहीं रुक जाएगी। आप अपना गोत्र बताओ? हम मैनपुरी चौहान हैं, आप तो नहीं हैं?

अट्ठाइसा हैं क्या?” 

माँ ने उस वक़्त कुछ नहीं बोला और पूजा का परिवार वापस चला गया। मैं माँ को समझा रहा था कि पूजा गुस्सैल नहीं है बल्कि बहुत समझदार लड़की है। मैंने बताया कि मेरी ही गलती के कारण ही वह मुझे छोड़ कर जाने वाली थी। माँ के चेहरे से मैंने पढ़ किया कि गोत्र एक नहीं है। वह बहुत गुस्से में थीं, इसलिए मैंने मामा से अपना गोत्र पूछकर पूजा की फैमिली को बता दिया। 

आगे क्या हुआ? तब का छोड़कर अभी का बता देता हूँ। घर के पिछले कमरे में बैठकर इस कहानी का अंतिम हिस्सा लिख रहा हूँ। मेरी बेटी बीच-बीच में पायल छनकाती हुई मेरा माइंड डाइवर्ट करती है। कुछ देर उसके साथ खेलता हूँ। फिर अपनी कहानी लिखने आ जाता हूँ। माँ और बीवी की कुछ खास नहीं बनती। एक बार रिश्तेदारों के सामने माँ ने कहा, “मेरी बहु के हाथ का खाना बहुत अच्छा होता है। मैं तो उसी से खाना बनवाती हूँ, चाहे वह ऑफिस जैसे भी मैनेज करे।” “हाँ! और माँ के हाथ से मँजे बर्तन बहुत चमकते हैं।”, बीवी ने हाज़िरजवाबी में कह दिया। बीवी कभी-कभी जब सो रही होती है तो माँ बिना चिमनी ऑन किये मिर्च छौंक देती हैं। मैंने दोनों के बीच अपना कोई स्टैंड नहीं रखा है क्योंकि दोनों मुझे बहुत प्यारे हैं।

समय के साथ बहुत समझदार भी हो गया हूँ, ऐसा मेरी बीवी मानती है। पूजा जैसा बॉयफ्रेंड मुझमें चाहती थी, वैसा पति बन गया हूँ। पुरानी बातें याद करता हूँ तो हँसी आती है। एफएमसीजी कंपनी में काम करता हूँ। दिल्ली के प्रदूषण में जी रहा हूँ। कानपुर रहकर गुंडा बनकर भी क्या कर लेता। कपिल से अभी भी कनेक्ट है पर यह लाइफ बेस्ट है। ख़ैर, अपनी कहानी लिखना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। इस समझदारी में अपना बचकानापन, पूजा का प्यार और अपनापन भूलना नहीं चाहता था। बीवी बहुत अच्छी है पर गर्लफ़्रेंड को भूल नहीं सकता, बीवी बनाकर भी नहीं।

समाप्त

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