मंडली

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-11

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… गतांक से आगे

मेरी वजह से पूजा का करियर ख़राब हो जाएगा, ऐसा सोचकर मैं मन ही मन शर्म के गड्ढे में ख़ुद को घुसाकर पूजा की नफ़रत की मिट्टी से दफ़न होने के इंतजार में था। ज़ाहिर था इस बार वह बहुत नाराज़ होगी पर मेरे अजीब बिहेवियर से वह इस कन्फ्यूजन में थी कि मैं उसे क्यों इग्नोर कर रहा हूँ। पर मैं किस मुंह से बात करता? मन में यही लग रहा था कि पूजा अभी तक मुझे गुंडा, निकम्मा तो सोचती ही थी, अब ‘पैसा खा गया’ भी उन बुराइयों में जुड़ गयी। कभी-कभी मुझे लगता था कि प्यार के नाम पर मैं किसी बोझ की तरह उस पर बैठ गया हूँ। ताज्जुब था कि मेरे लाख कुकर्मों को देखकर भी पूजा अनदेखा कर देती थी। कभी खुल कर अपने मन की बातें भी नहीं करती थी या शायद मैं ही सुनने के मूड में नहीं होता था। मुझे आइडियल पार्टनर होना समझ नहीं आता था और कई बार मैं अच्छा करने के इरादे से बुरा कर देता था। मैं यह भी चाहता था कि पूजा इस बार भी मुझे माफ़ कर दे। कुछ भी हो मैंने अपनी लव स्टोरी में पूजा जैसी लड़की चाही थी पर ऐसी कहानी नहीं जिसमें मैं हीरो कम और नल्ला ज़्यादा लगूँ। 

एक दिन शाम को राजेश बेकरी पर खड़ा साथ के लड़कों से बातें कर रहा था। दो लड़कियाँ पास की टेबल पर बैठी मुझे घूर रही थीं। उनमे से एक ने मुझे स्माइल भी दी। मैं मुँह घुमाकर खड़ा हो गया। फ़ोन की घंटी बजी, पूजा का फ़ोन था। मेरे हांथ कांप रहे थे और फ़ोन स्क्रीन पर पूजा का नाम पढ़कर चेहरा एकदम लाल हो चुका था।  पूजा ने मुझे राधा कृष्ण मंदिर में मिलने को कहा। मैं मंदिर जा पहुंचा और हम मंदिर के बगल बने पार्क में बैठ गए। उसने पूछा,” बात क्यों नहीं कर रहे हो? मेरा कॉलेज में सीट रजिस्ट्रेशन हुआ या नहीं यह तक नहीं पूछा?” मैंने कहा,”हिम्मत नहीं हुई मुझे, मन कर रहा है कि मर जाऊँ।” उसने कहा,” ऐसे मत बोलो और परेशान भी मत हो। घर पर मैंने यह बता दिया था और मेरा भाई पैसे लेकर आ गया था।” अब मेरा दिमाग़ यह सोच कर खराब हो रहा था कि बैंक बन्द थी तो मुझे दिल्ली जाने की बात दिमाग मे क्यों नहीं आयी। मैं सर झुकाए बैठा ही था कि उसने आगे कहा, “तुम मेरे मामलों में कितनी जल्दी हार मान लेते हो ना।” मुझे यह बात गोली जैसी चुभ गयी। मन में आया कि कह दूँ कि बस तुम्हारे मामले में ही हार नहीं मानता पर जाने दिया। मैंने उससे एडमिशन और क्लासेज की डेट्स के बारे में पूछा। उसने बताया कि अभी थोड़ा सा टाइम है। 

मैंने देर रात माँ को फ़ोन करके जल्द से जल्द शादी कराने की बात कही। इस बात से यह भी जानना था कि कहीं पूजा या उसकी फैमिली का विचार तो नहीं बदल गया। अगली सुबह मैं रिचार्ज शॉप पर गया वहाँ बेकरी वाली लड़की दिखी। उसने फ़िर से स्माइल की और मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। मेरे पास चेंज रुपए नहीं थे तो उसने अपने पास से कुछ  रुपए मुझे चेंज कर दिए और एक दस की नोट अलग से पकड़ायी। मैं जोड़ घटाव नहीं कर पाया और झटपट वापस रूम पर आ गया। कपिल कुछ खटर-पटर वाला काम कर रहा था, ऊपर से मुझे सर दर्द था। कुछ देर बाद मैंने उसे 10 रुपये देकर डिस्प्रिन लाने को कहा। वह मेडिसिन लेने गया और वापस आया। उसने मुझे नोट पर लिखा एक नंबर दिखाया। मैं समझ तो गया पर उस वक़्त मैंने वह नोट अपनी जेब मे रख लिया। दवा लेकर सोने की कोशिश की, नींद नहीं आयी तो पूजा को एक लंबा टेक्स्ट किया जिसमें मैंने उसका मेरी लाइफ में होने के मायने लिखे। कुछ शिकायतें भी लिखी। यह भी लिखा कि पैसे वापस ले ले और तुरंत शादी करने की तैयारियां शुरू कर दे क्योंकि अब मुझे उसे खोने का डर लगने लगा था। उसने कुछ देर बाद टेक्स्ट किया,”स्ट्रेस मत लो।” मुझे हर बार की तरह इस बार भी उसकी कही बात में ना खुशी दिखी और ना ही नाराज़गी। 

मैं बेड पर लेटा लेटा यह सोचने लगा कि उस अनजान लड़की ने मुझे अपना नम्बर क्यों दिया। और क्या मैं उसे फ़ोन करके समझा दूँ कि मुझे किसी से सच्चा प्यार है। फिर लगा जाने देते हैं, अनजान लड़की से भला क्या बातचीत करूँ। कुछ सोचकर माँ को फ़ोन लगाया। उन्होंने बताया कि इसी संडे पूजा के घर जाने का प्लान है, बात हो गयी है छोटा मोटा फंक्शन रख लिया जाएगा और बाकी तिलक और शादी डेट्स भी निकलवा देंगे। 

संडे को हम पूजा के घर गए और उसके पूरे परिवार से मिले। सब बहुत खुश थे। पूजा का भाई मिला और उसने सबके सामने मुझे पीटने का अफ़सोस जताया। मेरी माँ को यह पीटने वाली बात अच्छी नहीं लगी। यह पहली बार था जब उन्होंने पूजा से मुँह बना लिया था। पूजा के माँ और पिता जी बहुत अच्छे इंसान लगे। वहाँ पर सभी बातों में सिर्फ पूजा की तारीफ होती रही। मेरी माँ ने एक दो बार मेरा और मेरी खूबसूरती का ज़िक्र किया पर किसी ने इंटरेस्ट नहीं लिया। मुझे इन सब बातों में मन नहीं लग रहा था तो मैं उसके भाई के साथ घर के बाहर आ गया। फ़ोन में कुछ न होकर भी कुछ देखने की कोशिश कर रहा था। अचानक उस अनजान लड़की का नंम्बर दिखा। मैंने बिना दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर दिए हुए लिख दिया,”मेरे नोट पर आपका नंम्बर रह गया था।” कुछ सेकेंड्स बीते ही थे कि वापस टेक्स्ट आ गया,”नंम्बर की गलती नहीं, आप है ही इतने अच्छे।” मैंने स्माइल की और वापस घर के अंदर चला गया। अब मूड ठीक था। पूजा को आज एक अलग इंसान की नज़र से ऑब्ज़र्व कर रहा था। उसकी हँसी, लोगों को ग्रीट करने का तरीका और बीच बीच मे मुझे देखने का भी, सब बढ़िया लग रहा था। डेट्स फाइनल हुई और छोटे मोटे गिफ्ट्स एक्सचेंज करके हम वापस आ गए। रास्ते में रह रह कर उस लड़की से भी बातें हुईं। पूजा को दो दिन बाद वापस कानपुर आकर हॉस्टल छोड़ना था। 

रूम पर पहुँचकर मैंने कपिल को अनजान लड़की वाली बात बता दी। यह भी बताया कि मैं उसे कितना अच्छा लगता हूँ ऐसी बातें मैंने पूजा से अपने लिए हमेशा एक्सपेक्ट कीं, ख़ैर…। अभी सोचता हूँ तो लगता है कि मुझे उस लड़की की बाते सिर्फ़ इसलिए अच्छी लगती थी क्योंकि हर दूसरे सेन्टेंस में मेरी तारीफ़ होती थी। मुझमें इतनी अच्छाइयाँ हैं या नहीं, यह मैं भूल चुका था। कपिल ने पूजा को कभी बहुत पसंद नहीं किया पर उसको मेरा उस लड़की से बात करना पसंद नहीं आ रहा था। एक बार तो उसने चिढ़कर मुझे कह दिया कि ‘भाई ये लड़की तारीफ करके आपको बेवकूफ बना रही है। इसके बाद मुझे उसकी बातें कपिल से करना ठीक नहीं लगा। बातों ही बातों में उसने बताया कि वह खाना अच्छा बनाती है। ज़ाहिर जवाब सोचकर मैंने भी लिखा, “खिलाओ कभी। जहाँ मैं रहता हूँ दो कमरे हैं, किचन है। जब चाहे आकर खाना बना सकती हो। उसने ठिठकते हुए कहा,”अपने घर से बना लाऊँगी, बस मान लेना कि मैंने ही बनाया है।” मैंने उसे सफाई देते हुए कहा कि उसे शर्मिंदा करने का इरादा नहीं था। सच बताऊँ तो मेरे मन मे कोई चोर नहीं था मैं बस देखना चाहता था कि सामने से वो मेरी तारीफ भरी बातें करती हुई कैसी लगती है। यह भी देखना चाहता था कि बातें करते वक़्त उसकी आंखों में सच्चाई होती है या नहीं। क्यों? यह पता नहीं। 

अगले दिन दोपहर को उसके रूम पर आने का प्लान बना। कपिल को अजीब ना लगे इसलिए मैंने उसे बोल दिया कि दोपहर को पूजा कमरे पर आएगी। वह कुछ काम से स्वरूप नगर निकल गया। दोपहर को वो लड़की कमरे पर आयी। हमने साथ मे खाना खाया और खूब बातें की। मुझे ज़रा सा भी ऑड नहीं लगा। चार साढ़े चार बजे तो मैंने चाय पीने की इच्छा जतायी। ‘रुचि’ किचन में चाय बनाने चली गयी। एकदम से बाइक की आवाज़ आयी तो मुझे लगा कपिल वापस आ गया है। कदमों की आवाज़ पास आते सुनकर मैंने भीतर से ही बोल दिया कि पीछे वाले कमरे में आ जाओ, इधर पूजा है। बाहर से आवाज़ आयी,”अबे पूजा हमको झकरकटी बस अड्डे पर मिली, दरवाज़ा खोलो।” मैंने सकपकाकर दरवाज़ा खोल दिया। सामने देखा तो पूजा थी और कपिल साइड में बाइक खड़ी कर रहा था। पूजा ने अंदर आते ही बैग बेड पर फेंका और पानी लेने किचन की ओर चल दी जहां ‘रुचि’ चाय बना रही थी। पूजा के पीछे-पीछे मैं भी चला, सोचा कि उसे रोक दूँ पर अंदर से कँपकपी चढ़ी थी सर घूम रहा था और उल्टी होने को थी। पूजा वहाँ रुचि को देखकर साइड में खड़ी हो गयी। उसने मेरे चेहरे की घबराहट पढ़ी। जाने क्या सोचकर उसने रुचि से कहा,”मेरा नाम पूजा है और मैं कपिल की गर्लफ़्रेंड हूँ”। वह किचन से बिना पानी पिये वापस हुई और झट से कपिल को लेकर हॉस्टल चली गयी।

क्रमश: …

मेरी गर्लफ्रेंड भाग- 1

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-2

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-3

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-4

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-5

मेरी गर्लफ्रेंड भाग-6

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-7

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-8

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-9

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-10

मेरी गर्लफ्रेंड: भाग-12

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

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