मोंढ़ेरा में सूर्योदय – मंडली
मंडली

मोंढ़ेरा में सूर्योदय

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कहते हैं कि वर्षों पूर्व इस क्षेत्र को धर्मारण्य कहा जाता था। रावण वध के पश्चात श्री राम ने ब्रह्म-हत्या पाप के निवारण हेतु यहीं यज्ञ किया था। ब्रह्म-मुहूर्त में पुष्पावती नदी के तट पर पूर्णिमा के चंद्र की शीतल रौशनी में एक वृद्ध धवल वस्त्रों में स्नान कर बाहर आ रहे थे। उनकी सफेद दाढ़ी और विशाल कपाल उनकी आभा बढ़ा रहे थे। उन्होंने मेरे पास रखी झोली उठाई और मुस्कुराते हुए बोले; “चलो!” मैं भी किसी जिज्ञासु बालक की भाँति उनकी उँगली थामे नदी के घाट से उपर की ओर बढ़ने लगा।

उनकी झोली में से लोहे के छेनी और हथौड़ी जैसे औजार खनकने की ध्वनि आ रही थी। घाट का अंतिम चरण पार करते ही सामने खड़ा था एक भव्य शिखरबद्ध देवालय! पूर्णिमा की रौशनी में देवालय की आभा देखते ही बनती थी। वहाँ पहुँचते ही हमने सबसे पहले गूढ़-मण्डप के द्वार पर खड़ी गणेश प्रतिमा को वंदन किया। गूढ़-मण्डप के आगे ५२ कलात्मक स्तंभों पर खड़ा नृत्य-मण्डप था जिसे ३६४ हाथियों के गजपट्ट से सजाया गया था।  नृत्य मण्डप के आगे विशाल सूर्य-कुंड था जिसमें छोटे बड़े सौ से अधिक मन्दिरों में विभिन्न देवताओं की प्रतिष्ठा की गई थी। हम दोनों ने गूढ़-मण्डप में प्रवेश किया और वहां पर स्थित द्वादश आदित्य प्रतिमाओं की अर्चना की। ३६४ हाथी वर्ष के हर एक दिन के प्रतीक थे, ५२ स्तंभ इन हाथियों के पुरूषार्थ पर खड़े ५२ सप्ताह थे, १२ दैदीप्यमान आदित्य इन स्तंभों पर चिन्हित सफलता को दर्शा रहे थे और गर्भ गृह में बैठे सूर्यनारायण सफलता को आशीर्वाद प्रदान कर रहे थे।

पूर्व से अरूणोदय हुआ और कर्क रेखा पर स्थित मोढ़ेरक के सूर्य मंदिर की देव-प्रतिमा पर शोभित रत्नों ने दिन का स्वागत करते हुए गर्भ-गृह को रौशनी से प्रकाशित कर दिया। हम दोनों सूर्यनारायण को पुष्प अर्पित कर बाहर आए तब तक वहाँ दर्शनार्थियों का ताँता लग चुका था। वृद्ध ने सूर्यालय के दक्षिण में लगी प्रतिमाओं की तरफ रूख किया और झोली में से औजार निकाल कर बड़ी ही बारीकी से प्रतिमाओं के निर्माण और रख-रखाव का काम शुरू किया। ढ़ेर में रखे पाषाण के टुकड़े उनके हाथों का स्पर्श पाते ही कलात्मक मूर्तियों में बदलने लगे।

प्रतिमा निर्माण से पहले वे पाषाण के टुकड़ों को हल्के से ठकठकाते, मैंने आश्चर्य से इसका कारण पूछा तो वे बोले; “जिस शिला में से हाथी के गले में बंधी घंटी जैसी मधुर ध्वनि उत्पन्न हो उसे पुंशिला कहते हैं, जो शिला कांस्य धातु सी झनके उसे स्त्रीशिला कहते हैं। अनियमित आकार वाली शिला को नपुंसक शिला कहा जाता है। पुंशिला और स्त्रीशिला का उपयोग अनुक्रम में देव और देवी प्रतिमाओं के लिए किया जाता है जबकि नपुंसक शिला का उपयोग नींव में रखी जाने वाली पाद-शिला के रूप में किया जाता है।” मैं प्रश्न पूछता रहा और वृद्ध उन सभी प्रश्नों उत्तर का शांति पूर्वक देते रहे। उन्होंने मुझे बताया कि दिशाओं के देवता दिकपाल, सप्त मातृकाएँ, द्वादश आदित्य और अन्य प्रतिमाओं की क्या क्या विशेषताएँ होती हैं और इनका निर्माण कार्य कैसे किया जाता है। हर प्रश्न का उत्तर देते हुए उनकी आंखों में मुझे एक दिव्य चमक दिखती रही।

मेरे प्रश्नों और उनके उत्तरों का सिलसिला तब टूटा जब मुख्य प्रवेशद्वार से आ रहे अश्वों के खुरों की धडबडाहट से भयभीत हुए दर्शनार्थी यहाँ-वहाँ भागने लगे। कुछ ही देर में देव-परिसर पर काली पगड़ियों वाले सशस्त्र सिपाहियों की सेना ने कब्जा कर लिया। यह खिलजी की सेना था – वही खिलजी जिसने देश के असंख्य धर्मस्थान ध्वस्त किए, लूटे और अनेकों निरीह स्त्री पुरुषों की हत्या कर दी। निःसंदेह अब खिलजी के निशाने पर मोढ़ेरक का यह कलात्मक स्थापत्य था। खिलजी के चेहरे से क्रूरता टपक रही थी, काजल से सनीं आँखें निर्दयता और भुजाओं में समेटी शमशीरें उसकी धर्मांधता की गवाही दे रहीं थीं।

ज्यादातर भीरु दर्शनार्थी वहाँ से भाग निकले पर कुछ निहत्थे किंतु निडर भक्त इस बेरहम सुल्तान को चुनौती देते हुए देवालय और बुतशिकन के मध्य में सीना ताने खड़े रहे। खिलजी की नजरें देवालय के स्वर्ण जड़ित कलश पर मंडरा रही थीं। उसने शमशीर उठा कर अपनी सेना को संकेत दिया और कुछ ही क्षणों में निहत्थे भक्तों के मृतदेहों से गुजरते हुए उसकी बर्बर सैना ने मन्दिर में प्रवेश किया। सबसे पहले मन्दिर के अन्दर-बाहर लगी सभी कलात्मक प्रतिमाओं को नुकीले शस्त्रों से विकृत किया गया। फिर मन्दिर प्रतिमाओं पर चढ़ाए गए स्वर्ण आभूषण, कलश, दीपक और अन्य कीमती सामान को लूट लिया। मण्डप और शिखर पर लगे स्वर्ण कलशों को नग्न कर दिया गया। कुछ ही देर बाद गर्भ गृह में स्थापित मनोहर सूर्य प्रतिमा को क्षत-विक्षत कर उसके रत्न जड़ित मुकुट, कुंडल, और अन्य आभूषणों का खिलजी के समक्ष ढेर लगा दिया गया। खिलजी का चेहरा पैशाचिक आनंद से सराबोर था।

मन्दिर के बाहर मोढ़ेरक नगर में भी लूट, खून और बलात्कार का वहशी दौर चल रहा था।‌ मैंने वृद्ध की ओर देखा, वो स्थितप्रज्ञ खड़े सब देख रहे थे। हम दोनों खिलजी के समक्ष खड़े थे पर वो हमारी ऐसे उपेक्षा कर रहा था मानों हम उसके लिए अदृश्य हों। नगर से लूटा गया द्रव्य भी सूर्य-मंदिर के बाहर जमा किया जा चुका था। उसकी सेना ने परिसर के सभी तोरणद्वार ध्वस्त कर दिए, सूर्य पश्चिम दिशा में अग्रसर हो रहा था। सैन्य ने लूट का माल समेट लिया था लेकिन अब भी खिलजी का मन नहीं भरा था।

उसने मन्दिर को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने का आदेश दिया। नृत्य मण्डप के स्तंभों से रामायण और महाभारत के कलात्मक प्रसंग-शिल्पों को शस्त्रों से मिटा दिया गया, आंतरिक और बाहरी दीवारों से गौरी, आदित्य, दिकपाल जैसी सभी प्रतिमाओं को विकृत किया गया लेकिन अब तक यह निष्ठुर सुल्तान को शिखर और नृत्य मण्डप को ध्वस्त करने में सफलता नहीं हुआ था। अंधेरा गहराता जा रहा था, खिलजी के सिपाहियों ने अंतिम विकल्प का प्रयोग किया। उन्होंने नृत्य मण्डप और गर्भ गृह में बारुद का ढेर लगाया और फिर हुआ समस्त मोढ़ेरक नगर को दहला देने वाला प्रचंड विस्फोट! नक्काशीदार शिखरों के परखच्चे उड़े और एक ही पल में देवालय की स्थिति किसी मस्तकहीन मनुष्य जैसी हो गई और वृद्ध के छेनी और हथौड़ी जैसे औजार मलबे में विलुप्त हो गए। देवालयों का विध्वंस कर के गर्भ गृह में गौहत्या करना इन आक्रांताओं का नियम था।

रात ढलते ढलते आक्रमणकारी सैना वहाँ से जा चुका था। सूर्यकुण्ड के चबूतरे पर मैं उदास बैठा था, वृद्ध ने मुझे दिलासा देते हुए कहा; “पुत्र, प्रलय विनाश का प्रतीक नहीं, प्रलय नवसृजन का प्रथम चरण है! परिवर्तन संसार का नियम है, यदि संसार परिवर्तनशील नहीं हो तो मनुष्य पुरुषार्थ ही नहीं करेगा! उनका ध्येय विध्वंस था और हमारा लक्ष्य नवसृजन है!” मैं उनके गोद में सर रख कर उनकी अमृतवाणी सुनता रहा।

फिर से एक बार पूर्व से अरूणोदय हो रहा था लेकिन अब सूर्य मंदिर में प्रातः की किरणों का स्वागत करने के लिए रत्नजड़ित स्वर्ण प्रतिमा नहीं थी। विध्वंस के सैंकड़ों वर्षों बाद अब यह परिसर दर्शनार्थियों और विद्यार्थियों का श्रद्धा स्थल नहीं बल्कि प्रवासियों के लिए टूरिस्ट स्पॉट बन चुका है। मेरे पास से गुजर रहे एक पचास साल के आदमी ने सिगरेट के धुएँ का गुबार उड़ाते हुए मेरी तरफ देखा और बोला; “क्या यार, दिन खराब हो गया। खंडहर में कितनी दुर्गंध आ रही है। हजार साल पहले शराब के नशे में मजदूरों ने यह नंग धड़ंग पुतले बना दिए और हम लोग यह सब देखने के लिए यहां समय बर्बाद कर रहे हैं। कुछ देखने लायक नहीं है यहाँ।” उसकी कॉलेजियन बेटी भी निराश थी क्योंकि उसे वहां ढंग की सेल्फी लेने की भी जगह नहीं मिली। नजदीक में ही बैठी उस पुरुष की पत्नी ने नाश्ता निकाला और जैसे ही तीनों ने मन्दिर परिसर में पेटपूजा शुरू की तो वॉचमैन ने उन्हें टोकते हुए बाहर निकाला।

हताशा और निराशा से भरा मैं भी वहां से उठ खड़ा आगे बढ़ा। पीछे मुड़कर इस महान अवशेष को देखने के लिए मैं हिम्मत नहीं जुटा पाया। बस-स्टॉप के पास सीमेंट से बने शिवालय में सुबह की आरती का घंटारव सुनाई दे रहा था।

18 thoughts on “मोंढ़ेरा में सूर्योदय

  1. नि:शब्द 🙏
    बहुत बहुत धन्यवाद उस समय को हमें दोबारा जीने का अवसर देने के लिए।

  2. सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला आपका लेख , आपको साधुवाद🙏

  3. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति। प्राचीनकाल की एक मर्मस्पर्शी यात्रा और साथ मे एक संदेश भी ।

  4. अद्भुत!हमेशा की तरह मनोरम्य लेखन!बहुत अच्छा।

  5. आप कहानी लिखते नहीं उसे जीतें है और जो सार निकल कर आता है वो अदभुत और बेमिसाल होता है। ऐसे ही लिखते रहिए और जीते रहिए।

  6. अद्भुत वर्णन भूत से लेके वर्तमान तक,,,,, की यात्रा ,,,,, धन्यवाद,,,,,, 🙏 🙏

  7. बढ़िया!मर्मस्पर्शी चित्रण।
    पर पूरा पढ़ लेने के बाद लगा कि पढ़ने की प्यास बुझी नहीं।कुछ और भी चाहिए था, जो शेष रह गया।इसे कुछ और विस्तार चाहिए।
    यह समझ में नहीं आया कि शीर्षक में मोंढेरा है,तो अन्तर्वस्तु में मोंढेरक क्यों है?

  8. बहुत ही सुंदर लीखे हो, इतना अच्छा लीखे हो कि पढते समय सूर्यमंदीर सामने हो ठीक वैशे ही लगता है|

  9. सकारात्मक, सुंदर । अभिनव दृष्टि से दृष्ट होता प्राचीन

  10. “प्रलय विनाश का प्रतीक नहीं, प्रलय नवसृजन का प्रथम चरण है! ”
    अति सुन्दर सकारात्मक सोच
    समस्त दृश्य जीवंत हो उठा।

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