मनोमंथन – मंडली
मंडली

मनोमंथन

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प्रो-टैक सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन्स, शहर की सैंकड़ों साफ्टवेयर कंपनियों में से एक मध्यम आकार की आईटी कंपनी का ऑफिस। बाहर मई महीने की चिलचिलाती धूप और अंदर एसी का वातानुकूलित माहौल लेकिन इस वातानुकूलन में भी प्रशांत अनुकूल नहीं लग रहा था। उसकी नजरें जरूर कम्प्यूटर स्क्रीन पर थीं पर उसका मन-मस्तिष्क विचारों के मंथन से इतना उद्वेलित था कि पास में ही बैठे उसके सहकर्मी पारिजात और कौस्तुभ उस मंथन को प्रशांत के चेहरे पर महसूस कर रहे थे। पारिजात, कौस्तुभ और प्रशांत एक ही महीने के अंतराल में प्रो-टैक कंपनी में शामिल हुए थे और कुछ ही वक्त में तीनों एक-दूसरे के अच्छे मित्र बन चुके थे। पारिजात की प्रकृति उसके नाम के अनुरूप सौम्य-शान्त थी। कौस्तुभ स्वभाव से धार्मिक युवक था, किसी भी प्रकार की निंदा और द्वेष से परे।

प्रशांत अपनी उधेड़बुन में उलझा हुआ था। तभी स्क्रीन पर ई-मेल नोटीफिकेशन फ्लैश हुआ। यह रिमाइंडर था। रिमाइंडर इस बात का कि उसका रिपोर्ट आज शाम तक मैनेजर के डेस्क पर पहुँच जाना चाहिए। यह नोटीफिकेशन प्रशांत के मन को कुछ ज्यादा ही उद्विग्न कर गया। वह पिछले एक हफ्ते से यह रिपोर्ट बना रहा था। ऐसा नहीं था कि उसका काम बाकी हो। वह परिश्रमी था और अपने काम को लेकर समर्पित भी। रिपोर्ट भी तैयार थी लेकिन उसे डर था तो बस रिपोर्ट के बाद आने वाली प्रतिक्रिया का।

यह पिछले सात महीनों से चल रहे प्रोजेक्ट का टेस्ट रिपोर्ट था। इसके अनुसार प्रोग्राम में इतनी गड़बड़ी थी कि लॉन्च के कुछ ही दिनों में एप्प क्रैश होने वाला था। यदि यह रिपोर्ट मैनेजमेंट तक पहुँच जाए तो बखेड़ा खड़ा होना तय था। कंपनी के वरिष्ठ और अनुभवी कर्मचारियों से सीधा संघर्ष होना अनिवार्य था। इस रिपोर्ट के बाद शायद उसका करियर शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाए।

प्रोग्राम में की गई गड़बड़ी टीम लीडर और अन्य वरिष्ठों को ज्ञात थी। इसीलिए उन्होंने येन-केन-प्रकारेण प्रशांत का मुंह बंद कराने के प्रयास शुरू कर दिए थे। सीनियर डेवलपर वारूणी ने नशे का प्रलोभन दिया और एचआर रंभा ने अपनी अदाओं और बातों की मोहिनी बिखेरी। टीम लीडर ने परोक्ष रूप से धमकी भी दी। मैनेजमेंट तक अपने मन-मुताबिक रिपोर्ट को पहुँचाने के लिए इन सभी के द्वारा साम-दाम-दंड-भेद जैसे सभी तरीके अपनाए जा रहे थे।

प्रशांत के मन में विचारों का प्रवाह अश्व से भी तेज गति से भाग रहा था। प्रलोभन, आशंका, धमकी, निंदा… क्या कुछ नहीं था उसके मस्तिष्क में! उसने सोचा अपने वरिष्ठों की गलतियों पर ढांक-पिछौड़ा कर देना सबसे आसान उपाय है। जैसे वर्षों से चलता आ रहा है वैसे ही सबकुछ चलता रहता और यही उसके लिए श्रेयस्कर भी था। उसने मन बना लिया। प्रामाणिकता, नीति और स्वाभिमान जैसे बड़े बड़े आदर्शों पर चल कर उसके विधुर पिता जीवनभर कुछ भी हासिल नहीं कर पाए थे। प्रशांत को जीवन में संपन्नता की कामना थी। आदर्शवादी व्यक्ति सिर्फ सम्मान कमाता है, संपन्नता नहीं। उसने नया रिपोर्ट बना लिया, वैसा ही जैसा अब तक बनाया जाता था।

सुबह से हो रहे इस मनोमंथन के बाद प्रशांत के पास सरदर्द का बहाना भी था। हर दिन की तरह हीरालाल के हाथों से बनी चाय की तलब ने उसका रुख़ बेसमेंट में चाय की टपरी की तरफ मोड़ दिया। वहाँ के सुस्त माहौल में अकेले बैठा वह हीरालाल के ढाई साल के बच्चे की गतिविधियों को देख रहा था। गोल-मटोल सा वह बच्चा चेहरे पर निश्छल सी मुस्कान लिए, सभी प्रकार के लोभ, मोह, वासना और क्रोध भाव से परे अपनी माँ के साथ खेल रहा था। और प्रशांत निर्लोप भाव से उसे निहारता रहा।

अंतत: समय आ ही गया। प्रशांत ने ई-मेल ड्राफ्ट कर दिया था और उसके सामने दो टेस्ट रिपोर्ट तैयार पड़े थे। प्रशांत के एक ओर पारिजात अपनी सौम्य मुस्कान बिखेर रही थी तो दूसरी ओर कौस्तुभ की डेस्क पर रखी तस्वीर से भगवान विष्णु उसकी ओर एकटक देख रहे थे। प्रशांत ने ई-मेल में पहला वाला रिपोर्ट अटैच कर दिया और आने वाले तूफान का इंतजार करने लगा।

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घड़ी के काँटे साढ़े चार का वक्त बता रहे थे। ऑफिस में अचानक से चहल-पहल बढ़ गई। सभी वरिष्ठ कर्मचारियों को मीटिंग कक्ष में तलब किया गया था और साथ में प्रशांत को भी। रणभेरी बज चुकी थी, पांचजन्य शंख फूंका जा चुका था। अब आने वाले कठिन पलों का सामना करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मीटिंग कक्ष में पहुँचते ही प्रशांत का हृदय आने वाले हमले की आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा। कक्ष में सभी की तीखी नजरें उसकी ओर थीं। बड़ा बवाल हुआ। प्रशांत के विरुद्ध विषवमन का लंबा दौर चला। इतने वर्षों के अनुभवियों के आगे उसकी एक न चली। उसके रिपोर्ट को सीनियर मैनेजमेंट के आगे सिरे से नकार दिया गया और उसे भर भर के कोसा गया। मीटिंग खत्म होने तक सभी की दृष्टि प्रशांत की आँखों को भेदती हुई उसके अंतर्मन तक पहुँच रहीं थीं, मानो उसकी निंदा कर रहीं हों। निश्चित रूप से उसका भविष्य अंधकारमय हो चुका था। मैनेजमेंट ने आगे की कार्यवाही रिपोर्ट के डिटेल अनालिसिस तक रोक दी। कक्ष से बाहर निकलते हुए प्रशांत का मन भारी हो चुका था और उसकी आंखें नम थीं। उसे संतुष्टि थी तो बस इस बात की के उसने सच का मार्ग चुना था।

मीटिंग खत्म हुई, सूर्य भी ढलान पर था। प्रशांत भारी मन से घर की ओर बढ़ा। घर के चौखट पर पिताजी की बूढ़ी आंखें कल्पवृक्ष की भाँति ऊष्मा से भरी बातों और अपने हाथों से बने खाने के साथ बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे।

रात के करीब आठ बज रहे थे। तभी सिनियर मैनेजर का फोन कॉल आया। प्रशांत ने तुरन्त फोन रिसीव किया। उसका मन आने वाले एक और हमले की आशंका से काँप उठा। लेकिन यह फ़ोन-कॉल प्रशांत के लिए सुखद ख़बर लिए आया। जाँच के बाद उसके रिपोर्ट में सत्यता पाई गई थी। सिनियर मैनेजर ने रिपोर्ट की तारीफ करते हुए प्रशांत की प्रशंसा के पुल बांधे और आने वाले समय में ऑफिस में उसे किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा, इस बात का भरोसा दिलाया।

दिनभर के उतार-चढ़ाव के बाद, निंदा और प्रशस्ति से अनछुआ प्रशांत बिछौने पर था। समुद्र-मंथन समाप्त हुआ था, मानो कर्म की पीठ से मंदराचल का भार उतर गया था। वारूणि और रंभा के प्रलोभनों से बचते हुए, पारिजात और कौस्तुभ जैसे मित्रों की सहायता से वह कल्पवृक्ष समान अपने पिताजी की छाया में सुरक्षित पहुँच गया था। निंदा, अपमान, उपहास और क्रोध का विष पीने के बाद प्रशांत अपनी कर्मू-परायणता, निष्ठा और प्रामाणिकता के बल पर आत्मसंतुष्टि का अमृतपान कर रहा था। आकाश में पूर्णिमा का चंद्र शीतलता की अनुपम अनुभूति दे रहा था।

लेखक – तृषार (@wh0mi_)

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है। लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।

6 thoughts on “मनोमंथन

  1. बहुत ही ख़ूबसूरती से लिखी गयी कहानी, सभी पात्रों के चरित्र और नाम गज़ब के हैं ☺💐

  2. Writer is young and researched his subject thoroughly. I wish him my best for future endeavours. One thing which I have observed rather perceived are his emotions, which sometimes get expressed openly in social media. He should be cautious about them. An excess expression of emotion may draw lot empathy or sympathy from all around but he will built a weak image of himself at large. Which is not good for the career ahead. He should keep his emotions contained well within himself and should not reflect them at all because no body is going to help him out except few symphatic words. A writer never grows within his own circle only so impression to masses should be taken care off.
    Keeping pace with moving time and culture is a must those who don’t time will keep its own pace. Take example of mathematicians do they stick to old trigonometry or flow with new complex theories. A respect to ancient is must but you should not forget you are in era where mankind is getting ready for extraterrestrial. So make yourself large enough to incorporate the magnanimous knowledge of modern times also. With regards

  3. जीवन में ऐसे अनेक अनचाहे मोड़ आ ही जाते हैं, जब सही और ग़लत में से किसी एक को चुनना पड़ता है, और तब ग़लत को चुनने वाला एक चक्रव्यूह में फस जाता है, सत्य मार्ग चुनने वाला कुछ संकट से राह बना ही लेता है।

  4. फ़िलहाल तो मेरे पास कोई अनुभव नही है
    लेकिन शायद आने वालों दिनी में ये उपयोगी हो बहुत ज्यादा

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