महाराष्ट्र सरकार या वीरबल की खिंचड़ी – मंडली
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महाराष्ट्र सरकार या वीरबल की खिंचड़ी

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कम ही लोग जानते हैं कि ‘वीरबल की खिंचड़ी’ पकने में देरी इसलिए हुई क्योंकि खिंचड़ी का चावल दाल की भूमिका निभाने की जिद पर अड़ गया था। महाराष्ट्र में सरकार बनने में हो रही देरी के पीछे ऐसा ही कुछ कारण है। महाराष्ट्र चुनाव में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला। भाजपा-शिवसेना की खिंचड़ी सरकार बनती दिखने लगी लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। खिंचड़ी के चावल को अचानक यह बोध हुआ कि वह दाल है। भाजपा से आधी सीटें होते हुए भी शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद के लिए 50:50 का फॉर्मूला रख दिया। इसे शिवसेना की ढ़ीठता मत कहिए, शुक्र मानिए कि उसने सीएम पद के लिए भाजपा और शिवसेना के बीच ऑड-इवन की माँग नहीं की। यह सामान्य बुद्धि है कि जनादेश को सीटों की संख्या में देखा जाए। शिवसेना कुशाग्रबुद्धि है जो जनादेश का निहितार्थ समझ रही है, “जनता शिवसेना का मुख्यमंत्री चाहती है।“

महाराष्ट्र के एक महत्वपूर्ण पक्ष पवार साहब का कहना है कि उन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। उन्हें यह भी लगता है कि 25 साल पुराने भाजपा-शिवसेना गठबंधन की ही सरकार बननी चाहिए। हालांकि लोग-बाग उनकी इस शुद्ध लोकतांत्रिक सोच पर तरह तरह के कयास भी लगा रहे हैं। काँग्रेस को उसने स्वयं और जनता ने उस हाल में पहुँचा दिया है, जहाँ उसके विरक्त हो जाने का विकल्प ही शेष है। अव्वल तो कहीं काँग्रेस जीतती नहीं और जहाँ ठेल-ठालकर सरकार बनाने की गुंजाइश दिखती है, वहाँ उसे ही ठेल दिया जाता है। हरियाणा में कांग्रेस कांडी कांडा पर हाय तौबा करती रही और उधर कांड हो गया। भाजपा ने कांडा के रुप में ललचाती हुई फ्लाइटेड गेंद फेंकी। छक्का मारने के चक्कर में हुड्डा बाउंड्री लाइन पर चौटाला के हाथों कैच हो गये। महाराष्ट्र में कांग्रेस अधिक जोड़-तोड़ इसीलिए नहीं करती दिख रही क्योंकि उसे नियति का पूरा पूरा भान है।

‘भाजपा रोको’, ‘भाजपा रोको’ के हल्ला बोल से ही कांग्रेस का यह हाल हुआ है लेकिन कांग्रेस का एक गुट मानता है कि भाजपा को रोकने के लिए शिवसेना की सरकार बनवा दी जाए। यदि शरद पवार मनुआ जाएं तो कांग्रेस ‘भाजपा रोको’ का शायद एक और प्रयास कर ही दे। इसी संभावना में शिवसेना जनादेश को ऐसे पढ़ रही है कि जनता शिवसेना का मुख्यमंत्री चाहती है। बिना देरी किये आदित्य ठाकरे ने दरगाह पर चादर चढ़ा दी। यह कांग्रेस और एनसीपी को खुली चुनौती थी कि तुम भी उतने सांप्रादायिक हो जाओ, जितने हम दरगाह पर चादर चढ़ाकर सेक्युलर बने हैं। भाजपा को शिवसेना का काम बिगाड़ने के लिए यह याद दिलाना चाहिए कि यही ठाकरे परिवार कुछ महीने पहले खाली पीली हुमचा हुमची करने अयोध्या गया था। सेक्युलर और कम्यूनल के बीच का भेद कुछ तो जेपी ने गिराया, कुछ जॉर्ज ने। क्या पता कि बाकी बचा काम ठाकरे परिवार ही कर दे। हमारा लोकतंत्र धन्य हो जाता यदि लालपंथी भी इस भेद को सदा के लिए भुलाकर भगवा से अपने परहेज से तौबा कर लेते।

परम प्रतापी शिव सैनिक संजय राउत आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवाने के मिशन पर हैं। संजय राउत शिवसेना के ऐसे गुड्डे हैं जिनमें पार्टी के प्रोपराइटर ने चाभी भरा है। भरी गयी चाभी ने असर दिखाया है। राउत साहब ने स्वयं कहा है कि जो कुछ नहीं करता, वो कमाल करता है। यह उनकी विनम्रता है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि वह कमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर वह भाजपा के लिए दिलतोड़ स्लाई लिख रहे हैं, दुष्यन्त कुमार तो तो बख्शने के मूड में ही नहीं दिखते। उधर बहन प्रियंका चतुर्वेदी को शिव सैनिक बने जुम्मा जुम्मा सात दिन भी नहीं हुए पर वह अपने पुराने अनुभव से फील्डिंग में कोई कसर नहीं छोड़ रही। हर पार्टी के पास ऐसे गुड्डे और गुड्डियाँ हैं। उनकी संख्या कितनी है और उनमें चाभी कितनी भरी जाए, यह पार्टी की औकात और आवश्यकता पर निर्भर करता है। चिल्ल मारिए। सत्ता का बताशा बोल रहा है, हताशा का तमाशा भी होगा।

हमारे लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय दलों पर पदलोलुपता भरी ठिठोली का भरा पूरा इतिहास है। इसे हमारे राष्ट्रीय दल ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात’ की स्पिरिट में लेते रहे हैं, भले ही इसमें उनका राजनीतिक नुकसान ही हो जाए। इस बार शायद भाजपा ने इस छोटन के उत्पात को खुराफात की तरह लिया है और क्षमा से परहेज करने का निश्चय कर लिया है। कल मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने प्रेस वार्ता करके 50:50 विकल्प की हवा भी निकाल दी। यह शिवसेना को अकथित चुनौती है कि वह अपना तथाकथित विकल्प खोले या मुख्यमंत्री पद की जिद छोड़कर मंत्रालयों पर ही थोड़ा मोल भाव कर ले। यदि शिवसेना उद्धव ठाकरे द्वारा बाला साहब को दिए गए वचन (महाराष्ट्र को शिवसेना का मुख्यमंत्री देने के) पर गंभीर है तो वह काँग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर कम्यूनल और सेक्युलर के बीच की दीवार ढ़हा दे ताकि बाला साहब की आत्मा प्रसन्न हो। वरिष्ठ राजनेता और सहृदय कवि रामदास अठावले के अंदाज में कहें तो …

अब बंद करो तकरार

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बीच में क्यों खड़े हो हो जाओ इस पार या उस पार

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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