अनूठे गीतकार योगेश – मंडली
मंडली

अनूठे गीतकार योगेश

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उस दुबले पतले नवयुवक ने आँसू भरे आँखों से मुड़ कर देखा तो रिश्तेदारों की भीड़ में एक साहब उस नवयुवक को इशारा दे कर बुला रहे थे। ये उन लोगों का हुजूम था जिनके लिए इस युवक के पिताजी ने कभी हाथ नहीं रोका था। आज वही लोग अर्थी के पैसे देने तक को तैयार नहीं थे। पैसे न होने पर उस युवक से लिखवा लिया गया कि वो क्रिया-कर्म के पैसे बाद में चुकाएगा। बात सिर्फ क्रियाकर्म की ही नहीं, पिताजी के बाद परिवार पालने की भी थी, जो अब उस युवक की ज़िम्मेदारी थी। नौकरी मिलना आसान नहीं था। उस उम्र में तो शोर्ट हैण्ड टाइपिंग सीखना काम आ सकता था। लेकिन वो सीखना भी काम नहीं आया और सारे रास्ते बंद होते चले गए।

शाम को उसका दोस्त सत्तू घर आया और फिर काफी सोचने के बाद तय हुआ कि बॉम्बे चला जायेगा। सत्तू उस युवक के बचपन का दोस्त था और अच्छे बुरे का साथी भी। बॉम्बे में इस युवक की सगी बुआ के लड़के फिल्मो में काफी अच्छा काम का रहे थे और बड़ा नाम कमा चुके थे। उम्मीद ये थी कि वो कुछ न कुछ छोटा मोटा काम दिला ही देंगे।

पाँच सौ रूपए लेकर दोस्तों की ये जोड़ी नौकरी का सपना लिए जा पहुँची बॉम्बे। आर्यसमाज की धर्मशाला में ठहरने के बाद उनका पहला सपना तब टूटा, जब उनके भाई ने उनकी नौकरी लगवाने में कोई मदद नहीं की। रोज़ करीब पैंतालिस मिनट का सफ़र तय करने के बाद अपने भाई के पास पहुँच कर दोनों दोस्त कई दिन तक खाली हाथ ही लौटते रहे।

दोनों को धर्मशाला से हफ्ते भर बाद ही निकलना पड़ा था। उनका अगला ठिकाना बना दूर पहाड़ी पर बनी एक झोपड़ी  जहाँ ११ रुपये महीने भाड़ा पर उनको छत मिल गयी थी।

अपने दोस्त को परेशान और हताश देख कर एक दिन सत्तू ने कसम खाई कि जब तक उसका दोस्त फिल्म लाइन में ही कुछ बन कर नहीं दिखा देता वो वापस नहीं जाएगा। युवक के हाथ पैर फूल गए। वह बोला कि उसको तो कुछ आता नहीं है फिल्मो के बारे में। सत्तू नहीं माना, जिद करके बैठ गया कि अब तो उस युवक को कुछ करके दिखाना ही पड़ेगा। उस दिन के बाद सत्तू ने चपरासी, सफाई वाला या जो भी काम मिला वो करता रहा। शर्त यही थी कि सत्तू नौकरी करेगा जिससे खाना पीना चलता रहेगा लेकिन उसका दोस्त नौकरी नहीं करेगा। उसके दोस्त का रोज़ सिर्फ एक ही काम था और वो था फिल्म लाइन में जाकर काम की तलाश करना। सत्तू ने अपने सपनो को बाँध कर कहीं फेंक दिया था और जी जान से जुट गया था अपने दोस्त के सपने को पूरा करने में। सत्तू रोज़ उस युवक को विश्वास दिलाता था कि वो युवक कुछ कर के दिखाएगा।

इस नवयुवक ने कुछ नहीं, बहुत कुछ करके दिखाया था आने वाले दिनों में। युवक का नाम था योगेश गौड़ जो हिन्दी फिल्मों में एक अनूठा गीतकार बनकर उभरे। १९६२ में आख्रिकार उन्हें अपने सपनो को गीतों में ढालने का मौका मिला जब उन्हें छः गीत लिखने के १५० रुपये मिले। यह वो समय था जब आनंद बक्शी को एक गीत के १५ रुपये मिलते थे। उस रोज़ योगेश ने अपने दोस्त को काम पर नहीं जाने दिया था और जी भर के अपनी मर्ज़ी का खाया पिया था।

प्रसिद्ध संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संपर्क में आने पर योगेश की किस्मत ने एक शानदार मोड़ लिया। १९६८-६९ में सलिल दा ने योगेश द्वारा लिखे गए कुछ गानों को संगीतबद्ध किया लेकिन दुर्भाग्य से वो फिल्मे बन नहीं पायी। और फिर आया १९७० जब फिल्म आनंद आयी। इसके बाद योगेश ने कभी मुड़ कर नहीं देखा।

“जिंदगी कैसी ये पहेली है…” और “कहीं दूर जब दिन ढल जाए..” ये दोनों गाने बेहद लोकप्रिय हुए और बाकी, जैसा कि वे कहते हैं, इतिहास है। “आनंद” ने गीतकार के रूप में योगेशजी के करियर के सबसे सफल दौर की शुरुआत की थी।

https://www.youtube.com/watch?v=3vgDb4TQneA

“आनंद”, “अन्नदाता”, “अनोखा दान”, “मेरे भैया”, “रजनीगंधा”, “छोटी सी बात” जैसी फिल्मों के लिए सुंदर, मधुर और लोकप्रिय गीतों का योगदान इसी सफल साझेदारी का परिणाम था।

सत्तर का दशक वास्तव में योगेश लिए एक सुनहरा दशक साबित हुआ। इस अवधि में योगेश के साथ सहयोग करने वाले अन्य सबसे उल्लेखनीय संगीत निर्देशकों में बड़े और छोटे बर्मन दोनों थे। उन्होंने बड़े बर्मन दा के साथ सिर्फ दो फिल्में “मिली” और “उस पार” की। श्रोताओं को अभी भी इन फिल्मो के गीत याद हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=CCg88svRHL4

छोटे बर्मन के साथ उनकी साझदारी लगभग आठ फिल्मो की थीं। जिनमें से “चला मुरारी हीरो बनने”, “हमारे- तुम्हारे”, “मंज़िल” के गीत अधिक सफल माने जाते हैं। इस दशक में, उन्होंने उषा खन्ना और राजेश रोशन के साथ साझेदारी में कुछ बहुत सुंदर गाने भी तैयार किए।

योगेश की सफलता में निस्संदेह योगदान देने वाले दो फिल्म-निर्देशकों में श्री हृषिकेश मुखर्जी और श्री बसु चटर्जी हैं। हालांकि उन्होंने “आनंद”, “मिली”, रंग-बिरंगी “जैसी उत्कृष्ट फिल्मों में ऋषि दा के लिए कालजयी गीत लिखे किन्तु बसु दा के साथ भी उनकी साझेधारी कम प्रभावशाली नहीं है। इसमें “रजनीगंधा”,”छोटी सी बात”, “बातों बातों में” जैसी फिल्मों के शानदार गीत शामिल हैं। योगेशजी की सबसे उल्लेखनीय, यादगार और प्रेरित रचनाएँ इन दो निर्देशकों की फिल्मों से संबंधित हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=CPwbi-hfenI

एक गीतकार के रूप में योगेश २००९ के अंत तक सक्रिय रहे हैं। हालाँकि १९९८ से २००२ तक उन्होंने कोई काम नहीं किया। अपने शानदार करियर के दौरान उन्होंने हेमंत दा, सी.रामचंद्र, सुरेश कुमार, सुरिंदर कोहली, विजय राघव राव, भप्पी लहरी, वसंत देसाई, भूपिंदर सोनी, मीना मंगेशकर, श्यामल मित्रा, वनराज भाटिया, कल्याणजी-आनंदजी और मदन मोहन तथा नए संगीत निर्देशकों में उन्होंने निखिल-विनय, अन्नू मलिक, आदेश श्रीवास्तव, और दिलीप सेन- समीर सेन आदि के साथ काम किया।

योगेश नहीं रहे। ये कल ही सुना और यकीन नहीं हुआ। बहुत दिनों से उनके बारे में लिखने का मन था पर नहीं पता था कि उनके बारे में लिखना उनके जाने के बाद ही हो पायेगा।

योगेश तो चले गए पर क्या आप “मन की सीमा रेखा”, “मधुर गीत गाते धरती गगन”, “अवगुण और दुर्गणों का देखा जाना”, “बोझल साँसे”, “घनी उलझन”, “रत के गहरे सन्नाटे”, “सपनो का दर्पण”, “बंधन का सुख” और “साजन का अधिकार” भुला पाएंगे?

भावभीनी श्रद्धांजलि।

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लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

1 thought on “अनूठे गीतकार योगेश

  1. श्रीमान जी को धन्यवाद मेरे कुछ प्रिय गीतों के रचयिता योगेश जी के बारे में बताने के लिए। योगेश जी को श्रद्धांजली 🙏

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