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लोकतंत्र का हासिल सिर्फ लोकतंत्र

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लोकतंत्र का उद्भव भारत में हुआ। भारत ही सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भी है। लेकिन  अमेरिका विश्व में लोकतंत्र का अलोकतांत्रिक तरीके से प्रणेता बन बैठा है। यह अमेरिका का लक्ष्य है कि येन-केन-प्रकारेण सर्वत्र लोकतंत्र सर चढ़कर बोले। ऐसा समझा जाता है कि अपने इस पावन उद्देशय के लिए अमेरिका ने ऐसे शांतिपूर्ण बम का आविष्कार कर लिया है जो किसी देश पर गिराए जाते ही वहाँ लोकतंत्र के अमृताणु फैलाने लगता है और वह देश लोकतंत्र की चपेट में आ जाता है। लोकतंत्र के विरोधी कहते हैं कि अमेरिका लोकतंत्र के प्रसार का बहाना खोजता रहता है। समझ नहीं आता कि अमेरिका उस चीन पर कृपा कब बरसाएगा, बरसाएगा भी या नहीं जिसकी लालपंथी तानाशाही का दंश पूरी दुनिया झेल रही है।

लोकतंत्र स्थापना के लिए अमेरिका के भगीरथ प्रयासों के आलोक में लोकतंत्र के कई समकालीन टीकाकार लिंकन द्वारा लोकतंत्र की दी गयी कालजयी परिभाषा ‘ऑफ द पीपल, फॉर द पीपल, बाई द पीपल’ में ‘थ्रू अमेरिका’ जोड़ने पर बल देने लगे हैं। अमेरिका के अथक प्रयास से पूरे विश्व में लोकतंत्र पुष्पित और पल्लवित हो रहा है। वह दिन दूर नहीं जब लोकतंत्र के महासागर में तानाशाही एवं राजतंत्र के छिटपुट दिखते टापू विलीन हो जाएँगे। इसी क्रम में दुनिया में जंगल, फलों और फूलों के साम्राज्य भी राजतंत्र त्यागकर लोकतंत्र को अंगीकार करेंगे।

लोकतंत्र का जंगलराज हमने देखा है। जंगल का लोकतंत्र भी कम दिलचस्प नहीं होगा। निहित स्वार्थ में शेर इस पर वैसे ही रिएक्ट करेंगे जैसे हमारे राजा महाराजाओं ने स्वतंत्रता के समय और उसके बाद के दशक में किया था। जंगल के लोकतंत्र में नेतृत्व के लिए शेर के अलावा एक से बढ़कर एक दावेदार हैं। विशालकाय हाथी अपने बाहुबल के मद में रिंग अपना हैट अवश्य फेंकेगा। चीता अपनी चपलता का, हिरण अपने ग्लैमर का एवं वैशाखनन्दन अपनी बुद्धिमत्ता का कार्ड खेलकर जंगल का खेवनहार बनना चाहेंगे। भालू भी नेतृत्व का एक प्रबल दावेदार होगा। अपनी अद्भूत फूँक कला से वह लोकतंत्र को कभी दुबला नहीं होने देने का चुनावी वादा कर सकता है।

यह एक सर्व-स्वीकार्य तथ्य है कि लोकतंत्र में नेरेटिव की महिमा अपरम्पार है। इस लिहाज से धूर्त सियारों का दावा भी मजबूत होगा जो एक हुँआ के पीछे हजारों हुँआ-हुँआ करने में पारंगत होते हैं। चंदन से लिपटने का शौक और लीलने का कौशल अजगर को भी एक तगड़े दावेदार के रुप में पेश करेगा। लोकतंत्र में मोटे खाल का महत्व देखते हुए गेंडा को कम आँकना भूल होगी। रंग बदलने की विशिष्ट योग्यता रखने वाले गिरगिट को छोटे जीव के नाम पर नकारना को तो स्वयं में अलोकतांत्रिक है। गठबंधन के दौर में बंदरबाँट के अपने हुनर से बंदर भी लोकतंत्र को समृद्ध करने की प्रतिज्ञा कर सकते हैं। भेड़िया यह तुरूप का पत्ता चल सकता है कि उसके सत्ता में आते ही ‘भेड़िया आया’ का होक्स हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

फलों के साम्राज्य में आमशाही का राजतंत्र स्वयं ही आंतरिक सत्ता संघर्ष में लिप्त है। लंगड़ा, हापुस, दशहरी और केसर आपस में बादशाहत के लिए लड़ रहे हैं। आए दिन वे अपने समर्थकों को श्रेष्ठता सिद्धि के स्वार्थ में लड़ाते हुए भी देखे जा सकते हैं। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि आमशाही के इस सत्ता संघर्ष ने लोकतंत्र के लक्षण दिखाने शुरु कर दिए हैं। बस मौके पर चौका जड़ देना आवश्यक है।

यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि एक तरफ आमशाही चल रही है और दूसरी तरफ हमारे लोकतंत्र में खास आम का काम तमाम किए जा रहे हैं और उन आमों की गुठलियों के दाम भी निकाल रहे हैं। आमशाही का सत्ता संघर्ष लोकतंत्र की स्थापना से ही खत्म किया जा सकता है। इलिट सेब व अंगूर, मध्यवर्गीय संतरा और केला, पिछड़े अमरुद, नासपाती, बेर और कदम्ब, सेकुलर खजूर, कसैले जामुन, बेडौल कटहल, सुडौल अनार, रसीली लीची, शरीफ शरीफा सबका उज्जवल भविष्य लोकतंत्र में ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

सुन्दर फूलों का कोमल और रुमानी साम्राज्य लोकतंत्र सबसे पहले डिजर्व करता है। मन और तन से कोमल राजा गुलाब भी शायद ही इसका विरोध करें। भावी नेतृत्व पर कोई चर्चा नहीं करना ही बेहतर है। इस संदर्भ में यदि एक  फूल विशेष का नाम आ गया तो देश की राजनीतिक स्थिति के परिप्रेक्ष्य में लेख पर राजनीतिक होने का ठप्पा लगने का और लेखक पर पक्षपाती होने का आरोप लगने का खतरा है। वैसे भी फूलों के लोकतंत्र में नेतृत्व चाहे कोई भी फूल कर ले, नेतृत्व मिलने के बाद वह गुलर का फूल ही हो जाएगा। आशा की जानी चाहिए कि फूलों का महकता लोकतंत्र इस नियति को प्राप्त नहीं होगा।

यह लेख लिखते हुए लेखक को एक आशंका है – लोग यह न पूछ बैठें कि जंगल, फलों और फूलों के साम्राज्य में लोकतंत्र की स्थापना से क्या हासिल होगा। इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि शासन प्रणाली के रूप में सबसे श्रेष्ठ मानी जाने वाली पद्धति लोकतंत्र वैसी औषधि जैसी है जिसका असर हुआ या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सेवन करने वाले में औषधि पर कितना विश्वास है।

लोकतंत्र की सफलता के लिए लोकतंत्र में विश्वास करना आवश्यक होता है। विश्वास डगमगाए या टूटे तो लोकतंत्र में विश्वास को पुन: रिचार्ज करने का फीचर भी है। विश्वास करने, डगमगाने, टूटने और उसे पुन: रिचार्ज करने के क्रम में यह भी मान लेना व्यवहारिक है कि ‘मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी’ की तर्ज पर लोकतंत्र का हासिल सिर्फ लोकतंत्र ही है।

#लोकतंत्र #Democracy

 

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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