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लॉकडाउन पर कुछ मीठा कुछ खट्टा

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कोरोना संकट से निबटने के लिए देश में संपूर्ण लॉकडाउन है। समूह पलायन से डाइल्यूशन की खबरें भी आयीं। मानव अधिकारों और गरीब हित के नाम पर इसे प्रेरित किया गया और इसका समर्थन हुआ, गोया यह लॉकडाउन मानवता के हितों के विरूद्ध हो। सरकार, चिकित्सा कर्मी और पुलिस-प्रशासन अपने-अपने कर्तव्यों में लगे हैं। सुविधानुसार उनकी आलोचना और महिमामंडन का क्रम भी जारी है। स्थिति की विकटता के मद्देनजर लगा था कि लोग इस बार सुधरेंगे पर प्रतिक्रियाओं में आरम्भिक संयम के बाद हमेशा की तरह इस बार भी घी थाली में है या नाली में।

व्यवस्था न तो कभी पूरी होती है, न कभी अधूरी रहती है।  विकास  क्रमिक होता है, रातों-रात नहीं। इसके बावजूद इस अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट पर चिकित्सा व्यवस्था के चरमराने की बात उस देश में हो रही है जहाँ स्वास्थ्य की वरीयता कई दशकों से पहले पायदान पर है, नीचे से। वेंटिलेटर, पीपीई और मास्क की कमी पर विलाप मचा है जबकि कल तक कोई यह पूछने वाला नहीं था कि डॉक्टर्स के पास स्टेथोस्कोप है या नहीं।

आग लगने पर कुआँ खोदने की माँग सिर्फ हमारे देश में ही नहीं हो रही है। इटली, स्पेन, यूके और अमेरिका जैसे देशों की उत्तम स्वास्थ्य व्यवस्था भी इस संकट में लड़खड़ा गयी है। ‘अगिया लगाय छऊँरी बर्र तर खार्ह’ सरीखे चीन का लाल नकाब वहाँ की खबरें बाहर आने नहीं देता लेकिन यह तय है कि कोरोना संकट ने यह सिद्ध कर दिया कि आपदा प्रबंधन संपूर्ण विश्व में कमोबेश एक जैसा है। इसी आपदा प्रबंधन की बाध्यताओं में हँसोड़ ट्रंप अंकल चाइनीज और वुहान वायरस की रट छोड़कर कोरोना वायरस कहने लगे।

देश में एलोपैथ, होम्योपैथ और नेचुरोपैथ से कंधा से कंधा मिलाकर ओझापैथ और झोलापैथ देश को आरोग्य देते रहे हैं। कोरोना में पोंगापैथ हिट हो गया है। यह पोंगापैथ कहता है कि कोरोना कुछ खास लोगों को हो ही नहीं सकता और यह समय दुनिया के मालिक से माफी माँगने का है। इसके बावजूद इन खास लोगों में अनेकों को कोरोना हुआ और उन्होंने देश में स्थिति को विकट बना दिया। वे कोरोना से बच न सके तो चिकित्सा से आँख-मिचौली खेलकर माहौल को हल्का करना चाहते हैं। पुलिस इसमें खलल डालती है तो वे थोड़े नाराज हो जाते हैं और नाराजगी का मुजाहिरा भी कर देते हैं।

कोरोना से लड़ने के लिए करूणा आवश्यक है और यह समझना भी कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति पीड़ित है, अपराधी नहीं। कमोबेश पूरा देश इसे समझता है लेकिन गलतफहमी में कुछ लोग थूकते लोगों को कोरोना फैलाने वाला समझ रहे हैं जबकि वे कोरोना के नाम पर थू थू करके उसे लानतें भेज रहे हैं। उनके इरादे पाक हैं।

बहरहाल, ‘जनता कर्फ्यू’ से म़ॉक-ड्रिल करने वाली जनता लॉकडाउन में कूद पड़ी। मुख्य विपक्षी दल ने बिना तैयारी के आपातकाल लगा दिया था पर बिना तैयारी के लॉकडाउन के लिए वह सरकार को कोसने लगी। कुछ इस पर भी बिदके कि लॉकडाउन पहले क्यों नहीं हुआ। बातों बातों में महामारी विशेषज्ञ सोशल अनुकूल पानी पाकर मीडिया और टीवी चैनल पर तैरने लगे  हैं। यह तैराकी स्वयं किसी महामारी से कम मारक नहीं है। कुछ अति प्रबुद्ध लोग अर्थव्यवस्था और महामारी दोनों की विशेषज्ञता स्वयं पर थोपकर इस भारी समय में हल्का हो रहे हैं।

लॉकडाउन से बहुत लोग खलिहर हो गए। यह बात अलग है कि उनमें से अनेकों लोग वैसे हैं जो अपने कार्यालय में भी खलिहर ही होते हैं और अपने नियोक्ता के पेड आवर का सदुपयोग सोशल मीडिया पर विचारोत्तेजक विमर्शों में करते हैं। सरकार ने एपिक धारावाहिक रामायण और महाभारत के पुर्नप्रसारण का निर्णय किया। घर में बैठे लोग नॉस्टाल्जिया में गोते लगाने लगाने लगे। बतकट्टी और आलोचना के लिए प्रसिद्ध विघ्नसंतोषी बुद्धिजीवियों ने दूरदर्शन द्वारा कोरोना संकट पर इन धारावाहिकों के प्रसारण की आलोचना की। इन्हें गलत मत समझिए। इनकी दूरदर्शन से अपेक्षा यह थी कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों और चिकित्साविदों को मात देते हुए वह कोरोना की दवा बनाकर मानवता की रक्षा करता।

इस लॉकडाउन से देश के एक बड़े वर्ग ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ का अनूठा अनुभव पा लिया। कुछ लोग तो वर्क इन ऑफिस नहीं करते, वर्क फ्रॉम होम में उनकी उत्पादकता तो राम भरोसे होनी ही थी। कुछ ने अपने आचरण से आस जगायी और इस अलिखित नियम का पालन किया – संकट के समय खटनी के प्रति ईमानदारी और निष्ठा सामान्य दिनों से अधिक होनी चाहिए ताकि नियोक्ता और देश का नुकसान कम से कम हो। एक आधा जन तो ऐसे भी निकले जिन्हें कलियुग का हरिश्चन्द्र कहा जाएगा। ये वो लोग हैं जिन्होंने ‘वर्क फ्रॉम होम’ में सीएल और पीएल लिया। कुछ प्रताड़ित भी हुए जिन्हें ‘वर्क फ्रॉम होम’ के अतिरिक्त मेड न होने के कारण चूल्हा-चौका करके मेम साहब को मेम बनाए रखना पड़ा। सबसे चुनौती भरा काम वीरोचित भाव से बाजार जाना था जिसमें थोड़ा भी इधर उधर हुआ तो लठ्ठ बजने का खतरा था एवं घर पहुँचकर डिटॉल और सेंनेटाइजर स्नान की बाध्यता थी।

इस लॉकडाउन में वैसी कलाएँ खुलकर सामने आ रही हैं जो लगभग कूड़ा हो चुकी थीं। संगीत, नृत्य और अन्य ललित कलाओं के अनोखे, अनूठे और अजूबे नमूने सोशल मीडिया पर आए तो संकट का तनाव न सिर्फ कम हुआ बल्कि हमारा जीवट हुंकार भरता दिखा। खाना-खजाना के शौकीन विविध व्यंजन पका और खा ही नहीं रहे बल्कि सोशल मीडिया पर उसकी फोटो शेयर करके लोगों को पाक कला के लिए ऐसे उकसा रहे हैं कि रसोई प्रयोगशाला बन गयी है। आलसी लोगों सिर्फ ललच कर रह जाते हैं। टीआरपी के लिए कुछ भयावह कलाएँ तो टीवी समाचार वाले भी दिखा रहे हैं पर महफिल लूट रहा है सिर्फ शांत और संयत दूरदर्शन।

देश पर आयी विपत्ति में परोपकारी और दानवीर खुलकर सामने आए हैं और अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। एक ऐसा जनसमूह भी है जो दान करना अफोर्ड नहीं कर सकता लेकिन अमूल्य योगदान दे रहा है – सोशल डिस्टैंसिंग, अन्य सावधानियों का पालन करके और अफवाहों के पर कतर कर। कुछ डिमांडिंग लोग धनाढ़्यों में दानवीरता जगाने के लिए उनसे ऐसे तकाजे कर रहे हैं, जैसा उनका धन सार्वजनिक हो। आश्चर्य कैसा, इस देश में नैतिकता भी झकझोर कर जगायी जाती है।

पूरी दुनिया एकमत है कि कोरोना से बचाव का रामवाण है सोशल डिस्टैंसिंग। सरकार ने इसके लिए पहले निवेदन किया और बाद में लॉकडाउन से इसे बाध्यकारी कर दिया। फिर भी राजधानी के एक शहर-दालान में एक ही छत और चार दीवारी में हजारों लोग ऐसे पाए गए जैसे जनवासा लगा हो। अन्य जगहों से जाँबाजों द्वारा लॉकडाउन को मजाक बनाने की खबर है। इन सबके बीच लगभग पूरे देश ने मास्क लगाना सीख लिया, उन्होंने भी जिन्हें स्वयं को कोरोना संक्रमण नहीं होने का वहम है। लोग-बाग हाथ भी खूब धो रहे हैं। हर साल मार्च-अप्रैल में होने वाले सामान्य वायरल सर्दी-बुखार पर कोई सर्वे हो तो यह निश्चित ही पिछले साल से कम हुआ होगा। तो क्या हुआ जो लोगों को यह समझाना पड़ा – बाद में हाथ मलने से बचने के लिए अभी हाथ धोते रहें। यह सिर्फ कहावत है कि पैसा हाथ का मैल है। इसे दिल पर न लें। पैसा हाथ का मैल है, हाथ का मैल पैसा नहीं।

मोदी जी ने पिछले रविवार की रात के लिए एक टास्क दे दिया – सामूहिकता का बल और संकल्प दिखाने के लिए 9 मिनट तक बत्ती बुझाने और दीये जलाने का। जनता ने हमेशा की तरह प्रधानमंत्री और देश को निराश नहीं किया और सामूहिक संकल्प का अद्भुत प्रदर्शन किया लेकिन कुछ लोग यह भूल गये कि सामूहिकता का संकल्प भेड़ियाधसान की क्षुद्रता नहीं है और अनुष्ठान कोई भौंडा उत्सव नहीं। प्रधानमंत्री ने सामूहिक संकल्प के लिए बत्ती बुझाने और दीये जलाने के लघु अनुष्ठान का आह्वान किया था। पराक्रमी लोग आतिशबाजी करके कोरोना को भगाने लगे।

इस बात पर फोकटिया बहस जारी है कि लॉकडाउन 15 अप्रैल को खत्म होगा या नहीं। काश, इस बहस जितना ही आसान होता लॉकडाउन पर निर्णय। अलबत्ता, सरकार के विरोधियों के दोनों हाथों में लड्डू है। यदि लॉकडाउन समाप्त हुआ तो वे कोरोना पर सरकार को अगंभीर बताकर और नहीं हटा तो अर्थव्यवस्था पर दुबले होते हुए सरकार को कोसेंगे। सरकार समर्थक कोई भी प्रतिक्रिया 14 अप्रैल की रात 8 बजे मोदी जी के ‘मित्रों …’ से तय करेंगे। आइए तब तक आस की अलख जगाए रखें, जीवन की ज्योति जलाए रखें और जीवट के जीत की कामना करें।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

6 thoughts on “लॉकडाउन पर कुछ मीठा कुछ खट्टा

  1. बड़ी सहजता से आपने गंभीर बातों को सरस ढंग से व्यंग्य की मिठास बनाये हुए अभिव्यक्त किया है और निष्पक्ष होकर वर्तमान परिस्थिति में घटित हर घटना को छुआ है|

  2. शानदार लेख रंजन जी, यथार्थ 👍👌

  3. Excellent writing on present scenario of crisis Covid_19 Nation is facing never before and to that context Writer Rakesh Ranjan has done full justice to the prevailing system without hurting anyone in particular.
    Lovely read Thank You Mandali.
    Bestest Wishes always.

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