लॉकडाउन-4 जारी है … – मंडली
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लॉकडाउन-4 जारी है …

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संभवत: हम स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासदी से गुजर रहे हैं। अब यह समझना मुश्किल हो रहा है कि यह त्रासदी कोरोना की क्रूरता है या कोरोना के एक तात्कालिक प्रतिफल श्रमिक पलायन की करूणा। बहरहाल, कोरोना के विरुद्ध हमारा संघर्ष जारी है। सरकार के विरोधियों को भी यह मानना ही पड़ेगा कि सरकार ने समय पर लॉकडाउन करने का साहसिक निर्णय ले लिया था। साथ ही सरकार के समर्थकों तक को लॉकडाउन को अपेक्षित रुप से सफल बताने के लिए ढ़ीठ बनना पड़ेगा। लॉकडाउन-1 मल्टीपल रिसोर्स वाले सिंगल सोर्स के नाम रहा। लॉकडाउन-2 में भी सिंगल सोर्स का जलवा कायम रहा, साथ ही यह फोकटिया संवेदना की उठती हिलोरों का निवाला भी बना। लॉकडाउन-3 को गला तर्र करने वालों ने लूटते हुए सरकारी राजस्व का सूखा घड़ा लबालब कर दिया। रही सही कसर श्रमिक व्यग्रता और उनके लिए रुह के फाहा से ठेठायी जाती छाती के बीच फैली अव्यवस्था से पूरी हो गयी। लॉकडाउन-4 आया तो पहले ही दिन इसका गाजियाबाद बन गया। चारों लॉकडाउन में राजनीति करना ‘आवश्यक सेवा’ में अनौपचारिक रूप से शामिल दिखा।

लॉकडाउन के नियमों से लोगों को हमेशा जटिलता की शिकायत रहती है। बुद्धिजीविता पर लात धरते हुए मैंने इस बार नियम पढ़े और पाया कि लॉकडाउन-4 के नियम उतने जटिल हैं लेकिन उतने नहीं जितने 4-6 चैनलों को देखने के बाद लगते हैं – जितने मुँह उतनी बातें। कई बार तो एक ही मुँह कई बातें कर गुजरता है। आदमी कोरोना का अनिश्चय झेले या इनका फैलाया भ्रम। एक एंग्री एंकराइन बोलीं, “मुझे एक श्रमिक के जूते में आने दीजिए।” चैनल बदलते हुए मैं गुस्से में बडबड़ाया, “कोई इन्हें रंग्रेजी चैनल में भेजो।“ दूसरे चैनल पर एक झमझम संवाददाता ने सरकार से पूछा कि चीन की तरह भारत में कोरोना का दूसरा वेव आएगा तो क्या होगा। टीवी बंद करते हुए मेरा मन हुआ कि इस चपंडुक के कान के नीचे बजाकर पूछूँ, “पहला वेव चला गया है क्या बे?” लॉकडाउन-4 के नियमों में राज्य सरकारों को कुछ अधिक अधिकार दे दिए गए। बस नियमों में एक ही कमी रह गयी। लॉकडाउन-4 में दूरदर्शन को छोड़कर इन सभी न्यूज चैनलों को भी विश्राम दिया जाना चाहिए था। जब से खुले हैं बस खुले ही हैं और हमें खोल देने पर तुले हैं।

राज्य सरकारों ने अपने हिस्से के नियम बनाए। राज्यों के निय़म पढ़ने का समय मेरे पास नहीं था। जैसे तैसे यह पता चला कि लॉकडाउन-4 में लोगों का बनाया हुआ जोक चरितार्थ हो गया है कि लॉकडाउन लुंगी की तरह है जो कमर से भले ही बँधी हो पर उसका ‘फुरहुरा’ नीचे से पूरा खुला है। ‘हेती चुकी’ दिल्ली में आँकड़ों की बाजीगरी के बावजूद 10000 से उपर कोरोना पीड़ित हैं पर दिल्ली के मालिक ने दिल्ली को ऐसे खोला कि लुंगी बने लॉकडाउन का ‘फुरहुरा’ एक बिलांग और उपर करके ‘टुंग’ दिया गया है।

पूँजी, तकनीक और उद्मशीलता एवं श्रम और कौशल आदर्श रुप में एक दूसरे के पूरक होने चाहिए। दुर्भाग्य से श्रम और कौशल गरजू हो गये या कर दिये गये। तय मानिए कि कोरोना पलायन के बाद अब दूसरा पक्ष गरज में दिखेगा। दोनों पक्षों की बारी-बारी से दिखने वाली गरज आत्मनिर्भर भारत की राह का बहुत बड़ा रोड़ा है। मजदूर रूक नहीं पा रहे, उनके नियोक्ता और वहाँ की सरकार उन्हें न रोक पा रही हैं और न भेज पा रही हैं। वे घर जा नहीं पा रहे, उनके गृह राज्य की सरकार उन्हें बुला नहीं पा रही। कई बार मजदूर, नियोक्ता और सरकार सब बेबस दिखते हैं पर इंडिया टुडे ने हार नहीं मानी। वह बेबसी की तस्वीरें जन जन तक पहुँचाने के मिशन पर दिखा ताकि इस मुद्दे पर जन-जागृति आए। तो क्या हुआ जो इससे समूह चार पैसे बना लेता है। श्रमिक पलायन पर स्थिति को देखते हुए अब ऐसा लगता है कि उन्हें लॉकडाउन से पहले भेज देना चाहिए था लेकिन तब किसे पता था कि लॉकडाउन यूँ औंधे मुँह गिरेगा।

कोरोना से फैले अनिश्चय में सबको अपने घर जाना है। पैदल, साइकिल, ठेला, ऑटो, बस ट्रक, डंफर और ट्रेन से लाखों चले गये। लाखों का जाना अब भी शेष है। सड़कों पर कारवाँ चल रहा है, स्टेशनों का बाहर जन सैलाब उमड़ रहा है और टीवी स्टूडियो में खीज पैदा करने वाला कोलाहल मचा है। श्रमिक पलायन की आ रही तस्वीरें हृदय विदारक हैं लेकिन बेबसी के बीच जारी छिटपुट हुल्लड़बाजी से ऐसा लगता है कि सब मजदूर नहीं हैं और यदि सब मजदूर हों भी तो सब मजबूर नहीं हैं। जबलपुर में ‘लूट लेलकई … लूट लेलकई’ के बीच स्टेशन पर हुई लूट एक भूख है लुच्चापंथी की और प्यास है, छाल्टीपना की। झाँसी में भी इसकी ही झाँकी देखने को मिली।

विभिन्न राज्य सरकारों ने मजदूरों से पल्ला ही नहीं झाड़ लिया है। आवागमन में संक्रमण के खतरे हैं लेकिन एकमात्र राज्य सरकार योगी सरकार है जो जिम्मेदारी उठाने आगे आयी है। उसने अपने लोगों को बुलाया है और दूसरे राज्य के लोगों को भिजवाया है। ‘हकासल पियासल’ श्रमिकों के लिए सवारी के ‘हचकाल’ के बीच प्रियंका वाड्रा ने योगी सरकार से 1000 बसों का जत्था भेजने की अनुमति माँगी। योगी सरकार ने अनुमति दे भी दी और लगा कि किसी राज्य सरकार ने कोरोना को राजनीति से परे रखने की कोशिश की है। मन में आस जगी कि 1000 बस प्रियंका जी चला रही हैं, 2000 राहुल जी चला देंगे और 5000 सोनिया जी। लोकलाज में दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा 10000 बसें चला देगी तो साठ-आठ लाख लोग इन बसों में चले जाएंगे और बाद बाकी को श्रमिक स्पेशल टान लेगी। काश, ऐसा हो पाता। 1000 बसें दौड़ने वाली थीं लेकिन कागज के घोड़े दौड़ रहे हैं – उत्तर प्रदेश सरकार-प्रियंका गाँधी वाड्रा, टू एंड फ्रॉम। ‘राजनीति नहीं करना’ के संकल्प के बीच जमकर राजनीति हो रही है। हो रही राजनीति को ‘फुल्ल थ्रॉटल’ में डालकर कांग्रेस के पुनिया जी ने इसे स्वस्थ भी नहीं रहने दीजिए।

सारा फोकस श्रमिकों के घर पहुँचने पर है लेकिन कोरोना की बड़ी चुनौती वहाँ से शुरु होती है। बिहार में दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल और हरियाणा से आए श्रमिकों का कोरोना टेस्ट परिणाम डरावना है। संक्रमण रोकने के लिए क्वोरंटीन प्रक्रिया के लिए राज्यों के पास संसाधन नहीं हैं। जितने हैं उनका भी ढंग से उपयोग नहीं हो रहा। कहीं इंस्टीच्यूशनल क्वोरंटीन में हलवा मिल रहा है, कहीं पेड़ के नीचे ही क्वोरंटीन सेन्टर बना है। समस्तीपुर, बिहार में वैल्यू एडिशन के तहत क्वोरंटीन सेन्टर में 2-3 डासर्स भी बुलायी गयी थीं। होम क्वोरंटीन के अनुपालन के लिए राम राज्य होना आवश्यक है। जहाँ होम क्वोरंटीन हो रहा है, वहाँ राम राज्य ही समझिए – बंगाल सबसे बड़ा उदाहरण है।  पंचायतों को क्वोरंटीन कराने की जिम्मेदारी देने में हो रही समस्या का कारण यह है कि ग्राम सभा का वोट बैंक लोकसभा के वोट बैंक से कम दुलरुआ नहीं होता है। अगला चुनाव भी तो होगा। पंचायत के लोग जागरूक हैं और मुखिया/ प्रधान के प्रभाव में नहीं हैं तो ठीक वरना भैंस पानी में ही है।

सरकार ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा कर दी है। पैकेज का ब्रेक-अप समझना टेढ़ी खीर है। जितना उपर-झापर समझ आया उसका लब्बोलुआब यह है कि आत्मनिर्भर बनते हुए फिलहाल लुका के अपना जीवन बचाइए, उसके बाद कौशल या खुशामद से अपनी नौकरी और पौरुष से अपना व्यापार। बाद बाकी सरकार जितना कोरोना पर कर सकी है उतना अर्थव्यवस्था पर भी कर ही गुजरेगी।

अंत में मुझे यह कहने दीजिए कि अपनी ही नीतियों के टुच्चे कार्यान्वयन से कोरोना प्रसार रोकने में बुरी तरह विफल रहे बाबू और उनके मालिक-मुख्तार कोरोना के साथ सह-आस्तित्व का प्रवचन देकर उन्हें चिढ़ा रहे रहे हैं जो लॉकडाउन का समग्रता में पालन करने के लिए अपना नुकसान उठाकर और सुविधाओं से समझौता करके अपने घरों में लुकाये रहे। नियम के पाबंद इन आम जनों के साथ हुए इस अन्याय के बीच आइए यह प्रार्थना करें कि लॉकडाउन हटे, कोरोना जाए, जीवन अपनी पटरी पर वापस लौटे और यह लेखक अपना अगला लेख ‘कोरोना एग्जिट’ पर लिखें।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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