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लॉकडाउन-3: पहला दिन धूमगज्जर का

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कोरोना संकट की स्थिति देखते हुए लॉकडाउन-2 के अतिंम दिनों में यह जोक बनने लगा था कि लॉकडाउन उतना ही खुलेगा जितना कोरोना फैलाने वाले चीनियों की आँख खुलती है। लगभग ऐसा ही हुआ। एक सरकारी आदेश आ गया। उसके पीछे स्पष्टीकरण आने लगे – हमेशा की तरह आदेश से अधिक अस्पष्ट स्पष्टीकरण। दरअसल, ऐसे आदेश और स्पष्टीकरण साहेब-सुबा लोग तैयार करते हैं। साहेब-सुबा बनने की पढ़ाई में बहुत माइंड जलता है। बचा हुआ माइंड अमला-फमला की हनक और मालिक-मुख्तार की सनक से कुन्द हो जाता है। ड्राफ्ट में आम लिखना होता है तो वे इमली लिख बैठते हैं और समझने वाले कटहल समझ लेते हैं। स्पष्टीकरण देते हुए साहेब-सूबा इसे तरबूज बता देते हैं। फिर लोग तरबूज कटने और बँटने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इसलिए मेरे जैसे होशियार लोगों ने आदेश के विस्तार में न जाने में ही अपनी भलाई समझी और संक्षेप में यह समझ लिया कि लॉकडाउन-3 आरम्भ हो गया है।

लॉकडाउन विस्तार पर कई लोग आग-बबूला भी हुए। लॉकडाउन जिस दिन उठाया जाएगा, उस दिन भी ये कुपित होंगे। यदि लॉकडाउन कल ही उठा लिया गया होता तो ये जान के लिए उतने ही चिन्तित होते जितना अभी लॉकडाउन विस्तार पर जहान के लिए हुए जा रहे हैं। इनका चिन्तन देखकर आशंका होती है कि कहीं ये स्वयं ही चिन्तनीय न हो जाएं। बहरहाल, सरकार ने जान और जहान के बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है। इसमें दो नाव की सवारी वाली स्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

कोरोना के ताप से जलती दिल्ली के मालिक कोरोना के साथ जीना सीखने का आह्वान करते हुए जहान की तरफ कुछ अधिक ही झुके दिखे, यह कह कर कि दिल्ली एक लाख तक के कोरोना संक्रमितों की स्थिति से निबटने के लिए तैयार है। वैसे लॉकडाउन-1 में दिल्ली सरकार 70 लाख लोगों को खाना खिलाने के लिए भी तैयार थी पर लोग ही उच्छृंखल निकले और डीटीसी के अनुशासहीन ड्राइवरों ने इन लोगों को आनन्द विहार पहुँचा दिया। दिल्ली पुलिस दिल्ली के कोने-कोने से आनन्द विहार तक लॉकडाउन का उल्लंघन नहीं देख पाई क्योंकि वह मौलाना साद को खोजने में व्यस्त थी, अब भी खोज रही है।

लॉकडाउन-3 के फैसले के साथ सरकार ने यह स्वागत योग्य निर्णय लिया कि प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजा जाएगा। अधिकांश राज्य सरकारों ने इसके लिए रेल चलाने की माँग की और इसे मान भी लिया गया। रेल चली तो लोग इस बात पर लड़ने लगे कि प्रवासी लोगों से रेल किराया लिया जाए/ नहीं लिया जाए या लिया जा रहा है/ नहीं लिया जा रहा है। इन सबके बीच एक बात कोई नहीं पूछ रहा कि जिस आवृति से और सोशल डिस्टैंसिंग ऑक्यूपेन्सी से गाड़ियाँ चलायी जा रही है, उससे करोडों लोग कितने दिन में ढ़ोए जा सकेंगे।

अन्यथा सुसुप्त पड़ी काँग्रेस पार्टी प्रवासी मुद्दे पर अचानक जाग गयी और उसने मौके पर चौका मारते हुए वर्षों से बंद अपना बटुआ खोलने की घोषणा करके रुई के फाहा से छाती ठेठा लिया। उधर बिहार के परम प्रतापी विपक्षी नेता ने प्रवासियों को लाने के लिए बिहार सरकार को 50 फ्री ट्रेन देने की घोषणा कर डाली। लोग कयास लगा रहे हैं कि पूर्व रेल मंत्री के पुत्र का कितना बड़ा यार्ड होगा जहाँ ये 50 ट्रेने लगायी जाती होंगी।

विभिन्न राज्य सरकारों की एजेन्सियाँ घर जाने के इच्छुक लोगों का नामांकन कराने के लिए प्रयासरत हैं। इसी क्रम में एक बिहारी अधिकारी ने ट्वीट किया कि बिहार में फँसे लोग यदि अपने राज्य जाना चाहते हैं तो संपर्क करें। एक बाल मनचले ने उन्हें उत्तर दिया, “बिहार में सिर्फ बिहारी फँसे हैं।“ प्रवासियों की घर वापसी की कोशिश में एक विरोधाभास भी दिखता है। सरकार आर्थिक गतिविधियाँ यथाशीघ्र आरम्भ करना चाहती है। इन मजदूरों के बिना निर्माण और उत्पादन का काम पता नहीं कैसे होगा। मजदूर चाहते है, इसलिए वे अपने घर जाएं लेकिन कोरोना की स्थिति के मद्देनजर उनको निकट भविष्य में पुन: इन शहरों में बुलाने के लिए नौ दिये का तेल जलाकर भी बात नहीं बनेगी। हो सकता है कि इसी बहाने सरकार को देश के कुछ हिस्सों में केन्द्रीकृत हुए उद्योगों के नुकसान का भान हो जाए।

लॉकडाउन-३ का बुलन्द आगाज तो मधुप्रेमियों ने ही किया जो रोजा की खरीददारी वालों से भी जारिहाना था। सूखे गले को तर्र करने का अवसर हाथ लगा तो कोरोना जनित अनिश्चय और निराशा को कोसों दूर भगाकर इन्होंने मीलो लंबी लाइन लगा दी। चैनलों पर मधुशालाओं विजुअल्स देख कर लगा कि मधुप्रेमी अर्थव्यवस्था में प्राण फूँक ही डालेंगे। सरकार को राजस्व मिलेगा और मयप्रेमियों की प्यास बुझेगी और रक्षा तो भगवान को ही करना है कोरोना से। अपनी जाँबाजी से लॉकडाउन के कारण अपने घर में लुकाये लोगों के लिए मयप्रेमियों ने साहसिक संदेश दिया – जो डर गया, समझो मर गया। तो क्या हुआ जो मय प्रेम में सोशल डिस्टैंसिंग की धज्जियाँ उड़ती दिखीं। सोशल डिस्टैंसिंग का अनुपालन सुनिश्चित करना है तो बिहार मॉडल अपनाते हुए शराबबंदी लागू करिए।  लुका छिपा कर होम डिलीवरी होने पर भी सोशल डिस्टैंसिंग बनी रहेगी क्योंकि यह डील ‘एकन्ता-तुरन्ता’ होती है। देश के मधुप्रेमियों द्वारा लॉकडाउन के पहले दिन किये गये धूमगज्जर से बिहार के एकन्ता-तुरन्ता डील करते मधुप्रेमियों ने आह भरी – हमारी ऐसी किस्मत कहाँ! हम तो सुशासन में सिसक रहे हैं।

लेख छपते-छपते यह खबर मिली है कि दिल्ली के मयप्रेमियों ने लॉकडाउन-3 के दूसरे दिन दिल्ली सरकार द्वारा शराब पर लगाये गये 70 प्रतिशत कोरोना शुल्क से विचलित हुए बिना फिर से लंबी कतारें लगानी शुरू कर दी हैं। देश गरीब होगा, मधुप्रेम में गरीबी बाधक नहीं बनती।

लॉकडाउन दिन का पहले दिन उत्साहजनक नहीं था। कल लगभग 3900 नये कोरोना संक्रमित निकले। स्थिति तनावपूर्ण तो पहले से ही है, आज अनियंत्रण की ओर प्रवृत्त भी दिखी। कोरोना नियंत्रण की जिम्मेदारी सरकार से अधिक जनता पर है। जनता हर मुद्दे की तरह कोरोना का ठीकरा सरकार पर भले ही फोड़ दे पर बिल जनता पर ही फटना है। शेष मुद्दों का बिल भी जनता पर ही अप्रत्यक्ष रुप से फटता है। परिपक्वता का लबादा यदा-कदा ओढ़ती जनता समझ ले।

अंत में मुझे यह कहने दीजिए कि कोरोना संकट से निबटने के लिए पहले से कोई बना-बनाया मैनुअल नहीं हैं। इसलिए कोरोना पर सरकार की नीतियाँ गलत हो सकती हैं लेकिन नीयत ठीक है। नियति सुखद करने की जिम्मेदारी जनता पर है।

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

4 thoughts on “लॉकडाउन-3: पहला दिन धूमगज्जर का

  1. लाजवाब! बीच में गोलू की भी आवाज़ सुनाई दे रही है। 😂

  2. बहुत खूब !
    आम से इमली से कटहल से तरबूज 🤣🤣

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