लॉकडाउन में लेखन – एक प्रयोग – मंडली
मंडली

लॉकडाउन में लेखन – एक प्रयोग

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विगत कुछ मासों से कुछ भी नहीं लिखा थाकुछ कर्म की व्यस्तता में, कुछ निठल्लेपन के कारण।व्यंगोक्ति देखिये कि दूसरा प्रेरित कर रहा है लेखन को।

 

विषय-वस्तु पर आना लिखने वाले को बाध्य करता है, विचारों की सीमा रेखा तय करता हैं।  संभवतः ये भी एक कारण हैं न लिख पाने का।  ‘लय में नहीं होना – ये संपादन की दक्षता दर्शाता है या लेख की विसंगति, यह विचार का विषय है। आवश्यक तालाबंदी का प्रयोग तो सरकार ने दस दिन पहले ही कर लिया था। मनुष्य कितना अदूरदर्शी  होता है, ये पहली सीख मिली तालाबंदी से। आगामी तालाबंदी के बारे में तो ज्ञान हो गया पर अपने ऊपर आगत प्रयोगों से अनभिज्ञ रहा मनुष्य।

 

पहले दिन सुबह-सबेरे मिलने वाली चाय असामान्य लगी। इतस्ततः  स्वर निकले ही थे कि माता जी ने कहा, तुम्हारी  आदते बिगड़ गयी हैं, प्रातः प्रभु को धन्यवाद देकर हीं कुछ मुँह में डालना चाहिए अन्यथा दिन भर बेस्वाद रहोगे।” माते के तर्क के आगे घर में पिता जी की नहीं चलती, मैं तो उनके लिए बालक हूँ। मुझे आभास हुआ कि पत्नी के चेहरे पर एक हल्की पर सुखदायी मुस्कान थी।  रहस्य  पर से पिताजी के प्रयास से तीन -चार दिन बाद पर्दा उठा। आकस्मिक  भाव से उनके मेरे द्वारा  पूछे  गए प्रश्न को दोहराने पर उनकी लाड़ली बहु ने मेरे बेस्वाद होने के लिए सुबह -संध्या वाली चाय में एक चुटकी हल्दी का दोष बताया।

 

दिन भर चार बड़े-बड़े  अलमारियों का खिसका कर, उनके पीछे सफाई और पुनः यथास्थान रखने के लिए चाय में हल्दी लाभकारी होती  हैं।  पंजाब  पुलिस का एक वीडियो बहुत प्रचलित हुआ है जिसमे वो माताओ और बहनो से निवेदन  करती हैं कि घर में बैठे पुरुषों को बाहर न निकलने दे और उन्हें  यथाशक्ति गृह-कार्य  में लगाएं। पंजाबनों ने कितना अमल किया, पता नहीं पर सदूर पूर्व के शहर की एक महिला ने इन्हें निराश नहीं किया। सुना है कि पंजाब  वाले चाय कम ही पीते हैं।  पंजाब पुलिस को हल्दी के बारे में भी बताना चाहिए, लत भी छूटेगी और सफाई भी होगी।

 

परिवार के सदस्यों में केवल एक व्यक्ति ही निकलता हैं  आटा -दाल के लिए। ये तो मेरे अधिकार क्षेत्र में हैं पर चौक पर खड़े होकर स्टाइल मारने की गलती नहीं करता हूँ क्योंकि पुलिस अपने क्लास में तो हैं ही और आजकल फ़ॉर्म में भी चल रही है। ओड़िशा  पुलिस और राज्यों के पुलिस की अपेक्षा काफी शांत हैं पर इतनी भी नहीं कि लोग मार्ग पर निठ्ठले जैसे घूमते रहे और वो समझाते -बुझाते हीं रहें। पुलिस आखिर पुलिस ही होती है।

 

पुलिस के प्रश्नों से जटिल पिता जी के प्रश्न रहते हैं।  माता जी ने मेरे लिए बाहर की  बेसिन में साबुन रखवा दिया हैं। चाइनीज़ वायरस साबुन से हाथ धोने पर जायेगा या नहीं। यह प्रयोग मेरे ही कर-कमलों पर निश्चित कर लेती हैं वो। घर की छोटी मालकिन डिटॉल से स्नान तथा कपड़े अलग रखने पर अन्मय रहती हैं। मनुष्य बेस्वाद नहीं होगा तो और क्या होगा – भोजन भी डेटॉलमय लगता है। 

 

दूसरों पर राय देने से श्रेष्ठकर हैं अपने पर प्रायोजित प्रयोगों से बचना।  प्रयोग  जारी हैं, कुछ का तो मुझे ज्ञान भी नहीं।  अन्यथा न लें। ये मेरे लेखन का भी एक प्रयोग है। अगर आप इसे सफल बनायेंगे तो मंडली से निवेदन किया है कि लेख के नीचे नीचे क्रमशः’ लिख दें। वैसे संपादक जी का मिजाज कुछ ऐसा नहीं कह रहा, दो दिन से इन्होंने मेरा ई-मेल या तो देखा नहीं या देखकर अनठियाते रहे। बहरहाल, यदि हम लेख आपको अच्छा लगा तो संपादक जी को पोंछिया कर छपवा भी लेंगे।

 

सुरक्षित रहिए!

 

लेखक – अतुल कुमार (@Khakshar)

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