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एक खुला पत्र ‘पत्रकारों’ के नाम

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प्रिय पत्रकार,

पत्रकार शब्द से मत चौंकिये। यहाँ इस शब्द का सामान्य अर्थ नहीं है। नाटक लिखने वाला नाटककार कहलाता है, गीत रचने वाला गीतकार और ट्वीट करने वाला ट्विटकार तो पत्र लिखने वाला भी पत्रकार कहा ही जा सकता है। सामान्य अर्थ के पत्रकारों से भी हम कभी रूबरू होंगे। यदि आप सामान्य अर्थ वाले पत्रकार हैं तो प्रतीक्षा करें। यदि आप सामान्य अर्थ वाले पत्रकार हैं और पत्र लिखने वाले भी तो आपको वन प्लस वन स्कीम में सफलता पर बधाई है। यहाँ जिस पत्र की बात हो रही है, वह न पिया की पाती है, न मित्र का स्नेहिल पत्र, न फिरी के भोज-भात का निमंत्रण पत्र, न क्रय-विक्रय का व्यवसायिक पत्र और न ही सरकारी कार्यालयों से निकलने वाला वैसा पत्र जिनका अर्थ मुरी हगुआने पर भी नहीं समझ आता। यहाँ एक विशिष्ट पत्र की बात हो रही जिसे हम ‘खुला पत्र’ कहते हैं।

खुले पत्र में सब कुछ खुला होता है। लिफाफा लगता नहीं और यह गोंद से चिपकता नहीं। मजमून या लिफाफा छोड़िए पत्र का एक-एक अक्षर खुली किताब होता है। पत्रकार का मंतव्य भी खुलकर सामने आ जाता है, यदि वह छिपाना भी चाहे। सरकारी कामकाज और एनजीओ के तौर-तरीकों में आज तक पारदर्शिता नहीं आ सकी। उस घाटे की भरपाई दो ही जगह हुई है – एक हमारी सिने तारिकाओं के परिधान में और दूसरी इन खुले पत्रों में। इन पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें सब पढ़ते हैं, सिवाय उसके जिसके नाम यह लिखा जाता है।

खुले पत्र को लेकर मेरे एक दुविधा मन में है। संचार क्रांति के इस दौर में सब कुछ डिजिटल हो गया। खुले पत्र खुला ई-मेल क्यों नहीं हो रहे? अब तो भारतीय डाक के अन्तर्देशीय और पोस्टकार्ड भी पुरातात्विक महत्व के लिए संजोये जा रहे हैं। एक दूसरा विरोधाभास यह है कि खुले पत्र पत्र कहे जाते हैं और इनका प्रसार इंटरनेट पर किया जाता है। देश में इस मुद्दे पर सार्थक विमर्श हो।

खुला पत्र लिखने का सिलसिला चाहे किसी ने भी आरम्भ किया हो लेकिन आप समकालीन पत्रकार (Pun इंटेंडेड) साधुवाद के पात्र हैं, इसे नयी गति और नया आयाम देने के लिए। आप भद्रजन असहिष्णुता, अनाचार, अभद्रता और आपदा दिखते ही या न दिखने पर भी दिखाते हुए सीधे प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिख डालते है। यह समझा जाता है कि खुला पत्र लिखने के लिए व्यक्ति का बुद्धिजीवी होना आवश्यक है। बुद्धि से जीने वाले लोग ही खुला पत्र बेच सकते हैं। बेच सकने से मेरा अभिप्राय खुले पत्र के विपणन से है वरना कोरोना की इस विपदा में लेखकीय कौशल में कमी के बावजूद मैं बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर दिल्ली के मालिक और भारत के प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिख दूँ। ये माननीय तो बुद्धिजीवियों के पत्र भी नहीं पढ़ते, मेरा क्या खाक पढ़ेंगे पर मेरे पत्र को तो बाहर से भी कोई पाठक नहीं मिलेगा। बुद्धिजीवी मैं हो नहीं सकता और इस उम्र में विपणन पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिलना मुश्किल है। इसलिए मैंने वैसा खुला पत्र लिखने का कार्यक्रम रद्द कर दिया।

बुद्धिजीवियों के खुला पत्र लिखने का एक बड़ा लाभ यह है कि वे स्वाभाविक मुद्दों पर सहजता से लिखते हैं और मुद्दे न हों तो मुद्दा बना कर प्रखरता से। उनके बाल भले ही धूप में न पकें हो पर उन्हें धूप और छाया की समझ होती है। जहाँ आवश्यक हो वहाँ छायावाद जड़ देते हैं। जहाँ जरुरी लगा वहाँ घाम-बेयार दिखा देते हैं। उनकी पत्रों की शब्दावली और भाव ऐसे होते हैं कि कोई धूप से तिलमिलाने लगता है तो कोई ठंडी छाँह से मुस्कुराने। खुले पत्रों को दिल से लिखने का दावा किया जाता है। इन दावों में गहराई उतनी ही है जितनी दिल की गहराईयों से दिये जाने वाले मुबारकबाद में होती है। खुला पत्र आम तौर पर एकपक्षीय होता है। इससे खुला पत्र लिखने वालों की ईमानदारी पर कोई संशय मत कीजिए। वे दूसरे पक्ष को जानबूझकर गौण इसलिए करते है कि कल को लोग-बाग ‘मंकी बैलेंसिंग’ का आरोप न लगाने लगें। पत्र में स्वाभाविक या कृत्रिम कैसा भी मुद्दा हो, पत्रकार का काम मुद्दा उठा देना भर है। यह मोटी बेरियाँ उठाने वाले पलदारों से भी भारी काम है। मुद्दे का समाधान खोजने की मगजमारी भी वही करें, यह अपेक्षा अन्याय है।

खुला पत्र लिखा ही नहीं जाना चाहिए बल्कि इसका दायरा भी बड़ा किया जाना चाहिए। यह आवश्यक लगता है कि पृथ्वी एक खुला पत्र हम धरती वासियों के नाम लिखे और सूर्य सौरमंडल के नाम। लोकतंत्र एक खुला पत्र लिखे राजनीतिज्ञों, मतदाताओं और मीडिया के नाम और व्यवस्था व्यवस्थापकों के नाम। लेखन, कला और खेल खुला पत्र लिखें लेखकों और कलाकरों, खिलाड़ियों एवं खेल से खेलते खेल प्रबंधकों के नाम, किताबें, कलाकृतियाँ और खेल पाठकों, कलाप्रेमियों और खेलप्रेमियों के नाम। युद्ध खुला पत्र लिखे युद्ध प्रेमियों का नाम और शांति कबूतरबाजों के नाम। दया और संवेदना एक खुला पत्र लिखें दयालुओं और संवेदनशीलों के नाम, रिश्ता रिश्तेदारों के नाम। इतिहास इतिहासकारों के नाम निश्चित ही एक कड़ा खुला पत्र लिखे। लगे हाथों वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यममार्ग भी एक खुला पत्र लिख गुजरें क्रमश: वामपंथियों, दक्षिणपंथियों और मध्यमार्गियों के नाम। ऐसे और भी पत्र लिखे जा सकते हैं। एक बेहद खास विषय से मैं जानबूझकर बच रहा हूँ।

उपरोक्त सारे खुले पत्र यदि परम्परा तोड़ते हुए ईमानदारी से लिखे जाएं और उसका उत्तर उसी भाव से देते हुए तदनुसार आचरण किया जाए तो यह विश्वास करिए कि दुनिया नयी दिखेगी। यह पहले से ही सुन्दर है, अति सुन्दर हो जाएगी। साथ ही मुझे यह आशा करने दीजिए कि यह खुला पत्र अपनी श्रेणी का पहला होगा जिसे वे पढ़ेंगे जिनके लिए यह लिखा गया है। पिछले वाक्य को बाकियों के पढ़ने पर मनाही समझ कर इस पत्र को इग्नोर न करें, प्लीज।

आपका विश्वासभाजन                                                                                                                   एक सह-पत्रकार (पत्र लिखने वाला)

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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