कश्मीर पुर्नगठन बिल: ऐतिहासिक त्रुटि का परिमार्जन – मंडली
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कश्मीर पुर्नगठन बिल: ऐतिहासिक त्रुटि का परिमार्जन

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कश्मीर पुनर्गठन बिल सही मायने में एक ऐतिहासिक कदम है। 35A की छुट्टी, 370 का खात्मा, लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाना और जम्मू-कश्मीर को अर्द्ध राज्य का दर्जा देना, ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि आँखों देखी पर विश्वास करना कठिन है। इस एक फैसले ने गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सबसे अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक अमरता दे दी है। कश्मीर पर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक गलती की जो कीमत भारत ने पिछले सत्तर सालों में चुकाई है उसका हिसाब तो इतिहास में होगा ही लेकिन उस गलती को ठीक करने के लिए जिस साहस और सूझ-बूझ का परिचय मोदी सरकार ने दिया है, वह भी स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।

आज भाजपा-जनसंघ के उस यात्रा को याद करने की भी आवश्यकता है जिससे धारा 370 के विरोध को अलग करके देखा ही नही जा सकता। जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के विरोध में सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके देहावसान के बाद जनसंघ में क्या ही बच गया था। जनसंघ के सामने थे नेहरू जैसा करिश्माई नेता और देश को स्वतंत्र कराने वाली कांग्रेस पार्टी। सत्ता पर तो जनसंघ का कोई दावा ही नही था लेकिन विपक्ष में भी कहाँ जगह थी। जेपी, लोहिया और कृपलानी जैसे समाजवादी और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे मुक्त अर्थव्यवस्था समर्थक विपक्ष की शोभा थे। सत्ता से विपक्ष तक मे समाजवाद की नदी बह रही थी। इस मुकाबले के लिए जनसंघ में क्या था। नेता राष्ट्र के लिये शहीद हो चुका था, बचे थे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भेजे गए स्वयंसेवक और प्रचारक। लेकिन इन्होंने तो अभी राजनीति का ककहरा तक नही सीखा था। जनसंघ नेता विहीन तो हो गया था लेकिन नीति विहीन नही हुआ। धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर पार्टी टिकी रही।

1996 और फिर 1998 से 2004 तक भाजपा को केंद्र में गठबंधन सरकार को नेतृत्व देने का अवसर मिला लेकिन अपने मूलभूत मुद्दों पर काम करने का मौका नही मिला। 2014 में लोकसभा में तो पूर्ण बहुमत मिला लेकिन राज्यसभा में हालत खस्ता रही। आज जब दोनों सदनों में पार्टी के पास महत्वपूर्ण बिल पास करने की शक्ति है तो धारा 370 की छुट्टी कर प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के पितृपुरुष डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। इसके साथ ही पार्टी ने अपने वैचारिक समर्थकों को यह भरोसा भी दिलाया है कि पार्टी के मूलभूत मुद्दे आज भी संज्ञान में है और उचित अवसर पाकर वे संकल्प पूरे किए जाएंगे।

विरोधी कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन और 370 को अप्रभावी करना अलोकतांत्रिक कदम है। लेकिन तथ्य तो यही है भाजपा-जनसंघ ने अपने प्रत्येक घोषणापत्र में 370 हटाने का वादा किया है। चुनावों में किये गए वादे को पूरा करना कब से अलोकतांत्रिक हो गया? उल्टे यदि भाजपा 370 हटाने का प्रयास नही करती तो वह अलोकतांत्रिक और जनादेश का अपमान करने वाली बात होती।

जम्मू-कश्मीर राज्य में लोकसभा की 6 सीटें हैं। उनमें से 3 भारतीय जनता पार्टी के पास है। राज्य में तीन अलग अलग क्षेत्र हैं। उनमें से 2 क्षेत्रों जम्मू और लद्दाख में 370 के खात्मे को पूरा समर्थन है। जम्मू-कश्मीर राज्य पिछले 70 वर्षों से कश्मीर के चंद साम्प्रदायिक और पाकिस्तानपरस्त लोगों के हाथ का खिलौना बना हुआ था जहाँ जम्मू और लद्दाख की भावनाओं का कोई मूल्य न था। यह पहली बार है जबकि जम्मू और लद्दाख की भावनाओं को सम्मान मिला है।

महबूबा मुफ्ती कह रही हैं कि भाजपाई प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत का नारा दिया था और मोदी को भी उसी रास्ते चलना चाहिए। लेकिन वाजपेयी के इस नारे का कश्मीर ने क्या उत्तर दिया, भी तो देखा जाना चाहिए।

यह भी देखा जाना चाहिए कि जब इतिहास की एक भारी भूल में सुधार किया जा रहा था, तब कौन कहाँ खड़ा था। कभी लोहिया ने कहा था कि धारा 370 के खात्मे के बिना भारत की अखंडता अधूरी है। लेकिन जब सदन कश्मीर के पुनर्गठन और 370 पर वोटिंग कर रहा था, तब लोहिया की उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली आधा दर्जन पार्टियों में से मात्र एक लोकजनशक्ति पार्टी ही एक ऐसी थी जिसने इस विधेयक के समर्थन में मतदान किया।

कांग्रेस ने इस विधेयक पर जो रास्ता अपनाया, वह आत्महत्या का रास्ता है। नेहरू ने कभी कहा था कि 370 घिसते घिसते घिस जाएगा। ऐसे में कांग्रेस कह ही सकती थी कि यह अब घिस गया है। लेकिन कांग्रेस समझदारी की बात करने लगे तो लोगों को लगेगा कि अब राहुल गाँधी का कांग्रेस की नीतियों पर प्रभाव नही रहा। राहुल गाँधी का कहना है कि राष्ट्र सिर्फ भूमि भर से नही बनता। ठीक बात है, राष्ट्र भूमि का टुकड़ा मात्र तो नही है। किंतु क्या भूमि के बिना राष्ट्र सम्भव है? सम्भव भी हो तो क्या वह आदर्श राष्ट्र होगा? राहुल गाँधी को स्कन्दगुप्त की जीवनी पढ़नी चाहिए। गुप्तवंश के इस महान शासक ने भारत की रक्षा के लिए पश्चिमी सीमा पर कितनी ही रातें युद्धभूमि में खुले आकाश के नीचे सो कर गुजार दी। अपने पूर्वजों की भूमि, उसका इतिहास, उस पर खड़ी निशानियाँ और उनकी रक्षा के लिए सर्वस्व त्याग देने की भावना, यही तो राष्ट्रवाद है। इसी राष्ट्रवाद के लिए तो बंगभूमि में जन्में डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। लेकिन दुर्भाग्य है कि कौल दत्तात्रेय गोत्र के तथाकथित कश्मीरी पंडित राहुल गाँधी यह समझने में नाकामयाब रहे। कांग्रेस के वे नेता निश्चित ही बधाई के पात्र हैं जिन्होंने राहुल गाँधी को आँख दिखाते हुए इस मुद्दे पर सरकार का साथ दिया है।

लेखक मुख्य रुप से राजनीतिक आलेख लिखते हैं। उनकी विषयवस्तु समसामयिक राजनीति से लेकर स्वतंत्रता के बाद के भारत का राजनीतिक इतिहास है। वह विषयवस्तु की वस्तुनिष्ठ विवेचना करते हैं। राजनीतिक मुद्दों की गहरी समझ के साथ वह आरएसएस संबंधी मामलों के जानकार समझे जाते हैं। लेखक नियमित रुप से लोपक.इन के लिए लिखते रहे हैं। उनके लेख ‘द प्रिंट’ में भी प्रकाशित हो चुके हैं। लेखक पेशे से एकाउंटेन्ट हैं।

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