जो फिट है वो हिट है – मंडली
मंडली

जो फिट है वो हिट है

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कुदरती काया को कांतिमान, कमनीय, करिश्माई, और कातिल बनाए रखने के लिए कयामत की क्रेज के बीच कमाल की कॉमेडी भी जारी है। जीरो फिगर या सिक्स पैक एब इस धरा धाम पर ही मोक्ष का प्रतिरुप है। खाएं कम और पचाएं अधिक एवं ‘ए लॉट ऑफ वाटर’ पीने की प्रवृत्ति जोरों पर है । हालांकि ‘ए लॉट ऑफ वाटर’ पीने का दावा करने वाले सार्वजनिक स्थलों पर 250 मिली लीटर की पानी की बोतल लिए घूमते दिखते हैं और जब पीने की बारी आती है तो एक कुल्ली गटक जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि इनका 250 मिली लीटर पानी शुद्ध ढाई लीटर पानी को मथने पर निकलता है। यह हो सकता है कि वे छिपकर ‘ए लॉट ऑफ वाटर’ पीते हों।

भोजन के नाम पर इनके ‘नो जंक फूड, यू नो’ से यह न समझिए कि ये घर की रसोई का नॉर्मल खाना खाते हैं। ये पालक के पत्ते पर रखा गया ‘चिड़िया डायट’ जितना ‘सैलड’ खाते हैं, बेशक पालक का पत्ता भी चबा जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट और फैट इनके सामने बोल भी देने पर इनकी स्थिति ऐसे हो जाती है जैसे इन्होंने ‘बुई’ देख लिया हो। सतुआ-भूँजा का देसी फाइबर इन्हें नहीं भाता, रंग्रेजी फाइबर के लिए ये इतने बावले होते हैं कि इनके कारण ही ऑप्टिकल फाइबर केबल जमीन के नीचे बिछाना पड़ता है। इनका बस चले तो मिठाई और आइसक्रीम आदि तो ये दुनिया में बंद ही करवा दें। ये एक पुण्य भी करते हैं, एग्ग व्हाइट का प्रोटीन खाकर और एग्ग फैट किसी और को खिलाकर। रही सही कमी ये पौष्टिकता के कृत्रिम पूरकों से पूरी करते हैं। प्रोटीन पनवारी अपने उत्पाद लिए तैयार बैठे हैं।

जीरो फिगर का टशन अब माइनस की ओर प्रवृत्त है। बाकी तो सब ठीक है पर इस फैशन पर खाला को देखकर लल्ला तैमूर डर जाता है तो थोड़ा बुरा लगता है। टीआरपी लोभी चैनल इस बालाधिकार हनन पर सुविधानुसार चुप रह जाते हैं तो गुस्सा आता है। उम्र के हिसाब से फिटनेस फिगर साइज जीरो से वन, टू और थ्री भी फिक्स हो क्योंकि कुछ समाजवेत्ताओं का कहना है कि ‘कुपोषण भारत छोड़ो’ तक तक सफल नहीं होगा जब तक जीरो फिगर की संकल्पना बनी रहेगी। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि जीरो फिगर वालों की जीवन शैली से एक वक्त का खाना छोड़ने की अपील करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व.लालबहादुर शास्त्री की आत्मा बहुत खुश होगी। दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो डाइट पर रहकर डाइट की हवा ही टाइट कर देते हैं। वे एक दो दिन डाइट पर रहते हैं और फिर परहेज के परखचे उड़ाकर फिटनेस की बाट लगा देते हैं। बाद में ‘लूज वेट नाऊ आस्क मी हाऊ (बिना व्यायाम और दवा के)’ जैसे चमत्कार को नमस्कार करने लगे लगते हैं। फिटनेस रूपी मोक्ष की प्राप्ति के लिए जिम खुले हैं। गरीब लोग जिम के पास से रोज सुबह शाम गुजरकर और अपनी टूटी-फूटी व्यायाम वर्जिश से ही कमोबेश फिट हैं या पार्क/ मैदान में जाकर आड़े-तिरछे व्यायाम कर लेते हैं या बेडौल होने को अपनी नियति मान लेते हैं। जिम वाला कभी उन्हें जबरदस्ती तो जिम में भर्ती नहीं कर लेता ना। जिम वैसे भी कोई शर्तिया इलाज नहीं है। कुछ लोग वर्षों से जिम में नामांकित हैं। फिर भी फिटनेस से उनका छत्तीस का आँकड़ा बना हुआ है। ऐसे ही एक भद्र जन ने खुलासा किया था कि उन्होंने महीनों पहले जिम में दाखिला लिया था, फिर भी मोटापा बढ़े जा रहा है। तब उन्होंने फैसला किया था कि एक बार वह जिम में पर्सनली जाकर देखेंगे कि लोचा कहाँ है।

हमारे देश में बेरोजगारी चाहे जितनी हो पर खउआ-पकउआ लोग खाने-पकाने का अवसर निकालने में भी माहिर होते है। उत्सव हो या विभीषिका, सेवा हो या सत्कार, शौक हो या मजबूरी, लोकतंत्र हो या देशभक्ति, ये लोग उसमें अपना उल्लू साध ही लेते हैं – कहीं सेवा प्रदाता बनकर, कहीं पूर्तिकर्ता बनकर, कहीं नेरेटिव बिल्डर बनकर और अधिकांश जगहों पर सलाहकार बनकर। फिटनेस का शौक भी इसका अपवाद नहीं है।

दुनिया में सबसे आसान काम सलाह देना है। इसलिए इस क्षेत्र में भी सलाहकार कुकुरमुत्ते की तरह उगे हैं जो फिटनेस की ललक की लहलहाती फसल काटने को बावले हुए जा रहे हैं। रेडीमेड ललक न मिले तो ये पहले ललक की खेती करते हैं और फिर उस ललक का दोहन। खेती के लिए सोशल मीडिया का मैदान इन्हें बिना टैक्स का मिल जाता है जहाँ ये न सिर्फ चहेट चहेट कर फिटनेस टिप देते हैं बल्कि डाइट का चार्ट बनाकर चस्पां भी करते है, आपकी रूचि हो या न हो। बताया गया डाइट देखकर ही कई लोग टाइट हो जाते हैं। बेचारे यह समझने में नाकाम रहते हैं कि यह ‘बबुआ डाइट’ इसलिए बताया गया है ताकि आप स्वस्थ और सुडौल रहें। आपकी खुराक में प्रोटीन की कमी न हो, इसके लिए प्रोटीन पनवारी शॉप अपने उत्पादों के साथ तत्पर है। मानव मात्र के आरोग्य के लिए दी जा रही इस सेवा के लिए मानवता सदैव ऋणी रहेगा। साधुवाद।

लेखक द्वय : अनुराग दीक्षित (@bhootnath)

राकेश रंजन (@rranjan501)

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