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जेएनयू: बौद्धिक विमर्श केन्द्र या स्वयं बहस का विषय

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तीन साल पहले मैं जेएनयू गया था। पढ़ने नहीं, मैं पहले से ही पढ़ुआ हूँ – ईए-बीए पास। डिग्री बता दी, न दिखाउँगा और न ही विश्वविद्यालय का नाम बताउँगा। पेड़ मत गिनिए, आम खाइए और मुद्दे पर आने दीजिए। मुझे जेएनयू कैंपस आकार में मालदीव से बड़ा लगा। जितने कॉफी शॉप, कैंटीन और ढ़ाबे दिखे, उतने कमरे किसी और संस्थान में हों तो वह चौड़ा होने लगे। विश्वविद्यालय के भवन ऐसे हैं कि १००० वर्ष बाद उन्हे जेएनयू स्थापत्य कला के नाम से जाना जाएगा। शानदार अतिथि गृह हैं जिनका शुल्क नगण्य है लेकिन सुविधाएं ऐसी कि सत्कार उद्योग भी लजा जाए। छात्रावासों, पुस्तकालयों, सभागारों और मैदानों को देखकर ऐसा लगा कि विश्व स्तरीय संस्थान शायद ऐसा ही होता होगा। पूरे परिदृश्य को देखकर मन में अभिलाषा उठी, “क्या ही अच्छा होता कि देश में सारे शिक्षण संस्थानों में ऐसी ही आधारभूत संरचना होती!” मस्तिष्क ने निर्दयता से मन को यथार्थ के बंजर पर पटक दिया, “अभिलाषा के अश्वों को लगाम दो, यह संस्थान हमारी शिक्षा व्यवस्था का ‘क्रीमी लेयर’ है।”

विश्वविद्यालय में प्राकृतिक छटा ऐसी है कि वहाँ भाव शून्य और साहित्य मूढ़ भी उद्यात प्रेम की कविताएँ रच बैठे, लप्रेक सृजित कर दे। गाढ़े शेड के लप्रेकवादियों के लिए ठप्रेक के मंचन का भी स्कोप है। परिसर में हरियाली इतनी है कि यहाँ अंधों को बिना सावन ही हरा हरा दिखता दिखता है और वह हरा रंग वर्णीय सौहार्द में लाल-लाल बोलता है। हरा-लाल मित्रता का बिल केसरिया पर फटता है तो फटता रहे। जेएनयू कैंपस में मैंने छात्र-छात्राओं का समूह भी देखा, मेधा और प्रतिभा के मूर्त रूप में। छात्र-छात्रा समूहों में बाँके सजीले युवा और सलोनी युवतियों के अतिरिक्त कुछ थके प्रौढ़ भी दिखे। मन में संशय हुआ कि प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम कहीं प्रौढ़ों को साक्षर बढ़ाने से उच्च शिक्षा की ओर तो नहीं बढ़ गया। ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ जैसे पोस्टर्स से विश्वविद्यालय की राजनीतिक सजगता का भान हुआ।

शैक्षणिक उत्कृष्टता और उच्च गुणवत्ता के अनुसंधान के उद्देश्य से विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। समग्र राजनीतिक व सामाजिक चिन्तन के लिए ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ जैसे विषय सृजित हुए, गोया अब तक समाजवाद रुढ़िवादी था। लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गयी, पूरे देश में इसे सुनिश्चित करना कठिन था। अनुसंधान के लिए नये क्षेत्र चुनने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। ऐसे अनुसंधान हुए भी, आज भी जारी हैं। सूक्ष्म जीव विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी एवं कुछ अन्य क्षेत्रों में विश्वविद्यालय देश का अग्रणी शोध संस्थान है लेकिन इसके विद्यार्थी करियर की बुलन्दियों पर भले ही गये पर किताबी कीड़े ही बने रहे। शिक्षा को किताबों से परे ले जाकर असली जलवा तो कला संकाय के विद्यार्थियों ने बिखेरा। गरीबी उन्मूलन केन्द्र का हुनालूलू की दरिद्रता पर और इतिहास विश्लेषण केन्द्र का टिम्बकटू के इतिहास पर किया गया शोध जन सामान्य के लिए भले ही न हो पर उनका ‘कागजी’ अकादमिक महत्व है।

समग्र सामाजिक चिन्तन में यहाँ वंचितों व पिछड़ों के अधिकारों पर विचारोत्तेजक बहसें होती हैं। इससे बेखबर वंचित वंचित बने ही घूम रहे होते हैं और वंचित-पिछड़ा का शोर मचाते कई लोग अपना पिछड़ापन पीछे छोड़ देते हैं। शोषितों के हित में मनुवादी वर्जनाएं तोड़ते हुए बीफ फेस्टिवल मनाया जाता है या स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा के समक्ष साहसिक कारनामे किए जाते हैं। आतंकियों तक के मानवाधिकार के लिए लड़ाई लड़ी जाती है। कई लोग मानवाधिकार के नाम पर अपने लिए संपन्नता का अधिकार सुनिश्चित कर लेते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसी है कि राष्ट्रीय अखंडता को चुनौती देते ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे … इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ का कोरस भी नहीं दबाया जाता। वैज्ञानिक समाजवाद साम्यवाद बनकर मुखर होता है तो फासीवादी उसे राष्ट्र विरोधी कहते हैं। बहुसंख्यक धर्म विरोध व अल्पसंख्यक तुष्टिकरण होता है लेकिन देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना बुनने के लिए।

विश्वविद्यालय की स्थापना तब हुई थी जब देश के शासन पर काँग्रेस का एकाधिकार था। एक दक्षिणपंथी षडयंत्र सिद्धांत के अनुसार विश्वविद्यालय स्थापना का एक दूरगामी उद्देश्य था कि काँग्रेस के गाढ़े समय में उसका राजनीतिक क्षेत्ररक्षण करने के लिए कुछ क्षेत्ररक्षक तैयार किए जाएं जो ‘प्लेइंग इलेवन’ से बाहर के हों। विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से स्थापित मत के विरोधी निहित स्वार्थ में इसे जड़ता कहते हैं। ऐसा भी सुनने को मिलता है कि स्थापित वाम परिधि का दाहिने होने वाले छात्र सत्रांत परीक्षाओं के मूल्यांकन में विधिवत नाप दिए जाते हैं। समतामूलक समाज के निर्माण के लिए कटिबद्ध विश्वविद्यालय की परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की गुणवत्ता अवश्य ही उत्कृष्ट होगी लेकिन वैचारिक प्रतिबद्धता में थोड़ा-बहुत उपर नीचे चलता है। मत भूलिए कि तटस्थता का समतल खोदकर उसकी मिट्टी से बने पक्षपात के टीले पर ही विचारधारा का ध्वज शान से लहराता है। लाल-हरा बनाम केसरिया शिक्षा भी इसका अपवाद नहीं है।

जेएनयू देश के बौद्धिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है और देश में बहस का एक विषय भी। विश्वविद्यालय बंद कर देने तक की अतिवादी माँग होती है लेकिन सरकार ऐसा नहीं सोचती। तभी तो उसने ‘पाई’ से बढ़कर ‘आना’ हुए फीस को ‘छात्र-हित’ में वापस ले लिया। यह न छात्रों की जीत है और न सरकार की हार। कहने दीजिए उन्हें कि यह तार्किकता को जड़ा गया जोरदार तमाचा है, अर्थाभाव से जूझ रहे अन्य संस्थानों को मुँह चिढ़ाने जैसा है और मोटी फीस देकर पढ़ने को बाध्य छात्रों के साथ कड़वी ठिठोली है। दक्षिणपंथी विश्वविद्यालय विमर्श को एकांगी बताते हैं जबकि विश्वविद्यालय छात्र समुदाय का एक ‘अति प्रतिभाशाली वर्ग’ अपनी माँगों, आचरण और कृत्यों से संस्थान की स्पिरिट ‘शिखर’ पर ले जाता है।

कामना है कि देश ‘घी थाली में या नाली में’ के दौर से बाहर निकलेगा और यह संस्थान ‘उड़ान’ कम करके शैक्षणिक उत्कृष्टता की ‘गहराईयों’ में ऐसा उतरेगा कि देश में ऐसे और संस्थान बनाने की माँग होगी।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

1 thought on “जेएनयू: बौद्धिक विमर्श केन्द्र या स्वयं बहस का विषय

  1. बेहतरीन, भइया जैसा बढ़ियाँ शायद ही इसपे कोई लिख पाए ।

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