जमींदारी – मंडली
मंडली

जमींदारी

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बचपन का गया आज मैं शहर से वापस गाँव लौटा था। पूरे पसियाने में चहल-पहल थी। आस-पड़ोस की औरतें मेरे लिए घर बनी मिठाईयाँ ला रही थीं। गाँव के छोटे बच्चे मेरे ट्रांज़िस्टर और चमकदार कपड़ों को देखकर ललचा रहे थे। सब जात के लोग मेरे ठाट-बाट को देखकर मुझसे बात करने के लिए उतावले हो रहे थे। साँझ को सबसे मिल-मिलाकर जब मैं रात के खाने पर बप्पा के साथ बैठा तो हमने अपनी निजी बातें शुरू कीं। बप्पा के चेहरे से लग रहा था कि मेरी तरक्की की बातों से उनके मन को सुकून मिल रहा हो। मैंने बताया कि हाल ही में मैंने कपड़े धोने व इस्त्री करने की निजी दुकान खोली है और शहर में इस धंधे से अच्छी कमाई हो जाती है। सोने से पहले मैंने बप्पा को कुछ रुपये दिए और कहा कि जाने से पहले मैं घर में शौचालय बनवाकर जाऊँगा। अब के समय में तलाय जाना ठीक नहीं लगता है। बप्पा को मेरी बातें अंग्रेजी बोलने जैसी विचित्र लग रही थीं पर वह खुशी-खुशी सो गए।

अगली सुबह मैं गाँव टहलने निकल पड़ा। घर देर से वापस आया तो देखा कि बप्पा बथुआ की रोटी सेंके और लहसुन, हरे मिर्चा का नमक पीसे हुए मेरा खाने पर इंतज़ार कर रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने मेरे देर से वापस आने का कारण पूछा। मैंने बताया कि सोहरामऊ वाली बड़ी अम्मा के घर बैठ गए था। बप्पा ने पूछा कि क्या मैं उदयप्रताप दउआ से भी मिला। मैंने ना में सर हिला दिया और खाने बैठ गया।

मैंने कुछ सोचते हुए बप्पा से कहा, “वैसे अब दउआ को अपना घर बनवा लेना चाहिए, गाँव में एकलौता उन्ही का घर कच्चा बना हुआ है। गलियारे वाली दीवार कब हवा-बौछार में गिर जाए पता नहीं और घर से इंसान की औकात पता चलती है।”

बप्पा ने हुँकारी भरी और खाना खाते रहे।

मैंने आगे कहा, “बप्पा शहर में यहाँ जैसा जात-पात नहीं मनाया जाता। आज अम्मा ने मुझे एक थाली में कल्हरे चावल खाने को दिए और आते वक्त कह दिया कि भैया बर्तन धोकर जाओ।” इन बातों पर मैंने बप्पा के चेहरे के भाव जानने चाहे पर उन्होंने और सुनने की इच्छा नहीं जतायी।

मैंने आखिरी बात कहकर थाली उठायी, “गाँव में किसी के घर में खाने-रहने को भले नहीं है, पर हर जात के लोग छुआ-छूत आज भी मनाते हैं। अम्मा का घर ही देख लो, इनसे गरीब तो अपनी जात में भी कोई नहीं होगा।”

बप्पा ने खाने के साथ पानी का एक लंबा घूंट लिया और कहा, “छुआ-छूत की बात है तो पहले तुम शरुफे के हाथ का खाकर दिखाओ। यह भी सुनो, उदयप्रताप भैया शुरुआती गरीब नहीं थे। आसपास के जितने गाँव बसें हैं, सब उनकी ज़मीन पर हैं। उनके पिता जी कम उम्र में ही चल बसे थे। सोलह-सत्रह साल की उम्र में इन्हें जमींदारी मिल गयी। उस जमाने दो मंजिला कच्चा मकान बना था। उसी कच्चे घर को आसपास के सभी लोग देखने आते थे। उस घर में आठ बड़े कमरे, तिद्वारी, बरोठ, रसोइया और जाने कितने बरामदे थे।”

मैंने कहा,”मैंने तो मेरे बचपन से उन्हें गरीब ही देखा है।”

बप्पा ने जवाब दिया,”मैं सन पैंसठ की बात कर रहा हूँ। अब पच्चासी चल रहा है। तुम सात-आठ बरस की उम्र में बम्बई चले गए थे। तुम्हें वहाँ भेजने के पैसे भी मुझे उदयप्रताप भैया ने ही दिए थे। वह मुझे हमेशा भाई मानते थे और मैं बिना पैसे लालच किए भाई जैसे काम भी करता था। मेरे बारे में गाँव वाले भैया से कहते थे कि छोटेलाल तुम्हारे लिए जान भी दे सकता है और मौका पड़ता तो मैं दे भी देता।”

मैंने पूछा, आप क्यों जान देते?

वह बोले, “किसी अपने को अमीर से ग़रीब होते हुए देखना सबसे अधिक कष्टकारी होता है। भैया ने मुझसे बहुत स्नेह रखा, मेरा ब्याह कराया। तुम्हारी माँ जब तक जिंदा रहीं उन्ही के घर काम करती रहीं।“

अब मेरे मन में यह जानने की तीव्र जिज्ञासा थी कि उदयप्रताप दउआ गरीब कैसे हुए।

बप्पा ने आगे कहा,”भैया एक राजकुमार से कम नहीं थे। उनके साथ यह अनहोनी हुई कि उनके विवाह में बारात ले जाने के लिए उन्होंने एक महाजन से हाथी उधार ले लिया। लगभग एक हज़ार आदमियों के साथ बारात सोहरामऊ जा रही थी। रास्ते में हाथी बैठ गया। मारकर-डराकर महावत ने उसे उठाया पर वह कुछ दूर और चलकर दुबारा गिर पड़ा और मर गया। उस हाथी का कर्ज अदा करने में भैया को अपने सारे खेत बेचने पड़े। फिर भी महाजन का पैसा अदा नहीं हुआ तो भैया ने घर का कीमती सामान और जेवर बेच दिया। यह सब जब तुम्हारी अम्मा के घरवालों ने जाना तो उन्होंने दो साल गाउना नहीं दिया। जैसे तैसे भैया सोहरामऊ गए तो तुम्हारी अम्मा अपने घरवालों की इच्छा के विरुद्ध साथ आने को तैयार हो गयीं।

यहाँ आकर साल-दो साल तो घर में काम करने वाले लगे रहे और बची-खुची जरिया से घर का खर्च निपटता रहा। कुछ दिन बाद तुम्हारी अम्मा ने मुझे छोड़ घर के सभी नौकर हटा दिये। सद्धू भी सिर्फ़ होली-दीवाली घर को पोतने व लीपने जाता था। एक बार भैया ने कुछ पैसे मुझे दिए तो मैं हरदोई से उनके लिए मुर्रा सींघ वाली एक भैंस लाया। मैं ही उसकी देखरेख करता था पर उनके घर के बच्चे भी उसे मोहाने के लिए दिन रात गुड़ खिलाते रहते थे। ख़ैर, धीरे-धीरे इतने साल बीते कि वह घर हर बरसात में गिरता रहा और खंडहर बनता गया। पैसे कमाने का एक साधन वह भैंस और कुछ जो ना बिक सके वह खेत थे। कुछ पैसे मिलते जो भी थे, वह उनके दोनों बच्चों की शहरी पढ़ायी में लग जाते थे। अब उनके दोनों बच्चे बड़े हो गए होंगे। यहाँ कई साल से नहीं आए, शहर में अकेले रहते हैं।”

बप्पा की बातें सुनकर मुझे दुख हुआ और मैंने पूछा, “उनके बच्चे घर क्यों नहीं आते हैं?”

बप्पा ने बताया, “भैया ने ग़रीबी से तंग आकर घर की पालतू भैंस महतौ को बेच दी। बच्चों को उससे बहुत लगाव था। तब वे गाँव के स्कूल में ही पढ़ते थे। स्कूल से आते वक्त उन्होंने महतो को उनकी भैंस ले जाते हुए देख लिया। मुझे याद है कि मैं घर में सरसों चाल रहा था। बच्चे चिल्ला-चिल्ला कर रोते हुए आए और शायद पूरी रात रोते रहे। मैं अपने घर भी वापस आ गया था पर ऐसा लग रहा था कि उनकी लाचारी भरी रोने की आवाज़ पूरे गाँव में गूँज रही थी। एक दो साल बाद वे शहर चले गए और वापस नहीं आए।”

मैंने बप्पा से पूछा कि अभी दउआ किस तरह जीवनयापन करते हैं?

बप्पा ने कहा, “भूड़ की खेती से एक फसल में लगभग सौ क्विंटल गेंहू और कुछ सरसों मिल जाती है। साल भर कर्ज़ लेकर, फसल के समय चुकता करते हैं। अब तो भउजी का कोई जेवर भी नहीं बचा होगा। सुना है कि डाल पर की गई दो साड़ियाँ जो अब तक बचा रखी थीं, वही पहनती हैं। वैसे तो भैया और भउजी में कभी लड़ाई झगड़ा नहीं होता है पर उनका नियम है कि एक समय पर एक इंसान झगड़ता है और दूसरा सुनता है।

बप्पा की बातें सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया। मैं बाजार गया और अम्मा के लिए एक साड़ी और दउआ के लिए धोती-कुर्ता लेकर आया। साँझ को अम्मा के घर गया तो आँगन में दउआ भी दिखे। मैं जाकर ज़मीन पर बैठ गया। अम्मा ने जमीन पर बिछाने के लिए एक टाट की बोरिया दी। इससे पहले दउआ कुछ और बातें शुरू करते मैंने अम्मा को बुलाया और वह कपड़े और कुछ पैसे उनके हाँथ में देने लगा। अम्मा ने पूछा, “यह क्या है!” मैंने हिचकिचाहट में जवाब नहीं दिया। मुँह से इतना ही निकला कि अम्मा अपना लड़का समझकर रख लो। अम्मा जैसे ही समझीं उन्होंने मुझे फटकारते हुए समान और पैसे वापस किए और कहा,”मारब झापड़ मुँह लाल होई जाई, तुम परजा आदमी तुमसे हम जमींदारीन होइके यू सब लेबे भला।”

मैं रुआंसा हो गया। अम्मा ने ढांढस बंधाते हुए कहा, “गटरु भैया तुम्हारे दोनों भाई इहे महीना से नौकरी करै लाग हवैं। अब सब हाल सुधरि जैहैं।”

यह सुनकर मेरे आँसुओं में हँसी मिल गई और मैं ख़ुशी से वापस अपने घर की ओर चल पड़ा।

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

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