ईटीज सर – मंडली
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ईटीज सर

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गाँव में कुछ लोग उनको आज भी ईटीज सर ही बुलाते हैं। उनका असल नाम प्रमोद है – प्रमोद कुमार सिंह, लेकिन माता-पिता को छोड़ तब शायद ही कोई उनको इस नाम से पुकारता था। गाँवों में नामकरण से किसी को एक प्रचलित उपनाम देने के पीछे दिलचस्प कहानी होती है। प्रमोद गाँव के छोटे बच्चों को इंग्लिश का ट्यूशन पढ़ाते थे। एक दिन पढ़ाते हुए उन्होंने ‘यह शिक्षक हैं’ का ट्रांसलेशन ‘It is sir’ बताया। गाँव में किसी ने सुन लिया और ये बात फैला दी। तब से उनका नाम ईटीज सर हो गया।

चार भाईयों में ये सबसे बड़े थे। पिताजी किसान थे। परिवार का खेती बाड़ी से गुजारा चला करता था। जोत कम होने और कोई बाहरी आमदनी न होने के आर्थिक दिक्कतें बहुत थीं। ईटीज सर पढ़ने में औसत थे लेकिन वह आगे पढ़ना चाहते थे। हालाँकि ये वो दौर था जब पीठ पर बस्ता देख लोग बोल दिया करते थे …

मिडिल सिडिल के छोड़s आस
धरs खुरपी गढ़s घास’।

अंग्रेजी में कहें तो लोग bully करते थे। वहीं कुछ प्रोग्रेसिव लोग भी थे जो बच्चों के बारे में यह मत रखते थे कि पढ़े तs पढ़ाव ना तs शहरे देखाव। शहर देखना ईटीज सर अफोर्ड नहीं कर सकते थे। इसलिए पढ़ रहे थे और आगे भी पढ़ना चाहते थे।

दौर वह भी था जब बिहार जंगलराज से कितना घवाहिल हुआ है, इसकी गणना करना भी देश ने और देश के प्रबुद्धजनों ने यह मानकर छोड़ दिया था कि यही बिहार की नियति है। खैर, ईटीज सर की पढ़ाई में रूचि थी लेकिन घर की परिस्थितियाँ उसकी अनुमति नहीं दे रही थीं। अपनी पढ़ाई के लिए उन्होंने गाँव में हीं छोटे बच्चों को ट्यूशन देना शुरू कर दिया। वह दस बच्चों को पढ़ाते, दो महीना लगने से पहले ट्यूशन छोड़ देते, दो-तीन फीस उधार रख लेते और चार-पाँच फीस दे भी देते। लब्बोलुआब यह था कि ईटीज सर ट्यूशन के मैदान में फीस का जो घास गढ़ते उसका आधा ही उनके पॉकेट के ठेहा पर पहुँचता।

घर की गाड़ी ढुकुर-पाईंच करते हुए चल रही थी, ईटीज सर की पढ़ाई भी। ईटीज सर से छोटा भाई विनय आर्थिक तंगी से परेशान हो गया। वह पढ़ाई लिखाई छोड़ दिल्ली कमाने चला गया। अब वो वहाँ से पैसे घर खर्च के साथ साथ ईटीज सर को पढ़ाई के लिए भी भेजने लगा। गाँव वालों का ताना और बढ़ गया कि बड़ा भाई छोटे भाई की कमाई से पढ़ रहा है। ईटीज सर ने बीए पास किया। एमए में नामांकन करा कर वह प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगे। मनचले ईटीज सर को देखकर गीत गाने लगते …

कंपीटिशन दे ता एमए में ले के एडमिशन …

दौर वही थी जब सरकारी नौकरियों की रिक्तियाँ  निकलती नहीं थी और अगर निकल जातीं तो उसमें धांधली होती थी और रेट तय होता था। ईटीज सर की मेधा का पता नहीं पर रेट सेट करने की हैसियत नहीं थी उनकी। ईटीज सर परीक्षाएँ देते, औपचारिकता में परिणाम देखते और अगली परीक्षा का फॉर्म भर देते। इतने काम के लिए पैसों की कमी छोटा भाई नहीं होने देता। ईटीज सर की स्थिति और दयनीय तब हो गयी जब गाँव वालों के साथ साथ घर वाले भी ताना मारने लगे – ई जिनगी में कुछ ना करिहन।

व्यक्ति के लिए सबसे मुश्किल दौर तब होता है जब उसके अपने भी उस पर भरोसा नहीं करते। लेकिन व्यक्ति को इनसे बिना विचलित हुए स्वयं पर भरोसा रखना पड़ता है। ऐसा नहीं था कि ईटीज सर विचलित नहीं होते थे। कई बार उनका भी मन होता कि वह भी झोरा उठाकर दिल्ली चल दें और वहीं कुछ काम-धाम कर लें लेकिन सरकार नौकरी की महत्वाकांक्षा उन्हें ऐसा करने से रोक देती। ईटीज सर घुन की धुन में परिवार के अनौपचारिक बहिष्कार और स्पष्ट तिरस्कार के बीच प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगते।

साल 2005 आया। बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ। रात के बाद आने वाली सुबह की सुगबुगाहट दिखी। सरकारी विभागों में नियुक्तियाँ शुरू हुईंं। ईटीज सर के फॉर्म भरने की रफ्तार चौगुनी बढ़ गयी। परीक्षा देते रहे, असफल भी होते रहे। तभी दरोगा का फार्म निकला और ईटीज सर ने भर दिया। उम्र की सीमा के हिसाब से ये उनका अंतिम प्रयास था। इस बार तैयारी में उन्होंने सब कुछ झोंक दिया। उन्हें लगा कि परीक्षा भी अच्छी गयी है लेकिन जब फाइनल रिजल्ट आया तो उनका नाम लिस्ट में नहीं था। तानों का यह दौर ईटीज सर के लिए असह्य हो चला। उम्र सीमा के कारण अगला फॉर्म भरने की स्थिति भी नहीं थी।

ईटीज सर भरोसा भी अपने आप से भी उठने लगा था। कोई ऐसा नहीं था जिससे वह अपनी व्यथा कह सकें। घर वालों के सामने रो भी नहीं सकते थे। अपनी जिन्दा लाश को ढो भर रहे थे ईटीज सर। ईटीज सर ने कर्म के लिए कमी नहीं छोड़ी थी। शायद उनके कर्म ने भाग्य से दुखड़ा रोया और भाग्य ने चमत्कार का आह्वान किया। चमत्कार पसीज गया। खबर आई कि किसी ने दारोगा परीक्षा में धाँधली की शिकायत कर दी है और मामला पटना हाई कोर्ट पहुँच गया है। हाई कोर्ट के निर्देश पर उत्तर पुस्तिकाओं का दुबारा मूल्यांकन हुआ। रिजल्ट निकला और इस बार लिस्ट में ईटीज सर का नाम था। घर वाले पूरे गाँव में घूम घूम कर इस खबर का ढोल पीटने लगे। गाँव वाले भी उन्हें कुछ दिनों के लिए ईटीज सर कहना छोड़ कर प्रमोद, प्रमोद भैया और प्रमोद चाचा कहने लगे, कुछ तो दारोगा साहेब भी।

ईटीज सर गाँव के पास ही सीवान शहर के एक थाने में इंस्पेक्टर हैं। जीवन में लड़ाई हर किसी को लड़नी पड़ती है। अपने ऊपर भरोसा रखने से ये लड़ाई थोड़ी आसान हो जाती है। स्वयं पर भरोसा कमजोर पड़े तो भाग्य की शरणागत होना भी एक विकल्प है।

लेखक – स्पर्श अभिषेक (@SparshAbhishek)

1 thought on “ईटीज सर

  1. वाह…. अद्भुत… पर दिल नहीं भरा..लिखते रहिए…

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