मंडली

हमेशा के लिए अवरूद्ध

शेयर करें

चारों ओर अंधकार था। इस घुप्प अंधकार में वह पुच्छल तारे जैसा जीव अपने निर्धारित मार्ग पर चलता हुआ अपने गंतव्य की ओर अग्रसर था। उस सन्नाटे में वह जीव भी उस बहते हुए द्रव के साथ बहा जा रहा था। कोई आवाज नहीं केवल पानी में चलने की  हल्की सी सरसराहट और कभी-कभी उस द्रव में बुलबुलों जैसी कोई सूक्ष्म आवाज। ना उस जीव को दिखाई देता था, ना सुनाई। इसलिए उस अंधेरे गलियारे में बहते चलना उसके लिए दुष्कर न था। बहते-बहते वह उस अंधियारे में एक बंद द्वार से जा टकराया और प्रतिक्रियास्वरूप पीछे आया। फिर उसी दिशा में बढा और फिर टकराया। वही क्रम चलता रहा, अंधकार बना रहा। आगे मार्ग अवरुद्ध था।

शहर के सबसे बड़े रईस और रसूखदार रायजादा परिवार की कोठी आज दुल्हन की तरह सजी हुई थी। कोठी के प्रत्येक तल पर जलती हुई लाइट के पीछे की खिड़कियों में निरंतर उत्सव जगमगा रहा था। कोठी के मुख्य द्वार के भीतर हॉल में लगे विशाल झूमर के नीचे ही वह फूलों की लड़ी का मंडप बनाया गया था। इस पर रायजादा परिवार की पौत्रवधू बैठी थी। उसी की गोद भराई की रस्म का आज उत्सव था। महिलाएँ मंगल गीत गा रही थीं और बीच बीच में ही उनके खिलखिलाने की ध्वनि भी आ जाती थी। कभी ढोलक रुकती थी तो डीजे शुरू हो जाता था। पास बने डिस्को थेक में पुरुष नाच रहे थे। खाने पीने का दौर भी जारी था ।

मंडप के पीछे एक आलीशान सोफे पर सेठ हरबंस लाल रायजादा अभी आकर बैठे थे। नाच-नाच कर उनके घुटनों ने जवाब दे दिया था। इतना तो वे पोते ऋषभ की शादी के समय ही नहीं नाचे थे। आज उनके जीवन का सबसे बड़ा सेलिब्रेशन था। वैसे सेलिब्रेशन तो वह पिछले कुछ समय से ही कर रहे थे। चार धाम और अन्य कई तीर्थ स्थलों की यात्राएँ कर आए थे। वकील साहब को बुलाकर अपने नाम से एक चैरिटेबल ट्रस्ट का निर्माण भी करवा दिया था। उसके अलावा भी और भी दस्तावेजी काम चल रहे थे। न जाने कौन से आनंद में मग्न रहते थे और न जाने किस बात की जल्दी में थे।

यह पारंपरिक समृद्धि उनकी विरासत थी। वैचारिक, नैतिक और धार्मिक कृत्यों में भी इस परिवार के समकक्ष कोई उदाहरण न था। लोग कहते थे कि रायजादा परिवार के पुरुषों को किसी देवता से कोई वरदान मिला था। इसीलिए वे इतने सुखी और समृद्ध हैं। सेठ हरबंसलाल ने भी रायजादा परिवार की समृद्धि की इस परंपरा का निर्वहन किया था और उसे अपने इकलौते बेटे मनोहरलाल रायजादा को विरासत में दिया था। अब तो पोता ऋषभ भी व्यापार में आगे बढ़ रहा था।  सोफे पर सेठ जी के पास गहनों में लदी उनकी पत्नी मनोरमा भी आकर टिक गई।

“अब तू क्या यहाँ आकर बैठ गई, जा वहाँ औरतों में नाच गा।”

“नाच गाने के लिए मैं कोई 16 साल की नहीं हूँ। सत्तर साल की हो गई हूँ “, पहले से चिढ़ी दादी और चिढ़कर बोली।

“आजकल हो क्या गया है तुझे? कुछ दिनों से ज्यादा ही तुनक मिजाज हो गई है तू” , दादा फटकारते हुए बोले।

दादी कुछ बिना कुछ कहे फुफकारती हुई अपने कमरे में चली गई।

आधी रात में उत्सव खत्म हुआ। परिवार के सब लोग अपने कमरों में सोये थे। रात तीन-साढ़े तीन के लगभग गर्भवती बहू की तबीयत अचानक खराब हुई। उसे अस्पताल ले जाया जा गया। दादा को रात को नहीं उठाया गया। दादाजी जब सुबह अपने समय पर उठे तब उन्हें ज्ञात हुआ कि रात को बहू को हॉस्पिटल शिफ्ट किया गया है। उन्होंने तत्काल ऋषभ के मोबाइल पर फोन मिलाया। ऋषभ की दबी आई, “जी दादा जी, अब हम लोग यहाँ से निकल ही रहे हैं। घर पहुँच कर सारी बात बताता हूँ। ” ऋषभ ने फोन काट दिया।

आधे घंटे बाद दो कारें और एंबुलेंस पोर्च में आकर रुकीं। दादा-दादी उसे देखकर दरवाजे की ओर लपके। आगे की कारों में से उतरकर कोई उन तक पहुँच पाता उसके पहले ही दो वार्ड बॉय ने  एंबुलेंस का पिछला दरवाजा खोलकर उसमें से स्ट्रेचर पर सफेद चादर में लिपटा ‘रिया’ का शव बाहर निकाला। दादाजी  दहाड़ मारकर पोर्च की सीढ़ियों पर गिर गए। नौकरों और दादी ने उन्हें जैसे तैसे संभाला, दौड़कर बेटा-बहू और पोता भी आ गए।

उत्सव की खुशियों और मातम के सन्नाटे के बीच कुछ घंटों का फासला भी ना रहा। उस खिलखिलाते घर को ना जाने किसकी दृष्टि लग गई थी।

दोपहर में सेठ हरबंसलाल अपने कमरे में बैठे सुबक रहे थे। रह-रह के सिसकियों का उबाल उनके मुँह को आता और वो तकिए में अपना चेहरा देकर जोर से बिलख पड़ते थे। जिसके अमरत्व का स्वप्न नष्ट हो गया हो, उसके दुःख का अनुमान लगाना भी कठिन है। पास बैठी दादी अधिक दुखी नहीं दिख रही थीं। अपनी कुटिल नजरें जमीन पर इधर-उधर फिराती वह बिस्तर के कोने पर टिकी हुई थी।

“बुढ़ापा जितना बढ़ता जाता है, मोह भी उतना ही गहराता जाता है”, दादी कातर भाव से बोली।

दादा के कानों पर वह बात तो पड़ी किंतु वह खिड़की से आते उजाले को देख रहे थे। बाहर अचानक से बादल घिर आए, खिड़की से आता प्रकाश मद्धिम पड़ गया।

“मैं सब कुछ सहन कर सकती थी किंतु तुम्हारा बिछोह नहीं”, दादी ने कहा। कुछ क्षणों पश्चात जैसे दादा की चेतना लौटी। वो कुछ समझते से खड़े हुए, “तो क्या, तो क्या तूने …”  इतना समझ कर उनकी आँखें चौड़ी हो गईं और एक जोरदार तमाचा उन्होंने उस वृद्धा को लगा दिया। दादी पलंग पर बैठ गईं और वो वहीं जमीन पर हाथ पटक-पटक कर रोने लगे।

“मैं तो यूँ भी तुझे मिल ही जाता पर इसके लिए तूने दो जीवो को मार डाला। तू डायन है डायन।  कुलघातनी है।”

चीख-पुकार सुन परिवार के अन्य सदस्य दौड़े-दौड़े कमरे में आ गए। वे दादाजी को अधिक शोक ग्रस्त समझकर सहारा देकर बाहर ले जाने लगे। दादाजी ने चेहरा पलटा कर दयनीय दृष्टि से दादी की तरफ देखा। दादी की ग्लानिभरी आँखों को कहीं छुपने की जगह न मिली। दादी ने नियति को बदलने की कोशिश की थी किंतु नियति तो अटल है।

आज यदि रिया जीवित होती तो उसे नौवाँ महीना लग चुका होता किंतु रायजादा परिवार की भाग्य रेखा मिट चुकी थी। जैसा निश्चित था, उसी रात दादाजी को हार्ट अटैक आया और लाख कोशिशों के बाद भी सेठ हरबंस लाल रायजादा को बचाया न जा सका। दादी मनोरमा स्तब्ध हो गई थीं। उसकी आवाज चली गई थी। उनकी अपराधिनी आँखें शून्य में कहीं अटक गई थीं।  भाग्य ने उसे दोनों ओर से बुरी तरह ठग लिया था ।

मनोहरलाल के कंधे दुख के पहाड़ से पिसे जा रहे थे। उन्होंने रात को सबके सो जाने के बाद अपने पुत्र ऋषभ को अपने पास बुलाया और बिना किसी प्रश्न के अपने साथ चलने को कहा। ऋषभ पिता के पीछे पीछे हो लिया। वे दोनों कोठी के सबसे पिछले वाले हिस्से में लगी लिफ्ट से नीचे सीधे पिछले गैराज में उतरे, जो हमेशा बंद ही रहता था। उस ग़ैराज का मुख्य द्वार अब भी बंद था। उसमें एक पुरानी कार खड़ी थी। मनोहरलाल ने ऋषभ से वह कार थोड़ी पीछे करने को कहा। उसके नीचे एक टैंक का लोहे का ढक्कन था। दोनों ने मिलकर उसे उठाया तो उसमें नीचे उतरने के लिए लोहे की सीढ़ियां दिखाई दी। इसके सहारे वे दोनों टैंक में उतर गए, टैंक सूखा था। ऋषभ ने मोबाइल की टॉर्च ऑन कर दी। वहाँ एक दीवार में तिजोरी बनी हुई थी जिसके ऊपर लगे कुछ बटन को प्रेस करने और स्टीयरिंगनुमा लीवर को घुमाने पर उसका दरवाजा खुल गया।

ऋषभ भय और आश्चर्य मिश्रित भावों से अपने पिता को देखे जा रहा था। उस तिजोरी में लाल कपड़े में बँधा हुआ एक ताँबे का लोटा था जिसमें कुछ जल और एक ताम्रपत्र था। इस पर मोबाइल की रौशनी डालने पर ऋषभ को कुछ पशुओं की और कुछ विचित्र आकृतियाँ बनी दिखीं। उस पर एक मंत्र भी उकेरा हुआ था। कंकु-अक्षत उन पर चढ़े हुए थे, कभी बाकायदा उस सामग्री की पूजा हुई थी।

“यह हमारे कुल देवता का वरदान है,ऋषभ ” पिता मनोहरलाल रुंआसे से बोले “ किंतु अब न जाने किस डायन की नजर लग गई है जो यह वरदान अभिशाप बन गया है।” मनोहरलाल अनजाने में ही अपनी माँ को डायन कह गये।

“कैसा वरदान पापा”, ऋषभ कुछ डरते हुए बोला।

“कई सौ साल पहले हमारे पूर्वजों की तीन पीढ़ियों ने एक साथ मिलकर अपने कुलदेवता को प्रसन्न किया था और अमरत्व का वरदान माँगा था। कुलदेवता ने यह अभिमंत्रित जल और ताम्रपत्र देकर यह वरदान दिया था कि हमारे परिवार में वह तीनों वैसे तो अमर नहीं होंगे लेकिन प्रत्येक पुरुष की तभी मृत्यु होगी जब उसके पौत्र की बहु को नौंवा महीना लगेगा। वो पुरुष अपने प्रपौत्र के रूप में जन्म लेने के लिये अपनी पौत्रवधू के गर्भ में स्थापित हो जाएगा।” ऋषभ अपने पिता के कथन पर अजीब अविश्वास की नजरों से उन्हें देख रहा था।

“तब से हमारी ये तीन ही पीढ़ियाँ एक के बाद एक जन्म लेती रही हैं। हम भी उन्हीं में से एक हैं। हाँ बेटा यही हमारी सुख समृद्धि और वंश की गुणवत्ता का कारण है। ये रहस्य अपने पिता के जाने के बाद मुझे तुम्हें बताना था। जब पुत्र वधु को नौवाँ महीना लगता है तो परदादा की मृत्यु होती है और फिर वही वापस जन्म लेते हैं। इसीलिए आज जब रिया को नौवां महीना लगा तो पिताजी चले गए किंतु उन्हें जन्म देने वाली रिया उनसे पहले जा चुकी थी। लेकिन इस वरदान के अभिशाप में अब हम फँस गये हैं। अब न पीछे कोई मार्ग है ना आगे कोई रास्ता।” ऋषभ अचंभित सा खड़ा अश्रु बहा रहा था। उसकी आँख से कुछ बूँद टपककर उस ताम्रपत्र पर जा गिरे।

वह जीव उस अंधेरे नालीदार गलियारे में बार-बार दरवाजे से टकराता, फिर वापस आता, फिर टकराता। यही प्रक्रिया चल रही थी … अनंत तक … मार्ग अवरूद्ध था … हमेशा के लिए अवरूद्ध।

लेखक – @fictionhindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *