मंडली

हम वापस आएंगे!

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80 के दशक के अन्त में कश्मीर से हुए पलायन की 30वीं बरसी पर बहस छिड़ी है। इस वाद-विवाद ने कश्मीर और वहाँ की प्रताड़ना से तंग होकर पलायित हिंदुओं के कई पक्ष रखे गए। उनसे सहानुभूति प्रकट करके और उन्हें सांत्वना देकर उनसे सरकार पर विश्वास जताने की बात कही गयी। उन्हें रणछोड़ भी कहा जा रहा है कि वे बिना प्रतिरोध किए अपना घर-बार छोड़कर आ गए और अब सहायता न मिलने का रोना रोते हैं। वे जिन्हें अपनी इस स्थिति का कारण बताते हैं, उन्ही के लिए सौहार्द दिखाते हुए इफ्तार पार्टी आयोजित करते हैं। जितना असंवेदनशील ‘लड़ाई क्यों नही की?’ प्रश्न है, उतना ही ढ़ीठ ‘सरकार या देश ने हमारे लिए कुछ नहीं किया’ उत्तर भी है। दोनों ओर यह प्रश्नोत्तरी खेलने वाले न तो सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही सभी कश्मीरी हिंदुओ का। यदि इनमें से कुछ कश्मीरी हिन्दू हैं भी तो वे समस्त समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। यह कटु सत्य है कि कुछ तो ऐसे भी हैं जो त्रासदी की बरसी में भी नैरेटिव का प्रणेता बनने का अवसर देखते है।

पूरी दुनिया में पलायन से बड़ी त्रासदी कुछ भी नहीं। यह इस बात से भी समझा जा सकता है। शौक से विस्थापित लोग जो काम-धंधे के कारण मेट्रो शहरों में जीवन यापन कर रहे हैं, उनके मन में भी टीस उठती है कि वे अपने घर या गाँव से दूर है जबकि वे जब चाहें वापस जा सकते हैं। दूसरी ओर ये कश्मीरी विस्थापित हैं जिन्हें हत्या, लूटपाट और इज्जत-आबरू का भय दिखाकर पलायन के लिए बाध्य किया गया। इनका घाव निश्चित ही बहुत गहरा होगा और इनके टीस की तीव्रता बहुत अधिक होगी। साथ ही ऐसा भी नहीं है कि निकट भविष्य में इनकी वापसी की कोई आसान राह भी दिखती है क्योंकि इनकी घर वापसी सिर्फ कानून व्यवस्था का ही प्रश्न नहीं है बल्कि लाखों लोगों के पुर्नवास का मामला रोजी-रोटी से जुड़ा है, इसलिए यह आर्थिक भी होगा। देश को इन्हे सुनना ही पड़ेगा लेकिन इन विस्थापितों का सामान्य दृष्टिकोण समझने के लिए उन प्रताड़ित परिवारों से बात करनी होगी जिनकी दुनिया सिर्फ़ ट्विटर, मीडिया या राजनीति नहीं है।

2019 से पहले तमाम सरकारों की कश्मीर नीति रही है – पाक प्रायोजित आतंकवाद से सख़्ती पेश आएं, कश्मीरी लोगों का मन जीत लें और कभी-कभी दोनों साथ-साथ। इन्हीं नीतियों के तहत कश्मीर में सुरक्षा बलों के हाथ कभी खोल दिए गए और कभी बाँध दिए गए। दिल जीतने का काम सरकारी ‘वार्ताकारों’ और गैर-सरकारी पत्रकारों से किया गया। सरकारी वार्ताकार श्रीनगर से बाहर कितना निकले और उसका असर क्या हुआ, यह वे ही जाने पर डिज़ाइनर पत्रकार कश्मीर की कश्मीरियत की रिपोर्ट लिखने जाते थे और श्रीनगर ‘शिखरा’ तक ही चिकन-मटन व वाइन का स्वाद लेकर मनचाही बातें लिखकर कश्मीर का हाल बयान करते थे। मुठ्ठी भर आतंकवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों की बातें होती रहीं और कश्मीर दशकों तक जलता रहा।

कहना ही होगा ये नीतियाँ स्थिति बदलने में पूरी तरह से विफल रही हैं। इस सरकार ने नयी बात सोची और ऐसी बात सोची जिसके बारे में मिथक यह था कि ऐसा करते ही आग लग जाएगी। सरकार ने इस मिथक की परवाह किए बिना वह किया जो अब तक सोचा भी नहीं जा सकता था। अच्छी बात यह हुई कि कोई आग भी नहीं लगी, हल्की-फुल्की आतिशबाजियाँ हुईं जो कश्मीर के लिए नयी नहीं थी। धारा 370 हटाने और कश्मीर को केन्द्र शासित क्षेत्र बनाने का विधायी फैसला अब अमल में भी आ गया है। बदलाव कितना हुआ है, समस्या के स्थायी हल के हम कितना करीब पहुँचे हैं, यह अभी समय के गर्भ में है।

नयी व्यवस्था से सबसे अधिक कुपित मुफ़्ती और अब्दुल्ला जैसे वंशवादी नेता हैं जो दिल्ली में कश्मीर का प्रतिरुप बनकर बारी-बारी से उसकी पेंशन खा रहे थे। कश्मीर का विकास इसी पेंशन की भेंट चढ़ रहा था। उग्रवादी घड़ा पुरानी व्यवस्था से ही खुश नहीं था, नयी पर उसका आग-बबूला होना स्वाभाविक है। जाहिर है कि इस नयी व्यवस्था से सबसे अधिक खुश कश्मीर के पलायित हिन्दू हैं। जम्मू-कश्मीर के केंद्र शाषित राज्य घोषित होने पर से आशा है कि कानून व्यवस्था सुधरेगी, राज्य का पुलिस बल साफ-सुथरा और प्रभावी होगा जिससे भविष्य में विस्थापितों के वापस लौटने की स्थिति भी बन सकती है। अब कोई भी भारतीय नागरिक कश्मीर में बस सकता है। संपत्ति और व्यापार में निवेश कर सकता है। यह समय के साथ विकास और रोजगार को बढ़ावा देगा। यह बंद कश्मीर को खोलने की प्रक्रिया है जो रातों-रात नहीं होगी। यह लंबी चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया है। आइए, आशा करें कि पलायन की अगली बरसी तक सब कुछ शुभ शुभ रहेगा और पलायन को अऩडू करने के हालात बनेंगे।

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