मंडली

होली पर दो शब्द …

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लगभग हर होली और छठ पूजा में मैं अपने गाँव में ही होता हूँ। इस होली तो गाँव कैसे भी आना ही था क्योंकि दिल्ली में हालात संगीन थे। मैं कोरोना वायरस से बिल्कुल डरा नहीं हूँ लेकिन कोरोना वायरस प्रतिरोध में दिल्ली ने जो कमर कसी है, उससे विचलित था। दिल्ली में लोग हर छींकने वाले से भयभीत ही नहीं हो रहे, भीड़ से बच ही नहीं रहे, हैंडशेक की जगह नमस्ते ही नहीं कर रहे, सैनेटाइजर और मास्क को आउट ऑफ स्टॉक ही नहीं कर रहे, अफवाहों को पंख ही नहीं लगा रहे बल्कि होली खेलने से परहेज करने का भी मन बना चुके हैं। एक बड़े वर्ग को दिल्ली के मालिक ने अपने लोकतांत्रिक पौरूष से होली खेलने से पहले ही महरूम कर रखा है। दो-चार होली खेलने वाले बचे भी होंगे तो उन्हें भी होली पर फैशनेबल जल संरक्षण और ‘सेफ एंड हेल्दी होली’ का ज्ञान छिड़क कर हतोत्साहित कर दिया जाएगा। मैं ठहरा ठप्रेक प्रेमी, इन परिस्थितियों में दिल्ली में कैसे टिकता। लिहाजा गिरते पड़ते ढ़ुकुर पाईंच चलती ट्रेन से रेल कायाकल्प का गुणगान करते हुए मैं गाँव आ गया।

मीडिया और सोशल मीडिया की अपार कृपा से गाँव में भी लोग कोरोना वायरस से डरे हैं लेकिन लड़ने की तैयारी दिल्ली जितनी नहीं है। कोरोना पर लोगों की जानकारी उतनी ही सटीक है जितनी प्रामाणिकता व्हाट्स-एप फारवर्ड्स की होती है। जागरुकता का हाल यह है कि एक बिना धुली हथेली पर अस्सी चुटकी-नब्बे ताल करके बनायी गयी चार खिल्ली खैनी चार होठों के नीचे बिना डर या झिझक दबायी जा रही है। तुर्रा यह कि खैनी बनाने वाली हथेली का मालिक कोरोना वायरस पर ज्ञान दे रहा है और खैनी खाने वाले ज्ञानामृत गटक रहे हैं। इन सबके बाच से होली से गुरेज की कोई बात नहीं है। माहौल होलीमय है। बाजारों में भीड़ इतनी है कि देह से देह छिल रहे हैं। मन में यह ख्याल आता है कि हो न हो पर बिहार की जनगणना में बड़ा लोचा होता रहा है और इसकी जनसंख्या कम से कम 2-3 करोड़ कम रिकॉर्ड की जाती रही है। तभी तो बिहारी यहाँ एक दूसरे की देह छिल रहे हैं और देश के अन्य हिस्सों में दूसरों की।

एक ‘होली मिलन’ का न्योता भी मिला लेकिन सियार ने तार तर जाने से साफ मना कर दिया। पिछले साल एक होली मिलन समारोह में गया था। भरे पूरे समारोह में लच्छेदार भाषण हुए, रंग-अबीर भी उड़े लेकिन फिरी का भोजन-भत्ता बेहद कमजोर था। किसी भी भाषण में होली के ‘हो’ और मिलन के ‘मि’ की कोई झलक भी नहीं थी। अलबत्ता समारोह के वक्ताओं ने प्रतिभागियों को आसन्न लोकसभा चुनावों में होने वाले ईयर टॉर्चर के लिए तैयार कर दिए। स्नेहिल आयोजक ने मुझसे भी दो शब्द कहने का निवेदन किया। मैं भाषणबाजी से खीझा था पर मैंने स्वयं को नियंत्रित कर उन्हें उत्तर दिया, “मैं दो ही शब्द कहूँगा, सिर्फ वक्ताओं के लिए – ना मनबs।

ढ़ोलक की थाप के बीच जलती होलिका देखकर मैंने ‘सिहुला’ जैसे किसी रोग की संभावना को समाप्त कर डाला। होलिका दहन के समय उन लबड्डूओं का भी ध्यान आया जो इसे bonfire बताने की लबरढ़ोंढ़ी करते हैं। मन में विचार आया कि ऐसा लबाड़ों को गाँव में जोगीरा गाते हुए कींचड़, गोबर और धूल-मिट्टी से  धूरखेल होली खेलने वाले मस्तानों के हवाले कर दिया जाए। हो सके तो वाटरलेस होली की बकैती करने वालों को भी धूरखेल के खेल में ठेल दिया जाए।

पुआ, पूड़ी, आलू दम, सूखा पुआ, ठेकुआ, खजूर, पिरकिया, पकौड़ी, छनौरी, कलौंजी, चक्का, बजका, बोजा-बड़ी, दही-बड़ा इत्यादि के बीच खान-पान में शिकार के शौकीनों के लिए मंगलवार के दिन होली होना एक अलग ही गम लेकर आया है और उसका बिल निर्दोष पनीर पर फट रहा है। सुबह से धूरखेल चल रहा है। मर्यादा मस्ती के साथ लुका छिपी का खेल खेल रही है। बड़े बड़े साउंड बॉक्स से उठती आवाज में सुशासन की शराबबंदी दब गयी है और शराब मुखर हो चली है। भाँगबंदी जैसी कोई बात है ही नहीं बिहार में। मस्ती उफान पर है।

दोपहर बाद उड़ते गुलाल के बीच परम्परागत फगुआ गाया जाएगा। पता चला कि गाँव के ढ़ोलकहियों में से अनेक कमाने गये हैं। कामचलाऊ ढ़ोलकहियों से ही फगुआ निबटाया जाएगा, झाल बजाने के लिए किसी अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता होती नहीं। नहा धोकर मुझे भी उसमें शामिल होना है। उधर मंडली की तकनीकी टीम भी लेख छापकर होली के रंग में रंगने को बावली हुई जा रही है और मुझसे लेख जल्दी भेजने के तकाजे कर रही है। लिहाजा लेखक होली की शुभकामनाओं सहित इस सामयिक राजनीतिक जोगीरे के साथ लेख को समाप्त करते हैं …

सिंधिया फोड़ें एटम बम दिग्गी राजा छुरछुरी

कमलनाथ के दिल पर चल रहा इस होली में छुरी

जोगीरा सारा रा रा …

चलते-चलते भरत शर्मा व्यास का गाया यह परम्परागत फगुआ सुनिए … बाबू कुँवर सिंह तेगवा बहादुर बंगला में उड़ेला अबीर, अरे लाल बंगला में उड़ेला अबीर …

https://www.youtube.com/watch?v=vXeykeUraoU

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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