हेल्लो माँ – मंडली
मंडली

हेल्लो माँ

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हेल्लो माँ!

हाँ, हैलो!

“आवाज नहीं आ रही, बाहर आओ”, मैंने कहा।

“हाँ बेटा, ठीक है?”, माँ बोली।

ह्म्म!

खाना खा लिया?

ह्म्म, खा लिया।

क्या खाया?

वही सब्जी, रोटी, दाल, चावल।

कौन सी सब्जी खाई?

अरे… थोड़ा सोचकर… आलू। बस वही तो बनती है यहाँ। आप बताओ, क्या हो रहा है?

बस बर्तन माँजकर उठी हूँ, छोटू ने लेट खाना खाया आज।

“और काम कैसा चल रहा है?”, माँ ने पूछा।

अब नहीं होता मुझसे। आपको तो पता है सब कुछ। सुबह से रात तक लगे रहो पर होना-जाना कुछ नहीं। मेरा काम कुछ इस तरह का है कि दिन भर बहस में निकल जाता है। फिर शाम होते वही मुस्कुराता चेहरा लेकर सबसे मिलता हूँ। झगड़े भी होते हैं कई बार लेकिन शायद आपकी सीखों के कारण कभी आवाज ऊँची नहीं कर पाया। दिल की बात करने को कुछ दोस्त बनाए थे पिछले शहर में। लेकिन न जाने क्या नजर लगी है कि शहर के साथ दोस्त भी बदल से गए हैं। शायद व्यस्त हो गए होंगे। कुछ मिल लेते हैं कभी साल छह महीने में।

कभी कभी काम में मन नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि काम ज्यादा है लेकिन पता नहीं क्यों बस आपसे दूर होने का ख्याल आते ही मन विचलित हो जाता है। आपको शायद याद न हो, कल मुझे घर से निकले पांच साल हो गए हैं, अठारह सौ दिन से ज्यादा। शायद 70-80 दिन ही साथ में रहे हम इन पाँच सालों में। मुझे बस यही खयाल खाए जाता है कि आगे भी ऐसा ही चलेगा तो मैं किसके लिए यह सब कर रहा हूँ।

दो चार दिन आपके साथ गुजारने के लिए मुझे यहाँ कितने दिन रात एक करने पड़ते हैं, शायद मेरे जैसा ही कोई समझ पाए। घर पर कोई शौक नहीं था, कोई आदत नहीं थी। घर से निकलते ही बेटा बड़ा हो गया। जेब में पैसे हैं तो शौक और आदतें भी लग गयीं। हालांकि सभी बुरी आदतों पर विजय पा ली है लेकिन झूठ न जाने क्यूँ मेरा आशिक बना बैठा है। शायद इसका साथ जरूरी भी है आजकल के ज़माने में वर्ना इसे कलयुग क्यों कहा जाता।

सैलरी बढ़ गयी है लेकिन दूरियां भी तो बढ़ रही हैं। मुझे आज समझ आता है कि क्यों लोग कहते हैं कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता। सिर्फ कागज के टुकड़ों के अलावा ये कुछ नहीं। आप तो मुझे देखकर ही खुश हो जाते हो, आपको किस बात की सैलरी मिलती है, बताओ। मेरा बेटा क्या खाएगा, कपड़े धोने के लिए हैं या नहीं, जाते समय खाने में क्या बाँध दूँ। पापा द्वारा जगाए जाने पर; “सोने दो इसको, वहाँ तो काम में ही लगा रहता है।” क्या ये सब काम नहीं करती हो आप? कौन सी सैलरी मिलती है इन सबकी?

सभी सुविधाएं दे रही है कंपनी मुझे। यहां के गद्दे पर सो तो जाता हूँ लेकिन नींद घर की गदूली में ही आती है। न जाने क्यों अक्सर रातें जाग कर निकलती हैं, शायद आपका हाथ नहीं पड़ता है रोज सर पर इसलिए।

खाना टेबल पर साथ बैठकर खाते हैं लेकिन फिर भी तालमेल नहीं बैठता। दुनिया भर के मसाले डालने पर भी कुक के खाने में स्वाद क्यों नहीं आता, शायद इसका पता भी इसरो ही लगा पाए। जाने आप कहाँ से वो स्वाद ले आते हो। आजकल तो लौकी, करेला, टिंडा और भिंडी भी खा लेता हूँ। शायद इसीलिए कि देखना ही नहीं होता कि क्या सब्जी है। पेट ही तो भरना है साहब, भूख तो घर पर ही मिटेगी मेरी। आज भी पता नहीं क्या बनाया था खाने में, मैं तो अचार से रोटी खाकर आया हूँ।

कभी मन करता है कि सुबह ही गाड़ी पकड़ कर घर चला आऊँ। छुट्टियां बहुत हैं लेकिन केवल गिनाने को फिर भी इतने पैसे तो हैं ही कि कुछ महीने गुजारा चल जाएगा।

अपने अन्तर्मन में उमड़ते असंख्य प्रश्नों को एक क्रम में जमा ही रहा कर था कि आवाज आई, “बेटा आवाज आ रही है।”

“हाँ, सब कुछ बढ़िया चल रहा है माँ”, मैंने उत्तर दिया।

एक बात स्पष्ट हो चुकी थी कि यह झूठ ही है जो बाँध बनकर कई अश्रु धाराओं के वेग को सहन कर लेता है अन्यथा मानव इस संसार का सबसे दुर्बल प्राणी है जिसे सत्य को तक स्वीकारने में पीड़ा होती है|

छोटू को कुछ सामान खरीदना है, पैसे भेज दियो उसको।

हाँ, बात करता हूँ।

पापा बोल रहे थे, किस्त जमा करानी है कोई, मुझे पता नहीं |

हाँ, ठीक है।

आपको कुछ लेना है, पैसे भेज दूँ?

नहीं! मैं क्या करूँगी, रहने दे, अपने पास रख, कुछ काम आएंगे।

ठीक है, और बताओ |

कुछ नहीं पापा टीवी देख रहे हैं और छोटू सो गया है, पता नहीं क्या करेगा ये। कोर्स खत्म हो गया है, कोई नौकरी तो नहीं मिल रही। पता नहीं ढूँढ भी रहा है कि नहीं।

रहने दो, कर लेगा वो अपने हिसाब से। रोज रोज मत बोलो, छोटा ही है। अभी मैं हूँ ना।

और कुछ बात है तो बता?

सब बढ़िया हूँ, रखता हूँ।

हाँ आराम कर ले। थक गए होगे।

हाँ, ठीक है।

लेखक – सचिन शर्मा (@JhoothaChal)

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