हमार बरखू – मंडली
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हमार बरखू

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कनेर के पीले फूल रात में चमक नहीं रहे थे पर दूर से आते हरई की लालटेन से फूल चौंधिया से गए। कनेर ने मुँह छुपाना चाहा …

“का हो बच्चा! नींद नहीं आवत है का”, हरई ने पूछा।

कनेर के पेड़ से सटी सरिया में बच्चा बँधा था।  हरई उसे ‘बच्चा’ कहकर सम्बोधित करता  पर उसका असली नाम बरखू यानि … हरई का बैल।

पिछले सावन में जब बादल गरज के बरस कर चमक मार रहे थे तो हरई के साथ बरखू और बरखू के साथ कन्नू भी रामलाल के खेत की ओर गया था। कन्नू हरई का दूसरा बैल था, बरखू का जोड़ीदार। उस रात दोनों साथ नाले गए। साथ ही खेत गये। परंतु बरखू अकेले ही लौटा था … आज तक अकेले ही है।

“पर साल तुम्हार भाई भी अगर दुई मिनट कै समय रूक जात तो राम कसम हम परान ना जाय देते कन्नू के”, हरई आँखों के किनारे से जीवनरस को पोंछते हुए बुदबुदा रहा था।
बरखू को मच्छर परेशान कर रहे थे। उसकी पूँछ जहाँ तक आती, वहाँ तक तो ठीक पर पूँछ के हटते ही मच्छर ऐसे हमला बोल देते, ठीक वैसे ही  जैसे सरकारी ऑफिस में बड़े अधिकारी के जाने के बाद चपरासी और छोटे बाबू लोग फॉर्म में आ जाते हैं।

बरखू का जीवन अब कनेर और खेत तक अकेला था। हरई आता था बीच बीच में कुछ खिलाने।  आज रात में मेले से गन्ने की खोई बिनकर लाया है  और पीले कनेर की महक से अनजान बरखू मजे से खा रहा है।

“जय हो राम, मेरे राम! तोहरे सहारा”

“जय जय जय गिरराज किसोरी, जय मुख चंद … द “

हरई ने चारपाई के नीचे हाथ डालकर लोटा निकाला। लोटे के अंदर से झाँकते पानी और उस पर पड़ी माटी से हरई अनजान था। संवाद ना करते हुए उसने सीधे मुँह भर पानी अंदर किया।
फिर … गड़गड़ … गड़गड़ … लुदड़ … लुदड़ …

हरई ने सामने छपरा के बल्ली पर बड़ी लम्बी थूक मारी। थूक से निकली लार उसके धोती पर भी गिरी। कुछ क्षण भर में लार की छोटी बूँद ऐसे फैली जैसे बेकारी।

“जय हो बिहारी बनवारी … तोरी महिमा न्यारी”

हरई की सुबह हो चुकी थी। ओसारे में बने चूल्हे पर कल रात का बना भात रखा था। चूल्हे की राख पर ओस पड़ी थी। चूल्हा भी पसीज गया था।

हरई आज फिर रामलाल के खेत में जाने से पूर्व बरखू की व्यवस्था करने पहुँचा।

बरखू वहीं कनेर के पास खूँटे में बँधा था। कटोरे में से मुट्ठी भर भात निकाल हरई अपने बच्चे  की ओर बढ़ रहा था। उसमें भी दूर से आते मालिक के आने पर ममता, प्रेम और करुणा के सारे भाव एक साथ उमड़ने लगे। बरखू की अवस्था मानो ऊधौ को देखती गोपियों सी  हो गई थी। बेचारा खूँटे को केन्द्र बनाकर पूरा वृत्त खींचने लगा। बरखू का यह निश्छल प्रेम मालिक से ज्यादा भात के प्रति था। साथ में कुछ हरयरी भी थी। हौदा में दो बाल्टी ठंडा पानी भरके हरई ने बरखू के पीठ पर हाथ फेरा।

बरखू ने एक बार में लब्ब से सारा भात मुँह में भर लिया और लम्बी साँस ली। बरखू चंचल नहीं सौम्य जीव है। बरखू स्वामी की सर्वांग अवस्था में वफादारी के मानदंड लिख रहा है और अब जीभ बढ़ाकर कटोरा छीनना चाहता है।

हरई ने आवाज़ लगाई, ” हा … हा … हा … हट्टट्ट”
बरखू आँखें लुपलुपाता पीछे हटा।  नित्य प्रति चलती दिनचर्या आज फिर यहीं से शुरु हुई।

“अरे चाचा! निरपाल बाबू पूछत रहे आपको। शायद फसल दांवै को गोरू नहीं मिल रहे। अगर बरखू चंगा हो तो खेद दो उधर।”,  दूर से आते रमफल ने हरई को सूचना दी।

निरपाल बाबू गांव के सरपंच हैं। तीस साल से यानि, छे बार से परधानी उनके खेत की सरसों हो गई। अब तो परधानी के चुनाव और परिणाम दोनों बस औपचारिकता की फुनगी बन गई है। हर बार परधान ही परधान रह जाते।

हरई मनै मन बड़बड़ाते, धोती समेटे निरपाल बाबू के चौखट पर पहुँचा।  उस चौखट पर जहाँ हर कोई थूक अंदर कर गीली हंथेली सुखाने लगता है। चौखट पर बंधे गोरू और हारवेस्टर मशीन की चौड़ाई को चीरते हरई ने भर्राई आवाज़ में कहा, “जय राम जी की परधान जी …  रमफल खहतरहा” , हरई ने तीन बार आवाज़ लगाई।

परधानी के तगमे और चमचमाती शान से ऊँघते  परधान जी ने बनियान पर धोती धारण कर दर्शन दिए। और बरखू के प्रति ललचाई नजर फेरी,  ” अरे हरई! तोर बैल बँधवा दे इहाँ, हरवाहन से कहके. दोगुना दाम मिली।”

परधान बात पूरा करने वाला था कि पीछे से कुछ आवाज़ आई।

हरई का माथा ठनका। उसके कान जलने लगे थे। पीछे से बरखू की आहट मिली। बरखू चीख रहा था। दूर से खीसें निपोरते परधान के मुस्तंडों ने बरखू पर कब्ज़ा कर लिया था।  उस पर बीच बीच में परधानी बेंत चल रही थी। परधानी पाश में बँधा बरखू असहाय सा हरई की ओर देख रहा था, मानो भात ढूँढ रहा हो.. या फिर कुछ और …

हरई गरीब था। हरई बुजुर्ग भी था पर ऊपर से नीचे आते समय उसके  खाते में जो रस टपका था, वो अब जाग गया।  बरखू दुधमुँहे बच्चे सा अब भी चीख रहा था। और वो स्वर उसके स्वामी के कान चीर रहे थे।

हरई ने झटपट लपक के गँड़ासा उठाया। और परधान को दुलत्ती फँसाकर गिरा दिया। परधान नीचे चित्त। समर्थक दौड़ पड़े। हरई ने गंडासा मुंडी पर सटा दिया। हरई ने सिनेमा नहीं देखा था पर उसने वास्तव में कुछ हीरो जैसा ही साहस दिखाया।

मुरचाये गँड़ासे की फाल पर परधान की मुंडी लटकी थी परधान डरकर अर्द्ध अचेत हो गया था।
परधान की उँगलियों ने बरखू के पाश खोलने के निर्देश दिए। मुस्तंड दौड़े। ज्यों बरखू पर बेंत पड़नी बंद हुई और रस्सी ने पकड़ ढील की कि बरखू खरहा सा भागा।

बरखू दौड़ कर आज चूल्हे तक पहुँच गया। वह भात नहीं ढूँढ रहा था। डर गया था. परधानी पाश से मिली मुक्ति उसे यम से छूटे पाश सी प्रतीत हो रही थी।

हरई ने हर्ष में परधान की गर्दन गँड़ासे से दूर कर दी। यह बात मुस्तंडों में वनाग्नि सी फैल गई। सब हरई की ओर झपटे।

पैसे वालों की दुनिया होती है। पैसे से कानून की तलवार पर सोने की म्यान चढ़वा दी जाती है। पैसा रुपया में बदलता है। रूपया फिर पैसावाला बनाता है। और पैसे की पैमाइश करने में अव्वल पैसेवाले अपने पाले में परलोक भी ला सकते हैं।

यही सब बुदबुदाते हरई ने सरेंडर कर दिया। कोतवाल आ गए। परधान के गोड़ पकड़ लटक गए, ” माफी सरकार … आप चिंता ना करौ। एकै और बैले दोनो को मूड़ देब।”

कोई फुसफुसाया, ” अब तो जेल में बेलन चले। बुढ़ापे कै भांड मांस सत्तू बन जाए। और जनावर भी पड़ा पड़ा अकेले मर जाए।”

ये सुनकर हरई काँप गया. उसने आवाज़ लगाई, “अरे राम…. मोरे राम तोरे सहारा…. दुहाई हो….
हमरा बरखू 

इतना शोर सुनकर भाय- पटीदार गर आ गए। हरई के मुँह पर छींटे मारे. हरई होश में आया।

“जय गिरधारी हो … हम सपना देखत रहे”

लेखक – शिवम (@ShivamS95184272)

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