घोड़वहिया – मंडली
मंडली

घोड़वहिया

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कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिनसे जुड़ी कोई छोटी धटना मुख्य घटना बनकर स्मृति पटल पर अंकित हो जाती है। कई महीने पहले भतीजी की शादी के सिलसिले में मैं महमदा गया था। वहाँ एक सज्जन मिले। वह वर पक्ष के पट्टीदार थे। पहली मुलाकात होने के बावजूद उन्हें हमसे घुलने-मिलने में समय नहीं लगा। चौपट होती खेती और बदलते समाज के कई पहलुओं पर हमारी बेबाक चर्चा हुई। रोजगार और जीवन के सरोकार पर वजन भरी बातें कहते हुए वह भावुक हो गये और अपनी बात करने लगे। पूरा विवरण प्रथम पुरूष में …

माँ, दो छोटे भाईयों और एक बहन की जिम्मेदारी मेरे कंधे पर देकर बाबूजी गुजर गये। खेती की कमाई परिवार के लिए कम पड़ जाती थी। खेत बँटाई पर देकर मैं कलकत्ता चला गया और चटकल की नौकरी से परिवार पालने लगा। खर्च और बढ़ा तो गुजरात और दिल्ली भी धाँग दिया। मैं परिवार के लिए ही खप रहा था लेकिन माँ मेरी शादी के लिए दुबली हुई जा रही थी। शादी भी हुई लेकिन वैसे नहीं जैसे बाबूजी के रहते हुए होती। मेरी शादी के बाद माँ पोते का अरमान पालने लगीं। वह निराश नहीं हुई और तीन साल में उसे दो पोते हुए।

मेरी सारी कमाई घर खर्च में ही खत्म हो जाती। बहन की शादी करनी थी। उसकी चिन्ता मुझे खाए जा रही थी। मैंने दुबई जाने का निर्णय किया। मैं चार साल दुबई में रहा। बहन की शादी हो गयी। एक-दो साल बाद भाई भी अपने पैरों पर खड़े हो गये। उनका शादी-ब्याह भी हो गया। अभी मुझे अपने दो बच्चों को पढ़ाना-लिखाना था। दुबई से वापस आकर मैं मुम्बई में खटने लगा। परिवार पलता रहा। बड़ा बेटा कच्ची उम्र में सेना में चला गया, छोटा बेटा तीन साल बाद नौसेना में। मुझे लगा कि अब मुझे घर वापस जाना चाहिए।

मैं घर आकर खेती करने लगा। कभी बाढ़ झेलता तो कभी सूखा। डूबती खेती के बीच पैसों की कमी नहीं थी। भाई भी देते थे और बेटे भी। सब चाहते थे कि अब मैं आराम करूँ। मैं आराम नहीं चाहता था। मेरे मन में एक अरमान दबा पड़ा था। वह मैं किसी से साझा नहीं करता था। खाली बैठे हुए मैं अक्सर सोचता, “जीवन भर लिखो-फेंको नौकरी करके मैंने परिवार पाल लिया और अपनी सारी जिम्मेदारियाँ निभा दीं लेकिन अपना एक शौक पूरा करने की सोच भी नहीं सका।” इस उम्र में उस शौक की बात भाईयों या बेटे से कहने की हिम्मत नहीं थी लेकिन शौक भी जिद्दी था, पीछा नहीं छोड़ रहा था।

किसी से कैसे कहता कि इस बुढ़ौती में मुझे घोड़े की सवारी का शौक लगा है। शौक तो जवानी में भी था लेकिन जवानी जिम्मेदारियों की भेंट चढ़ गयी। अपने इस शौक में मैं अगल-बगल के गाँव के घोड़वहियों से दोस्ती करने लगा। उनके साथ उनके घोड़े-घोड़ियों की बातें करके ही मैं खुश हो जाता था। मेरा समय दुआर पर कम और घोड़वहियों के साथ अधिक बीतता। स्थिति ऐसी थी कि मुझे फलां के घोड़े और ढिमकान की घोड़ी के बारे में फलां और ढिमकान से अधिक पता था।

घोड़े की सवारी का मौका नहीं मिलता लेकिन मुझे घोड़े-घोड़ियों को देख लेना ही अच्छा लगता। इसी शौक में मैं पत्नी के साथ सोनपुर मेला भी गया। पत्नी मेले के लिए खुश थीं लेकिन मेरा ध्यान पशु मेले पर ही अटका रहा। मुझे ऐसा लगता कि मेरी पत्नी मुझे बाग से गोभी लेकर आने का ताना दे रही हैं। वह कभी-कभी मुखर ताने भी देतीं लेकिन ताना इतना कड़वा नहीं होता कि मुझे अपने शौक पर पाबंदी लगती दिखे। बहरहाल, सोनपुर मेले में मैंने हर तरह के घोड़े देखे। कई पर मैंने मुँहबोली सवारी भी कर ली। मैं मन ही मन सोचता कि यदि मुझे यहाँ से घोड़ा खरीदना होता तो निर्णय कितना कठिन होता।

साल भर तक ऐसे ही चलता रहा। मैं अपने अधूरे शौक में ही मस्त था लेकिन इसे भी किसी की आँख लग गयी। मार्च में देश में कोरोना आ गया। कोरोना गाँव पहुँचा या नहीं पर उसके आतंक से हाहाकार अवश्य मच गया। घूमना-फिरना बंद हो गया। घोड़े-घोड़ियों व घोड़वहियों से मेल-जोल कम होने पर थोड़ी उदासी रहने लगी लेकिन दिन कट ही रहे थे, या यूँ कहिए कि बस कट ही रहे थे। पत्नी उदासी का कारण पूछतीं तो मैं कोरोना की अनिश्चितता का बहाना बना देता। वह मेरे इस भुलावे में आ जाने का सहज अभिनय करतीं और कहतीं कि रामजी की कृपा से सब ठीक हो जाएगा।

चार-पाँच महीने बाद गाँव में स्थिति थोड़ी सामान्य होने लगी। लोग-बाग यहाँ-वहाँ आने जाने लगे। मेरे लिए भी अब घोड़ों और घोड़वहियों से मिलने का रास्ता साफ हो गया। मैं दुबारा उधर जाने लगा लेकिन अधिक देर तक रुक नहीं पाता। मुझे ऐसा लगता कि मैं उधर जाकर अपनी और मेरे उस शौक की तौहीन करता हूँ जो पूरा हो ही नहीं सकता। धीरे-धीरे घोड़ों और घोड़वहियों से मेरा मिलना-जुलना बंद हो गया।

खेती को बाढ़ ने चौपट कर दिया था। बाढ़ के दौरान चँवर से भागे घोड़परासों ने नाक में दम कर दिया था। उनसे सुरक्षा के लिए मैं खेतों की घेराबंदी करवाने लगा। आज घेरा बनता और कल उसे घोरपरास तोड़ देते। दोनों भाई, दोनों बेटे और पत्नी मुझे बार-बार खेती छोड़ने और आराम करने की सलाह देते। मैंने खेती छोड़ने का निर्णय ले भी लिया लेकिन उनकी सलाह पर नहीं बल्कि घोरपरासों के आतंक से। मुझे लगा कि फसल लगाने का क्या फायदा जब घोरपरास उन्हें बर्बाद ही कर देंगे।

काम से हुई थकान के बाद आराम सुखद होता है लेकिन जब आराम ही एकमात्र काम बन जाए तो उससे हुई थकान का कोई इलाज नहीं होता। चौबीस घंटे के दिन में कितना भी समय लेकर स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ, खाना-पीना और सोना कर लूँ तो भी आठ-दस घंटे ऐसे होते जिन्हें काटना मुश्किल होता। टीवी में मेरी कभी कोई रूचि थी नहीं लेकिन उसे भी देखने की कोशिश करता। ताश खेलने की कोशिश भी की लेकिन वहाँ भी बात नहीं बनी। ले-देकर वही घोड़ा प्रेम की टीस उभरती जिसे मैं किसी से कह भी नहीं सकता था।

छठ पूजा के समय दोनों भाई और दोनों बेटे घर आए। भरे-पूरे घर में मैं अपनी टीस लगभग भूल चुका था। पूजा समाप्ति के बाद एक दिन छोटा भाई मुझसे बोला, “भईया, एगो घोड़ा किन लs।” बेटों ने भी समर्थन किया। मेरी पत्नी ने कुछ नहीं कहा लेकिन वह मेरी ओर देखने से बचती रहीं। मैंने न हाँ कहा और न ना।

2-4 दिनों बाद 56 हजार रूपये में एक सुन्दर घोड़ी खरीदी गयी। हर महीने उस पर 2-3 हजार का खर्च है। इसके अलावा मेरे 2-3 घंटे उसके रखरखाव पर खर्च होते हैं। 1-2 घंटे खूँटे पर बँधी घोड़ी को निहारने में लग जाते हैं। चौबीस घंटे का दिन अब मेरे लिए कम पड़ता है।

आज जब लोग मुझे घोड़वहिया कहते हैं तो सीना गर्व से फूल जाता है। मैं जब अपनी घोड़ी पर चढ़कर निकलता हूँ तो 20-22 वर्ष की ‘लिखो-फेंको’ नौकरी और संघर्ष की थकान खत्म हो जाती है। घोड़े की सवारी की बारीकियाँ बेटों और भाईयों को बताते हुए थकता नहीं। अब मेरा यह अफसोस भी जाता रहा कि मैंने अपने लिए कुछ नहीं किया। मेरे लिए किसी और ने वह कर दिया जो मैं स्वयं के लिए नहीं कर सका। मेरे लिए घोड़ी खरीद देना आसान था लेकिन मेरे शौक को वैसा रिश्ता ही भाँप सकता था और उसका सम्मान कर सकता था जो रिश्तों के समझ का भाव रखता हो।

1 thought on “घोड़वहिया

  1. यह वही समझ पाएंगे जो घर से दूर कहीं खप रहे है।

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