मंडली

घसेका और घकेका

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ज्ञानियों ने समय समय पर कहा है कि सदैव सकारात्मक सोचिए। हम अपना अज्ञान छिपाने के फेर में ज्ञानियों का अनुसरण करते रहते हैं। तो हुआ यूँ कि लॉकडाउन लगा दिया गया देश में और हम सब के सब सकारात्मक सोचने लगे। एक दिन ताली-घंटी बजा कर हौसला बढ़ाया और दो चार दिन आशंका और छुट्टियों के उत्साह में बीते कि अचानक बड़े लोगों के ज्ञान चक्षु खुल गए।

नया अस्त्र हाथ आ गया और शुरू हो गया सिलसिला घसेका का … और हम हो गए शिकार घसेका और घकेका यानि घर से काम और घर के काम के –

नौकरी का अभिनव तरीका
यूरेका यूरेका यूरेका,
रासुका से कहीं अधिक
खतरनाक है घसेका …

पहले पहल प्रयोग के लिए दिन में बस पंद्रह बीस मिनट और अब पूरा पूरा दिन … कभी कभी तो रात भी … आखिर सरकारी आदेश है … वेतन देना ही है तो काम भी लेना है … अति उत्साह की स्थिति यह है कि बच्चे बूढ़े और जवान सब के सब व्यस्त हैं, पस्त हैं और त्रस्त हैं। बेचारों के चेहरों की मुस्कुराहटें अस्त है। इसी के बीच कुछ भाग्यशाली मस्त भी हैं, शायद पूर्व जन्म का फल हो।

बाहर लॉक डाउन और घर में स्वघोषित निषेधाज्ञा है। दो कमरों का घर और परिवार के तीन सदस्यों में से दो घसेका के लिए अलग अलग कमरों में बंद। बेचारा बच्चा बाहर नहीं निकल सकता, टीवी नहीं देख सकता और दस बजे पहले भोजन कर ले तो ठीक वरना रसोई तीन बजे ही खुलेगी। इतना ही नहीं नई पीढ़ी का होने से तकनीशियन का उत्तरदायित्व भी उसी का है। ये डाउनलोड कर दो, ये अपलोड कर दो, ये कम्पोज कर दो, ये मेल कर दो इत्यादि – बेचारा बिना वेतन के ही हलकान।

विद्यालय पहले इस घसेका से अछूते थे। अब तो नर्सरी के लिए भी पंक्ति पर यानि कि ऑन लाईन कक्षाएँ चल रही हैं। चार घंटे ऑनलाईन स्कूल फिर ट्यूशन और उसके बाद संगीत नृत्य का प्रशिक्षण – लॉकडाउन खत्म होते ही नोबल जो जीतना है सबको …

महिलाओं की तो खैर पूछिए मत। उनका तो कार्यभार दुगुना-तिगुना हो गया है। सुबह-सुबह रसोई से जंग लड़ती हैं। खाना-खजाना की फरमाइश भी चरम पर है। मेड से सोशल डिस्टैंसिंग है, सो अलग। रसोई से निबटकर कम्प्यूटर देव के समक्ष स्थापित हो जाते हैं, विश्राम के लिए। शाम को फिर वही चूल्हा चौका … तिस पर भी सौ उलाहने और फरमाइशी भोजन का कोई अंत नहीं – छुट्टियों में तो कुछ अच्छा बनातीं। हम भी तो काम करते हैं।

ये कोरोना भी ना बस … हाथ धो धो कर पीछे ही पड़ गया है। गलती से टीवी देख लो तो लगता है कि बस चला-चली की बेला है। इधर बाजू वाली अरोराईन रोज एक नया वीडियो बना कर डाल देती हैं, देखने के तकाजे पहले कर देती हैं। देखने पर पता चलता है कि ‘लॉकडाउन में गमलों में फल सब्जी उगाएं’ पर प्रवचन चल रहा है। अरे देवी जी, ये भी तो बताएं कि लॉकडाउन में बीज कहाँ से लाएँ?

दिल जलाने को व्हाट्स-एप भी कम नहीं हैं। एक कवयित्री जी रोज कोरोना पर बधाई लिख मारती हैं। फिर फोन कर के पूछती हैं, “अरे लता पढ़ा क्या?” तारीफ न मिलने की संभवना स्वयं खत्म कर देती हैं, “आज तो बहुत जोरदार लिखा है मैंने।” उधर दूरदर्शन ने भी मौके का खूब फायदा उठाया है और हम जैसों का दिल दुखाया है। घसेका और घकेका की मार के बीच कैसे देखें भगवान राम और श्री कृष्ण की मोहिनी मुस्कान। रात दस बजे चाणक्य आते आते तो अस्थायी टें ही बोल जाते हैं।

आलम यह है कि कहने को छुट्टियाँ हैं लेकिन पूरा दिन ऑन हैं, ऑफ है तो बस मूड – कुछ कोरोना की अनिश्चितता में और घसेका-घकेका के दबाव में। बस ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जल्दी ये लॉकडाउन खत्म हो, कोरोना अपनी राह चला जाए और घसेका नामक इस दैत्य से हमारा पीछा छूटे।

एक बेचारी घसेका की मारी …

लेखिका – अक्षिणी भटनागर (@Akshinii)

4 thoughts on “घसेका और घकेका

  1. वाह ! मज़ा आ गया !! हँसी हँसी में जैसे किसी ने दुखती रग छेड़ दी ।

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