मंडली

अपनी जयन्ती पर गाँधी बाबा की भारत यात्रा

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अपनी जयन्ती पर गाँधी जी ने भारत भूमि पर आने का  निर्णय किया। कुछ सच्चे गाँधीवादियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की पर वे असफल रहे। उन्होंने कोरोना तक का हवाला दिया पर गाँधी बाबा नहीं माने। कुछ ने मन ही मन सोचा, “वापस आएँगे तो हमें भी देश का हाल समाचार मिल जाएगा।“ कुछ इस भाव से भी चुप रहे कि जाएँ और जाकर देखें गाँधीवाद का हाल।

घनश्याम दास विरला की सहायता से एक अन्तर्लोकीय विमान हायर किया गया। गाँधी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचे। एयरपोर्ट के आस-पास उड़नतश्तरी देखे जाने पर अफरा तफरी मच गयी लेकिन विमान गाँधी जी को सफलता पूर्वक उतारकर वापस चला गया। बचते बचाते गाँधी जी एयरपोर्ट से बाहर निकले। मुसीबत यह थी कि उनके पास न मतदाता पहचान पत्र था और न ही आधार कार्ड। क्वोरंटीन किए जाने का भी खतरा भी था।

गाँधी बाबा को दांडी मार्च का अभ्यास था, इसलिए वह पैदल ही निकल पड़े। भीड़भाड़ देखकर गाँधी बाबा ने मन ही मन सोचा, “कोरोना का भौकाल फालतू ही खड़ा किया गया है।” मुम्बई के बदले भूगोल और बढ़ी हुई चमक दमक के कारण गाँधी जी को कुछ दिक्कतें होने लगीं। लिहाजा वह एक गाइड हायर करने पहुँचे। उन्होंने गाइड को अपना परिचय दिया और उसकी सेवाओं के लिए उसे साढ़े छह आने प्रतिदिन देने का प्रस्ताव दिया। गाइड हँसते हुए बोला, “गाँधी बाबा, देश बहुत तरक्की कर गया है। दु अन्निया मेम्बर तो अब कांग्रेस में भी नहीं बनते या यूँ कह लीजिए कि मेम्बर ही नहीं बनते। जिन्हें मेम्बर बनना होता है, वे हवा का रुख देखते हुए मिस्ड कॉल मार देते हैं और भाजपा के सदस्य बन जाते हैं।“ गाँधी जी ने अपने अन्तर्लोकीय संचार तंत्र से घनश्याम दास विरला से बात की। उन्होंने गाँधी जी को आश्वस्त किया, “पैसों की फिक्र मत कीजिए। उसकी व्यवस्था हो जाएगी।“ गाइड हायर हो गया।

गाँधी टोपी पहने हमारे लोकतंत्र के कर्णधारों के पोस्टर्स और गाँधी जयन्ती के होर्डिंग्स देखकर गाँधी जी खुश हुए और बोले, “मेरे बाद भी गाँधीवाद सुरक्षित है।“ गाइड बोला, “सिर्फ आप सुरक्षित हैं। लोग आपकी बातें खूब करते हैं, आपके विऱोधी भी। कुछ लोग गाँधी टोपी भी पहनते हैं पर गाँधीवाद को मारने वाले ये टोपीधारी ही हैं। सब गाँधी को जानते हैं पर गाँधीवाद समझने वाले बहुत कम हैं और उस पर चलने वाला एक भी नहीं।“

गाँधी जी ने आगे पूछा, “कोई गाँधीवाद बचा भी है बॉम्बे प्रांत में?” गाइड ने खीझते हुए उत्तर दिया, “देखिए, बॉम्बे प्रांत अब महाराष्ट्र हो चुका है और बॉम्बे शहर मुम्बई। राज ठाकरे ने बॉम्बे सुन लिया तो गज़ब हो जाएगा। सबसे बड़ा रिवर्स गाँधीवादी वही हैं। वैसे तो कई गाँधीवाद होने का दावा करते हैं पर आप दो से मिल लीजिए – मुन्ना भाई और अन्ना हजारे। आपका काम बन जाएगा।“

गाँधी जी ने इन दोनों से मिलने से पहले होम वर्क करने का फैसला किया। गाइड ने उन्हें फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ दिखा दी और फिर उन्हें आशुतोष की किताब ‘थर्डीन डेज दैट अवेकेन्ड इंडिया’ पढ़वा दी। गाँधी जी गाइड के साथ मुन्ना भाई के यहाँ पहुँचे। सर्किट ने उन्हें रोक दिया। गाँधी जी ने मिलने की जिद की तो सर्किट बोला, “गाँधीगिरी से एमबीबीएस करके मुन्ना भाई डॉक्टर बन गेला है। अभी वह रोगी देख रेला है, 60-70 रोगियों की लाइन लगेली है।“

गाँधी जी निराश होकर अन्ना हजारे के घर पहुँचे। अन्ना के पालक-बालक ने भी उन्हें अन्ना से मिलने से रोक दिया, “अन्ना कह रहे हैं कि उनके अनशन में भी अब काग-पंछी भी नहीं आते, गाँधी जी उनसे मिलने क्यों आएँगे। अनेक छद्मी गाँधी बने घूम रहे हैं, उन्हीं में से कोई होगा।“ अनायास ही गाँधी जी के मुँह से निकला, “हे राम!” गाइड धीरे से बोला, “गाँधी बाबा, जय श्रीराम क्यों नहीं कहते, आजकल वही हिट है।“ गाँधी जी ने डाँट दिया, “चुप रहो! दिल्ली चलने की व्यवस्था करो।“

गाँधी जी ने अपना विमान मँगाया और गाइड संग दिल्ली पहुँचे। उन्होंने सीधा राजघाट का रूख किया। नेताओं का झुंड गाँधी जी को श्रद्धांजलि देने आ रहा था। गाँधी जी प्रफुल्लित होकर बोले, “यहाँ बहुत गाँधीवादी हैं।“ गाइड ने उनकी खुशी प्रवाहित होती लाइन काट दी, “सबकी दास्तान सुनाता हूँ आपको …” गाँधी जी ने चिढ़ते हुए गाइड को कहा कि अब सिर्फ परिचय दो। एक परिचय पर गाँधी थोड़े व्यग्र हुए, “इससे बोलो कि मेरा दिया हुआ नाम वापस कर दे।“ एक और परिचय पर उत्तेजित होकर बोले, “इसको थप्पड़ मार सकते हो?” गाइड ने उत्तर दिया, “इसे लाली तक मार देता है। मैं भी मार दूँगा लेकिन उसके एक्स्ट्रा पैसे लगेंगे। और ये देखिए ये हैं भारत के सबसे लोकप्रिय नेता और भारत के प्रधानमंत्री।“ गाँधी जी ने शांत चित्त होकर कहा, “हम्म, इनसे मैं अकेले में मिलकर बात करना चाहता हूँ।“

राजघाट से बाहर आकर गाँधी जी मेट्रो, बस, ओला और उबर में बैठकर पूरी दिल्ली घूमे और बोले, “खूब तरक्की है दिल्ली में। गाँवों का भी यही हाल है?” गाइड ने उत्तर दिया, “गाँवों में भी विकास हुआ है लेकिन गाँव और दिल्ली के बीच की खाई लगभग उतनी है जितनी आपके समय थी। ग्राम प्रधान मज़े में हैं और ग्रामीण लोकतंत्र के सौजन्य से मची मुफ्त की लूट में चरखा लेकर भागते रहते हैं। ग्राम और स्वराज दोनों दिल्ली आ गये हैं, जो बचे हैं वे भी आना चाहते हैं। एक जन स्वराज-स्वराज कहकर राज कर रहे हैं और दूसरे ने स्वराज दल बना लिया है। “

अब गाँधी जी कांग्रेस मुख्यालय पहुँचे। उन्होंने कांग्रेस की दशा और दिशा पर विस्तृत जानकारी ली और संतुष्ट होकर बोले, “सत्तर साल से अधिक में भी कांग्रेस को भंग कर देने की मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई। शायद अब हो ही जाए।“ गाइड ने बात काटी, “मतदाताओं का कुछ नहीं कह सकते वरना संजय-इंदिरा ने आपातकाल लगाकर भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। राजीव ने भी प्रयास किए थे। केसरी के बाद की काँग्रेस के बारे में कौन कह सकता था कि यह दस साल राज करेगी। हाँ, राहुल जी में अपने पूर्वजों से अधिक प्रतिभा है, ऐसा देश मानता है।“

यात्रा के अगले पड़ाव पर गाँधी जी को चम्पारण जाना था। गाइड ने फिर टंटा किया, “चंपारण मत जाइए। बिहार में बाढ़ है। और वहाँ चुनाव की गहमागहमी भी है। आप इग्नोर कर दिए जाएँगे या नेता लोग आपसे चुनाव प्रचार करने का निवेदन करने लगेंगे और आप धर्मसंकट में पड़ जाएँगे। पटना से चंपारण जाने के लिए गंगा नदी पर गाँधी सेतु पार करना होगा। सेतु इतना जर्जर है कि लोग मजबूरी का एक नाम गाँधी सेतु भी बताने लगे हैं। वैसे भी अब चंपारण के नील किसानों के वंशज दिल्ली और नोएडा में एमएनसी की नौकरी करने लगे हैं, कुछ लेबर-लफाड़ी भी बन गये हैं। एक चंपारणी दिल्ली में ही मिल जाएंगे जिन्हें मैग्सेसे पुरस्कार मिला है।“

इस बीच गाँधी जी को शास्त्री जी का अन्तर्लोकीय फोन आ गया, “कैसा चल रहा है बापू?” गाँधी जी ने उत्तर दिया, “सब बढ़िया है। देश ने बहुत विकास किया है। देश में मोदी की हलचल है। देश कोरोना पर अमेरिका को टक्कर दे रहा है। साल में एक दिन ऐसा होता है, आज मेरे नाम का डंका बज रहा है। कुछ लोग तुम्हें भी याद कर रहे है। अगली बार तुम्हें भी साथ ले आएँगे।“

अंत में गाँधी जी ने सीधे लोक कल्याण मार्ग का रुख किया। प्रधानमंत्री आवास पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। दो युग के दो नायकों के बीच शिखर वार्ता हुई। वार्ता समाप्ति के बाद गाँधी जी ‘मिशन सक्सेसफुल’ का भाव लिए बाहर निकले। प्रधानमंत्री आवास के बाहर खड़े गाइड को उन्होंने वार्ता का कोई ब्यौरा देने से साफ मना कर दिया, “तुम बस दिहाड़ी से मतलब रखो।” उन्होंने गाइड की दिहाड़ी का हिसाब किया, दिहाड़ी और मुम्बई के राह खर्च के पैसे दिए और वह वापसी के लिए अपनी उड़नतश्तरी की ओर ओर बढ़ चले।

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लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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