फिर एक क्रांति – मंडली
मंडली

फिर एक क्रांति

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दौर ऐसा था कि लाइसेंस परमिट राज पूरा गया नहीं था, उदारवाद उमड़कर आया नहीं था। साम्यवाद अभी सरका नहीं था, राष्ट्रवाद पूरा भड़का नहीं था। सदाबहार समाजवाद सौ दिन में ढाई कोस चलकर भी कायम था। कानपुर शहर भी इसी मिजाज से स्वयं को नया गढ़ रहा था, आगे बढ़ रहा था। नहीं बदले थे तो कनपुरिया लौंडे जिनकी फ़ितरत ही ऐसी थी कि बिना उत्पात मचाए न दिन को चैन आता था और न ही रातों को नींद।

‘मिस्टर क्लीन’ बोफोर्स पर क्लीन-बोल्ड हो चुके थे। ‘राजा नहीं फ़कीर है, देश की तकदीर है’ फेम राजा मांडा बोफोर्स गर्जना के साथ दिल्ली में सत्तासीन थे। सामाजिक न्याय से समाज को समरस बनाने को कृतसंकल्प राजा साहब की कृपा से ‘मंडल कमीशन’ ने पुण्य सलिला भारत भूमि पर अवतार ले लिया था। बुजुर्आ शोषक ‘मंडल कमीशन वापस लो’ से क्रांति के पूरे रंग दिखा रहे थे। नित नए नारे गढ़े जा रहे थे। हाथ से बने पोस्टर्स में कनपुरिया कला कुलाँचे मार रही थी। ऐसे गाढ़े समय में शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ रचित ‘इतिहास न तुमको माफ़ करेगा’ का सस्वर पाठ हो रहा था। मंडल मसीहा बने राजा साहब के लिए नारा बदल गया था – राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है।

कुल मिलाकर क्रान्ति का स्कोप था। कानपुर के मशहूर पत्थर कॉलेज के पास एक भूतहा सी इम्पीरियल बिल्डिंग वाले कॉलेज में शाम ७ बजे का समय था। साउथ कैम्पस में सेकंड ईयर छात्र हॉस्टल में एक पतला-दुबला नेतानुमा ‘कनपुरिया डे-स्कॉलर’ भाषण दे रहा था; “जो आज प्रदीप के साथ हुआ है, कल वो तुम्हारे साथ हो सकता है, मेरे साथ हो सकता है, अवस्थी के साथ हो सकता है।” कुछ लड़के आशंकित हुए कि कहीं यौन-शोषण टैप कुछ तो नहीं हो गया। तब महिला मेडिकल कॉलेज के बारे में अनेकों आधुनिक दन्त-कथाएं सुनी जाती थीं। भाषण आगे बढ़ा तो बात खुली कि प्रदीप आज बाल कटवाते समय बेहोश हो गया। डॉक्टरी जाँच से पता चला कि उसको पीलिया हुआ है। ‘कनपुरिया क्रांतिकारी’ का विश्वास था कि हॉस्टल का पानी और खाना दूषित है। हॉस्टल-वार्डन भी भ्रष्टाचार प्रदूषित है। वह मेस-ठेकेदार से पैसे खाता है। उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता क्योंकि डीन और डायरेक्टर भी मिले हुए हैं।

भाषण के अंत में नेतानुमा छात्र ने आन्दोलन का आह्वान करते हुए कहा कि इसकी रुपरेखा तय करने के लिए थर्ड ईयर छात्र हॉस्टल में कल शाम ७ बजे एक बैठक होगी। उसने डीन के जासूसों से सावधान रहने की सलाह भी दी। अगले दिन हुई बैठक में नेता तय किये गए और उन्हे निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया। एक गवैया प्रवृत्ति के छात्र ने श्रोता सामने पाकर मौके पर चौका मारते हुए एक भड़कता सा क्रांतिकारी गीत भी गा दिया। छात्र-शक्ति उत्साहित हो गयी कि अब डायरेक्टर की लेनी ही है। वैसे भी डायरेक्टर और डीन के सख्त अनुशासन से लड़कों में नाराजगी थी। कुछ साफ़-सुथरी इमेज वाले छात्रों को गर्ल्स-हॉस्टल से संपर्क साधने और क्रान्ति के शोले भड़काने का जिम्मा सौंपा गया। इस शोले में कई वीरु अपनी बसंती भी खोजने में लग गये।

क्रांति भड़कनी थी, सो भड़क गयी। बैठक में निर्णय हुआ कि मिड-सेमेस्टर टेस्ट्स के बायकाट से छात्र एकता मापी जाए। वैसे भी छात्र नेताओं को इम्तिहान देना एकदम ग़ैर-ज़रूरी काम लगता था। परीक्षा का बहिष्कार हुआ और सफल भी रहा। पहले ही टेस्ट पेपर को ‘आउट-ऑफ़-सिलेबस’ और ‘नहीं पढ़ाया हुआ’ बता कर कुछ ‘हिम्मती जवान’ परीक्षा हॉल से निकल आये। और बाकी भी इसी ‘मृत-संजीवनी-सुरा’ के सहारे पीछे पीछे चल दिए।

आन्दोलन के क्रम में एक नया चेहरा सामने आया, भूतपूर्व छात्र अवस्थीजी उर्फ़ गुरूजी का। गुरूजी ने नपे तुले शब्दों में कहा कि डायरेक्टर की मनमानी से छात्रों का जीवन खतरे में पड़ चुका है। इसलिए यह लड़ाई ज़ारी रखने की ज़रूरत है और इस क्रान्ति में वह पूरा सहयोग करने को उत्सुक है। छात्र चाहें तो उनके घर में बैठक कर सकते हैं, ठहर सकते हैं। वहां खाने-पीने की सब सुविधा है। गुरूजी का बंगला कैम्पस के पास ही था। क्रांतिकारियों को और क्या चाहिए था। अड्डा मिल गया। गुरूजी के बंगले पर दिन में खाने और शाम को दारु-चखना का बढ़िया इंतज़ाम रहता था। क्रान्ति के लिए यही तो रसद लगती है। यहाँ का सारा इंतज़ाम कोई कनौजिया जी देखते थे जो गुरूजी के पुराने चेले थे।

क्रांति आगे बढ़ी और बात मुख्य परीक्षा बायकाट पर आ टिकी। डायरेक्टर और डीन ने थर्ड-इयर वालों के हॉस्टल खाली करवाकर उनके इम्तिहान पोस्टपोन कर दिए ताकि क्रान्ति डिफ्यूज हो जाए। अब क्रांतिकारियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी थी। ऐसे समय में काम आये कनौजिया जी, जो पत्थर कॉलेज के पुरातन छात्र थे, छात्र-नेता थे और ‘कट्टा कनौजिया’ के नाम से विख्यात थे। कोर-कमिटी तो गुरूजी के बंगले में स्थापित थी। कनौजिया जी ने बाकियों को पत्थर कॉलेज के खाली पड़े हॉस्टल्स में स्थापित करवा दिया। कॉलेज के गेट पर डायरेक्टर और डीन की हिटलर-शाही के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ। छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। लेखकीय क्षमता वाले छात्रों ने प्रेस-विज्ञप्तियाँ लिखीं जो स्थानीय अख़बारों में ख़बर की तरह छपीं। समय चुनाव का था तो सांसद का चुनाव लड़ रहे एक उद्योगपति और उनके साथ प्रचार कर रही एक लुप्तप्राय अभिनेत्री ने भी धरना-स्थल पर आकर क्रांतिकारियों में दूना उत्साह भर दिया।

जैसे हर चुनौती में एक अवसर छिपा होता है, वैसे ही इस धरने में समय काटना एक चुनौती थी तो एक ‘अवसर’ भी। कुछ क्रांतिकारी मक्सिम गोर्की का ‘माई यूनिवर्सिटी’ और टॉलस्टॉय का ‘वॉर एंड पीस’ पढ़ रहे थे तो कुछ ‘लोलिता’ और ‘इन्द्रसभा’ को क्रान्ति के लिए मुफीद साहित्य मानते थे। कुछ ‘अवसरवादी तत्वों’ ने पाया कि शाम के बाद खाली पड़े केमिस्ट्री डिपार्टमेंट के लेक्चर थिएटर्स में ‘फिजिकल’ केमिस्ट्री से संबंधित ‘सत्य के साथ प्रयोग’ किए जा सकते हैं। कई प्रयोग सफल रहे तो कुछ प्रयोगों में ‘अवांछित रेडिकल्स’ ने बाधा भी पहुँचाई। ऐसी हर क्रांति के उर्वरक हैं ऐसे प्रयोग। यह क्रांति भी अपवाद नहीं थी।

क्रान्ति खूब जमी पर कोई ख़ास नतीजा निकलता नहीं दिख रहा था। गुरूजी ने बह्मास्त्र ही दागने की ठान ली; ‘‘मैं विधानसभा के सामने आत्मदाह करुँगा।” आत्मदाह की योजना में गुरूजी को अपनी पैन्ट के निचले हिस्से में थोड़ा केरोसीन डालकर आग लगाना था। बाकी केरोसीन पास खड़े क्रांतिकारियों को धक्का-मुक्की में गिरा देना था। जैकेट आदि डालकर आग तत्काल बुझा देने की योजना थी। योजनानुसार गुरूजी ने केरोसीन डाला, आग लगाई पर वो क्रांतिकारी जिसके जिम्मे केरोसीन गिराने का काम था, वह चुपके से निकल लिया। खैर, गुरूजी को ख़ास नुकसान नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था भी कर रखी थी। आग बुझा दी गयी।

अगले दिन शिक्षा विभाग के एक आला अधिकारी ने पुलिस कप्तान की उपस्थिति में डायरेक्टर और गुरूजी को अपने ऑफिस में बुलाकर हड़काते हुए कहा; “आपलोग मामला बातचीत से सुलझाइए। और तुम अवस्थी, क्यों नए लड़कों को भी अपनी राह पर ले जा रहे हो? वापस जाओ और मुझे रिपोर्ट मिलनी चाहिए कि हड़ताल ख़त्म हो गयी है।” गुरूजी वापस आये। डायरेक्टर के साथ उनकी बैठक हुई। जाते समय उन्होंने क्रांतिकारियों से कहा कि तुम्हारी एक एक माँग पूरी करवाकर ही आऊँगा। वही हुआ। हॉस्टल के मेस के ठेकेदार बदल गए। डीन ने कैफेटेरिया का ठेकेदार भी बदल दिया और कैफेटेरिया को देर शाम तक खोले रखने का आदेश भी हुआ। हर हॉस्टल में छोटी ‘ईटरीज़’ खोलने पर भी सहमति बनी।

छात्र-एकता ज़िन्दाबाद के नारे के बीच हड़ताल ख़त्म हुई। बाद में पता चला कि हॉस्टल मेस और नयी ईटरीज़ के नए ठेकेदार कोई और नहीं बल्कि गुरूजी के चेले कट्टा कनौजिया हैं और नयी बिल्डिंग्स बन, स्क्रैप उठाने आदि के कई ठेके गुरूजी की फर्म के नाम हो गए हैं। क्रान्ति समाप्त हो गयी, क्रान्ति का उद्देश्य पूरा हो गया था। ऐसे भी कयास स्वाभाविक थे कि क्रांति के पीछे भागते लौंडे भ्रांति का पीछा कर रहे थे। लेकिन तब से किसी छात्र को पीलिया होने की खबर नहीं आई, आए तो फिर हो एक क्रांति।

लेखक: @Cawnporiaah एवं @rranjan501

दावात्याग: इस कहानी का राजनीतिक कालखंड स्पष्ट है लेकिन घटनाएं कपोल कल्पित हैं और पात्र काल्पनिक। पात्रों का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से किसी तरह का कोई मेल महज संयोग होगा। यह कथा पहले lopak.in पर प्रकाशित हुई थी।

रेखाचित्र सौजन्य: Google (timesofindia.indiatimes.com)

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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