मंडली

दूसरी शहादत

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राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में गाँव प्रायः शांत स्वभाव के होते हैं। मुझ जैसे शहरी जीव शांति की खोज में अक्सर इन गाँवों में विचरते पाए जा सकते हैं।

बात पिछले महीने की है। मैं गाँव गया तो पता चला कि मोहल्ले के गऊदीन काका का बेटा रमेश जो आर्मी में जवान था, शहीद हो गया। रमेश बचपन का मित्र था तो जाना आवश्यक था। मैं उनके घर पहुँचा और काका के पास बाहर चारपाई पर बैठ गया। हाल-चाल पूछते, ढाढ़स बँधाते कोई आधा घण्टा गुजरा होगा कि तपती गर्मी में धूल उड़ाती एक वैन सड़क पर करीब आती दिखी। वैन के करीब आने पर धूल का गुबार उड़ना कुछ कम हुआ तो गाड़ी के एक तरफ बड़े पीले रंग में ‘Q’ लिखा दिखाई पड़ा।

काका के घर के बाहर बैठे सब कयास लगा रहे थे कि गाड़ी मौसम विभाग की है या पर्यावरण संरक्षण वालों की। तभी गाड़ी घर के पास आते आते धीमी होती गई। अंततः गाड़ी गऊ काका के घर के सामने आ कर रुक गई।

गाड़ी में से सबसे पहले एक महिला उतरीं। राजस्थान की सड़ी गर्मी में एक हाथ में नोटबुक थामे वह हमारी तरफ लम्बे लम्बे कदम धरते हुए आ रही थीं। उस महिला ने मेहरून टीशर्ट के ऊपर काली जैकेट पहनी थी। मतलब कपड़े इतने मोटे थे कि एक अच्छे-खासे इंसान को उन कपड़ों को देख पसीना छूट जाए। खैर, हमारी चारपाई के पास आ कर उन्होंने पूछा, “तुम में से रमेश का पिता कौन है?”

बुजुर्गों ने गऊ काका को आगे कर दिया। उस महिला पत्रकार ने गऊ काका को अजीब दृष्टि से देखा और फिर कहने लगीं, “हम एक बहुत बड़े मीडिया चैनल से आए हैं। रमेश के बचपन के बारे में बताइए।”

गऊ काका गर्व से फूले न समाते हुए रमेश के बचपन की एक-एक बात कहने लगे। मैं भी उनकी बातें सुन अपने बचपन की याद में खो गया। बचपन मे हम 8-9 लड़के सुबह-सुबह दो खेल खेला करते थे – कबड्डी या लट्ठबाजी। दो से तीन घण्टे खेलकूद कर गाय-भैंसों की सानी में लग जाते। मैं यही सब बातें याद कर मन ही मन मुस्कुरा रहा था। तभी महोदया पुनः बोल पड़ीं।

“रमेश की बचपन या आर्मी में जाने से पहले की कोई फ़ोटो है आपके पास?”

इस प्रश्न को रमेश के घरवालों ने आदेश की तरह लिया। शहीद की बहन को तस्वीर ढूँढने के काम पर लगाया गया। वह 10-15 मिनट बाद एक मुड़ी और पीली सी तस्वीर हाथ में लिए लौटी। मीडिया मंडली ने तस्वीर को क्षण भर के लिए निहारा। उनके मुखारविंद पर मानो एक आभा का आगमन हुआ, मुख से ‘परफेक्ट’ शब्द प्रस्फुटित हुआ। तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर वे लोग चलते बने।

खाँटी दूध में पकी उनकी तीन कप चाय वहीं स्टूल पर रखी रह गई। शायद वे ‘डिप’ चाय के शौकीन थे। वैन धूल उड़ाती गाँव से निकलने वाली ऊँची सड़क पर चल पड़ी। वैन के एक तरफ अंग्रेजी अक्षर ‘Q’ अब भी सूरज की रोशनी से दमक रहा था। रमेश की अम्मा दो कमरे के मकान की दहलीज पर बैठ पुनः आँसू बहाने लगी थीं।

मैं घर लौट आया। दोपहर की नींद पूरी करके मैंने शाम को फोन उठाया तो नोटिफिकेशन बार मे एक खबर सबसे ऊपर थी। खबर का शीर्षक था :

“कैसे एक गौरक्षक जवान बना कश्मीर के गणित अध्यापक के बेटे के लिए यमराज”

आर्टिकल में जवान की फ़ोटो थी। फोटो में रमेश दाँत दिखाता एक हाथ से लाठी और दूसरे हाथ से उसकी प्रिय रही गाय ‘गौरा’ का कान पकड़े खड़ा था।

रमेश को दोबारा शहीद हुआ मान मैंने फोन बंद कर दिया और बाहर लट्ठबाजी कर रहे लड़कों को देखने चला गया। बाहर ही चारपाई पर बैठ एक लेख लिखने लगा। मैं ठान चुका था कि लोग भी तो जानें यह निकृष्टता। मैंने लिखना शुरू किया …

“राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में गाँव प्रायः शांत …”

मंडली का सबसे युवा सदस्य होने के नाते लेखक को मंडली का प्रशिक्षु लेखक कहा जा सकता है। वह अपने छोटे अनुभव को अवलोकन के धागे में पिरोकर कहानियाँ और संस्मरण लिखते हैं। राजनीति में संघ से जुड़े मामलों से उनका गहरा अनुराग है। लेखक सूचना प्रौद्योगिकी अभियांत्रिकी के छात्र हैं और साथ ही वह मंडली के तकनीकी मामले भी देखते हैं।

11 thoughts on “दूसरी शहादत

  1. लिखते रहिए, ज़रूरी है।
    इस तरह का लेखन आज की आवश्यकता है।

    1. आपके शब्द मेरे लिए प्रेरणास्त्रोत हैं, धन्यवाद श्रीमान सर।

    1. धन्यवाद। बिलकुल सत्य कहा आपने।

  2. क्या बात है सूर्यांश , बहुत बढ़िया और गंभीर लेखन

    1. धन्यवाद फिक्शन भैया, प्रोत्साहन करते रहें।

  3. इसको पढ़ने के बाद ये kc अवस्था ह ना दुख ना सुख , चिड़चिड़ाहट ह दुख में भीगी हुई , अपनो की उपेक्षा आतंकियो की फिक्र so परिणाम चिड़ने योग्य है।

    आपकी कहानी पर लेख लिखा जा सकता ह
    अच्छा लिखा आपने

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