मंडली

दुर्गेश्वर रायगड़

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सूर्य मध्याह्न पर था, तपती धूप अपने चरम पर। पता नहीं कितनी सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद आखिरकार मेरी आँखों के सामने ऐतिहासिक दस्तावेज समान काले पत्थरों के खंडहर खड़े थे। गंतव्य तक पहुँचते ही पसीने से लथपथ मैं एक सीढ़ी पर बैठ गया। मैंने बैकपैक से पानी का बोतल निकाला और पाया कि इस दुर्गम दुर्ग को चढ़ते हुए मैं सब पानी पी चुका था। पानी की तलाश में मैंने यहाँ वहाँ नजरें दौड़ाई लेकिन आसपास कोई भी नहीं था।

मैंने सीढ़ियों से दूर दूर तक फैले पहाड़ और सूखे जंगल देखते हुए कुछ समय बिताया। अब प्यास अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। तभी सफेद शर्ट और काली हाफपैन्ट में एक बच्चा वहाँ से गुजरा। मैंने उसे इशारे से बताया कि मुझे प्यास लगी है। वो बोला, “मेरे साथ चलिए।” मैंने चिढ़ कर मुँह बनाया। मैं बिना पानी अब एक कदम भी बढ़ने को तैयार नहीं था। यह देख कर बच्चे ने कटाक्ष-बाण छोड़ते हुए कहा, “हिंदवी स्वराज्य का स्वप्न लिए लाखों इस तपती रणभूमि में समा गए। आप अपने स्वार्थ के खातिर कुछ कदम नहीं बढ़ा सकते?” यह बोल कर बच्चे ने सीधे मेरे अहम पर चोट पहुँचाई थी। मैं उठ खड़ा हुआ और उसके साथ आगे बढ़ा।

मैंने उससे पूछा, “तुम इतनी धूप में यहाँ क्या कर रहे हो?” उत्तर मिला, “स्कूल तलहटी में है और घर यहाँ गढ़ पर।” थोड़ी ही दूरी पर उसकी झोंपड़ी थी। वहाँ उसके माता-पिता आने वाले प्रवासियों के लिए छोटा सा पिठल-भाकर (बेसन की सब्जी और रोटी) का व्यवसाय चलाते थे। पानी पीते हुए मैंने बच्चे से पूछा कि यहाँ के दर्शनीय स्थल क्या क्या हैं? उसके चेहरे पर वही धारदार कटाक्षमय मुस्कान छा गई।

“साहब, यहाँ बस खंडहर हैं और कुछ देखने लायक नहीं। सन 1818 में ब्रिटिश सत्ता की कुदृष्टि से इस दुर्ग का वैभव जाता रहा। अब आप क्या देखेंगे? उधर देखिए हिरकणी बुर्ज, जहाँ से एक माता ने अपनी संतान के लिए इस अभेद्य दुर्ग से छलांग लगाई। वो देखिए जगदीश्वर मंदिर, छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रिय देवस्थान और जगदीश्वर मंदिर के पीछे महाराज की समाधि।”

मैंने उत्सुकतावश पूछा, “और महाराज का दरबार कहाँ है?” उसने मेरी उंगली पकड़ ली और हम आगे बढ़े। किले की हालत सच में बहुत खराब थी। बाजार और होली मैदान के पश्चात हमारे सामने आया नगारखाने का भव्य दरवाजा। वह दरवाजा पार करते ही हमारे सामने था एक मैदान और मैदान के दूसरे छोर पर वीरासन में बैठे श्रीमान योगी छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा। हम दरबार में पहुँचे, वही दरबार जहाँ 6 जून, 1674 को काशी के प्रकांड विद्वान वेदमूर्ति गागाभट्ट ने वेद मंत्रों से छत्रपति शिवाजी महाराज का अभिषेक किया था।

सैंकड़ों वर्षों की पराधीनता के बाद किसी वीर हिंदू ने सभी म्लेच्छ सल्तनतों को शिकस्त देकर अपने क्षात्र तेज से स्वयं को छत्रपति के पद पर आसीन किया था। छत्रपति की प्रतिमा के तेज के सामने दोपहर का तपता सूर्य मन्द पड़ रहा था। मैं महाराज की प्रतिमा के सामने नतमस्तक हुआ। अनायास ही मेरी आँखों से अश्रु धारा बहने लगी।

कभी इसी जगह पर रामजी दत्तो द्वारा निर्मित शास्त्र सिद्ध अष्टकोणीय सिंहासन पर महाराज का राज्याभिषेक हुआ होगा। इस सिंहासन के हर कोण पर स्तंभ लिए खड़े आठ दैदीप्यमान सुवर्ण सिंह, सिंहासन की सीढ़ियों पर वृषभ, मार्जार, तरह, सिंह, व्याघ्र जैसे प्राणी, वृक्ष-बेली-फल-फूल और मत्स्यकूर्मादी जलचर उकेरे गए थे। इसका निर्माण क्षीर, वट,औदुम्बर जैसे पवित्र वृक्षों के काष्ठ से किया गया था। रत्नखचित बत्तीस मणि सुवर्ण से इसे जड़ा गया था। महाराज कहते थे कि इस सिंहासन पर जड़ें रत्न सिर्फ चमकदार टूकडे नहीं, यह मेरे तानाजी, सूर्याजी, बाजीप्रभु, मुरारजी, प्रताप राव, पान्गेरे जैसे रत्नों ने हिंदवी स्वराज्य के लिए दिए बलिदान का प्रतीक हैं। शिवाजी महाराज की कमर पर बँधी तलवार मिर्ज़ाराजा जयसिंह ने महाराज को तोहफे में देते हुए कहा था कि यह तलवार नहीं, मेरी ओर से यश और कीर्ति का आशीर्वाद है।

राज्याभिषेक से कईं दिन पूर्व तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। किले का मुख्य प्रवेश द्वार महादरवाजा अतिथियों के आगमन के लिए सजाया गया था। दरबार की एक ओर रानियों के आवास को जोड़ता मैना दरवाजा तो दूसरी तरफ महाराज के आवास और अन्य दफ्तरों तक ले जाता पालकी दरवाजा था। शिवाजी महाराज खुद सात्विक खिचड़ी खाते थे और रायगढ़ किले पर जीवहत्या निषेध होने की वजह से सभी ब्रिटिश और मुस्लिम अतिथियों के लिए तलहटी में भोजन पकाया जाता था।

यह दुर्ग शिवाजी महाराज की राजधानी थी। यहीं से हिंदवी स्वराज्य के अधीन 360+ दुर्गों के आदेश पत्र जारी किए जाते थे। यहीं भविष्य में लड़े जाने वाले युद्धों की रणनीति घड़ी जाती।  आज इस किले की स्थिति इतनी दयनीय क्यों? सन 1818 ब्रिटिश सत्ता के सामने लडे गए तीन एंग्लो-मराठा महायुद्ध और हिंदवी स्वराज्य का अंतिम दौर। लोहगढ़, सिंहगढ़, विसापुर, कोरीगढ़ जैसे हिंदू रक्त से सींचे गए किले एक एक कर अंग्रेजों के आधिपत्य में चले गए।  23 अप्रैल 1818 तक लेफ्टिनेंट कर्नल प्रोथोर और मेज़र हाल की सेनाओं ने दुर्गेश्वर रायगड़ को घेर लिया लेकिन गढ़ को जमींदोज करने के लिए इतनी सेना पर्याप्त नहीं थी। मुंबई से और 6 कंपनियों को भेजा गया। रायगड़ दुर्ग पर पेशवा की धर्मपत्नी वाराणसीबाई के आगे स-सम्मान शरणागत होने का प्रस्ताव रखा गया लेकिन वाराणसीबाई ने युद्ध का विकल्प चुना। गिने-चुने योद्धाओं ने अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया लेकिन पराभव अवश्यंभावी था।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने म्लेच्छों से लोहा लेते हुए स्थापित किया महान हिंदवी स्वराज्य, हजारों रक्तरंजित युद्धों के बाद प्राप्त हुआ हिंदवी स्वराज्य अपने अंतिम दुर्ग को गँवा चुका था। अंग्रेजों ने गोलाबारी कर गढ़ की तटबंदी को ध्वस्त किया और राजकीय आवासों में आग लगाई जिसकी ज्वालाएं हफ्ते भर तक शान्त नहीं हुईं। गढ़ की प्राचीर से भगवा ध्वज उतार कर यूनियन जैक चढ़ाया दिया गया।

दरबार में सिर्फ मैं अकेला खड़ा था। मैंने अश्रुपूरित नेत्रों से महाराज की प्रतिमा को देखते हुए पूछा, “श्रीमंत, इतने यत्नों से प्राप्त किए गए स्वराज्य की ऐसी दुर्गति क्यों?” महाराज बोले, “यह सतत चलने वाले अस्तित्व का युद्ध है। यह स्वराज्य और स्वाभिमान का युद्ध है। संस्कृति की रक्षा का संकल्प हो तो धैर्य और मनोबल से हम यह युद्ध हमेशा जीत सकते हैं।”

मैंने आगे पूछा, “श्रीमंत, इस स्वराज्य और स्वाभिमान के युद्ध में हम क्यों पराजित हुए?” महाराज बोले, “हर बार खतरा नया रूप धर कर आया, हर बार हमने जय और पराजय का सामना किया। हर बार हमारी सीमाएँ सिकुड़तीं चलीं गईं। कभी धर्मांध म्लेच्छों ने हमारे देवालयों को ध्वस्त कर दिया तो कभी लूटेरे, कुटिल साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति पर कुठाराघात किया। जाति और संप्रदायों में बँटे लोगों का पराभव निश्चित था। एकता की शक्ति को हमने कभी नहीं पहचाना।”

महाराज बोले, “आज भी हम अपने अस्तित्व और संस्कृति की रक्षा का अघोषित युद्ध लड रहे हैं। हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। फिर भी रक्तवर्ण-ध्वज लिए कुछ गिद्ध मौका तलाश रहे हैं लेकिन इस बार हम उन्हें अपने मनसूबों में कामयाब नही होने देंगे।”

मेरा मन क्रोध से भर गया। श्रीमंत मुस्कुराते हुए बोले, “युद्ध क्रोध से नहीं रणनीति से जीते जाते हैं। इस युद्ध को रक्तपात से नहीं जीता जा सकता। हमारा अडिग मनोबल ही हमारा शस्त्र है। इस राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का विश्वास लेकर और सभी को साथ रखते हुए हमारी संस्कृति पर घात लगाए बैठी इन विदेशी शक्तियों का प्रतिकार करना है। निश्चित जय हमारी होगी।”

मैंने वापसी के लिए कदम बढ़ाया। जगदीश्वर मंदिर से कवि भूषण शिवाजी महाराज का जयघोष करते हुए ऊँचे स्वर में गा रहे थे।

इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर,

रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।

पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,

ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,

भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,

त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥

अगले सूर्योदय के लिए आज सूर्यास्त होना आवश्यक है। कल का सूर्योदय हम सभी साथ देखेंगे।

आवरण चित्र सौजन्य: Google

 

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है। लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।

8 thoughts on “दुर्गेश्वर रायगड़

  1. अद्भुत लेखन! एकदम जीवंत कर दिया शिवाजी के राज्याभिषेक को! शिवाजी से संवाद….शब्द ही नहीं है उसकी प्रशंसा के लिए!

  2. शब्द चित्र में लीन छत्रपति शिवाजी के युग में ले गए ये ब्लॉग ।आप की लेखनी धन्य है। मै प्रणाम करता हूं।

  3. ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उस सदी में पहुंच गया।

  4. नमन, महादेव से प्रार्थना आप ऐसे ही लिखते रहें

    1. घटनाओं को जीवंत कर आंखों के सामने ला दिया एक दम से

  5. आपका लेखन बहुत प्रभावशाली है …बहुत प्रशंसनीय 👏👏👏🙏💐

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