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हेलो इंडिया! मैं एक डॉक्टर बोल रहा हूँ …

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हम डॉक्टर्स संभवत: समाज में सबसे कम संवाद करने वालों में से हैं। शायद हम अपने पेशे की आवश्यकताओं के अनुरूप थोड़े अन्तर्मुखी हो जाते हैं और कुछ हद तक हमारा मेडिकल एथिक्स भी हमें अत्यधिक संवाद करने से रोकता है। कोरोना काल में मेरा आपसे यूँ रुबरू होना अटपटा लग सकता है लेकिन कोरोना के बहाने मैं कुछ कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा। यह मत समझिए कि मैंने ऐसा वैश्विक महामारी जनित हताशा या निराशा में किया है। कोरोना के विरुद्ध युद्ध में हम डॉक्टर्स का हौंसला अपराजेय है। हम सरकारों, प्रशासकों, सेवा कर्मियों, नागरिक संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और मीडिया से ऐसे ही स्पिरिट की अपेक्षा करते हैं। हम विशेष रुप से आम लोगों से आस की अलख जगाए रखने की अपील करते हैं। हर रात की एक सुबह होती है। कोरोना की कालिमा कम ही नहीं होगी बल्कि पूरी तरह छँटेगी।

हममें से अधिकांश ने यह पेशा संभवत: मानव सेवा के पहलुओं के कारण ही चुना है। कुछ लोग अपनी रूचि अलग होने के बावजूद अपने माता-पिता की इच्छा के कारण भी इस ‘नोबल प्रोफेशन’ में आए होंगे। इस बात की भी संभावना है कि कुछ लोग सिर्फ पैसे और प्रसिद्धि के लिए ही डॉक्टर बने होंगे। लेकिन इन तीनों वर्गों ने डॉक्टर बनने के लिए लगन के साथ अथक परिश्रम किया होगा। उसके बाद ये तीनों फिजिशियन, सर्जन या कोई अन्य विशेषज्ञ बनकर मानव मात्र की सेवा करते हैं।

पैसा और प्रसिद्धि की चाहत किसी भी पेशेवर में होती है। डॉक्टर भी पेशेवर हैं। उन्हें भी अपनी घर गृहस्थी चलानी होती है। इसलिए वे सरकार या निजी अस्पताल प्रबंधन से वेतन लेते हैं या रोगियों से शुल्क लेकिन विश्वास कीजिए कि इससे सिर्फ उनकी जीविका चलती है। उन्हें पुरस्कार तब मिलता है जब एक रोगी स्वस्थ होता है और वह एवं उसके परिजन खिले चेहरों के साथ दिखते हैं। लोग अति उत्साह में हमें भगवान कहने लगते हैं तो हम भगवान से उन्हें क्षमा कर देने की प्रार्थना करते हैं क्योंकि रोगियों का उपचार करते हुए हमारा ध्येय वाक्य होता है – I treat He cures

हम पर यह आरोप लगते हैं कि हम अनावश्यक जाँच करवा कर पैसे बनाते हैं और लोगों को आर्थिक संकट में डालते हैं। हमारा पूरा समुदाय इस आरोप पर या तो चुप रहता है या फिर सुरक्षात्मक। हम कब लोगों को यह समझा पाएंगे कि चिकित्सा में जाँच का योगदान कितना अहम है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि एक ही जाँच रिपोर्ट पर दो डॉक्टर्स की व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। एक ही लक्षण के दो रोगियों पर दो डॉक्टर्स के दो मत हो सकते हैं। इसलिए किस रोगी की क्या जाँच करायी जाए, इसका उचित निर्णय उसका उपचार कर रहे डॉक्टर को ही करना होता है। आम तौर पर डॉक्टर यह नहीं चाहते कि रोगी पर अनावश्यक आर्थिक भार पड़े। यदि कुछ लोग सिर्फ पैसों के लिए जाँच और दवाईयाँ लिखते हैं तो भी इसके लिए पूरा समुदाय को कठघड़े में खड़ा नहीं किया जा सकता। यह भी मत भूलिए कि कमोबेश समाज के पेशेवर भी वैसे ही होते हैं जैसा समाज हो।

कई बार हमें तथाकथित चिकित्सकीय लापरवाही के लिए कोसा जाता है। हमारा समुदाय मानता है कि चिकित्सकीय लापरवाही अक्षम्य है लेकिन इस बात का संज्ञान भी रखना होगा कि डॉक्टर भी मानवीय भूल कर सकते हैं। हम डॉक्टर्स मुर्दे में भी प्राण फूँक देने की अति अपेक्षा से भी जूझते हैं। हम इसका दबाव सहते हैं क्योंकि ये वही लोग हैं जो हमें भगवान का रुप बताते हुए हमारा महिमामंडन करते हैं।

हम समाज के प्रति आभारी हैं कि हमें समाज में एक सम्मानित स्थान दिया जाता है। हमारी तरह हर पेशेवर समाज के लिए उपयोगी है और समाज भी लगभग सबको यथेष्ट सम्मान देता है। एक पेशा शायद अपवाद है और वे हैं हमारे शिक्षक। हमें डॉक्टर और अन्य पेशे के लोगों को वैसा बनाने वाले हमारे शिक्षक शायद ही सामाजिक स्तर पर वो सम्मान पाते हैं जिसके वे अधिकारी हैं। हमारा निवेदन है कि सामाजिक सम्मान का हम डॉक्टर्स का कोटा ही कम करके हमारे शिक्षक विरादरी को वह सम्मान दिया जाए जिसके वे अधिकारी हैं।

मैं कोरोना पर बात करने आया था किन्तु बोलने कुछ और ही लगा। दस्तूर नहीं था पर मौका देखकर थोड़ा-बहुत कह गया और आप सह भी गये। कोरोना के विरूद्ध विश्वव्यापी युद्ध चल रहा है। भारत भी अपने हिस्से की लड़ाई पूरे दम-खम से लड़ रहा है। इस लड़ाई में हम डॉक्टर्स लगभग वैसे ही हैं जैसे युद्ध काल में हमारी सेना होती है। देश हमारा विश्वास करे कि अपने वीर सैनिकों की भाँति हम भी पीठ नहीं दिखाएंगे और कोरोना पर देश को विजय दिलाएंगे। हमारे सपोर्ट स्टाफ और अस्पतालों एवं नगर प्रशासन के सफाईकर्मी हमारे अनसंग हीरो हैं। लोग हमें सल्यूट करते हैं, हम इन अनसंग हीरोज को।

पूरे देश में लॉक़डाउन है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग अपने स्वास्थ्य की कीमत पर लॉकडाउन भंग कर रहे हैं। अपना रोग छिपा रहे हैं। उन्हें खोजने में पुलिस-प्रशासन को मशक्क्त करनी पड़ रही है। मेडिकल और पुलिस टीम पर हमले हो रहे हैं। चिकित्सा के लिए आए रोगी सेवाकर्मियों से दुर्व्यवहार कर रहे हैं। इससे कई बार हमारा विश्वास भी डगमगाने लगता है लेकिन हम हार नहीं मानते। अस्पताल के डॉक्टर्स और अन्य सेवा कर्मी रोगियों के साथ कोई भेद नहीं करते। सीमित संसाधनों के बीच उन्हें आरोग्य देने के लिए हम जी-जान से जुटे हैं।

कोरोना काल की हमारी दिनचर्या आम लोगों को डरा देगी। हमारे लिए भी यह स्थिति अभूतपूर्व है। काम पर आने का नियत समय है, जाने का नहीं। हॉस्पिटल में मास्क, कैप, ग्लव्स और अप्रेन तो पहनना ही है और यदि अस्पताल में कोरोना संदिग्ध या कोरोना पीड़ित हो तो पी पी ई भी जो शरीर पर पूरी पृथ्वी के भार जैसा लगता है। साफ-सफाई, नहाने और खाने का कड़ा प्रोटोकॉल है। हाथ तो आप भी धो रहे हैं, इसलिए आपको पता है लेकिन हमारे लिए रोज़ रात में कपड़े साबुन से धोना, शैंपू कर के नहाना, गरारे करना और गर्म चाय पीना प्रोटोकॉल है। हम ये सब करते हैं, बस खाना ठीक से नहीं खा पाते। कई बार ढंग का मिलता नहीं और अधिकांश तनाव, थकान और अनिद्रा के कारण भूख ठीक से नहीं लगती। आज डॉक्टर्स अपनी रुटीन दवाएँ भले ही भूल जाएं पर Prophylactic खाना नहीं भूलते। संसाधनों की कमी से हमारा दो-चार होना देश देख ही रहा है। हम सामाजिक विमर्श में स्वास्थ्य की प्राथमिकता पुर्नपरिभाषित करने का आह्वान करते हैं।

कुछ डॉक्टर्स और अस्पतालों ने कोरोना संदिग्ध का इलाज करने से इनकार किया। यह सर्वथा निन्दनीय है और हमारे मेडिकल एथिक्स के प्रतिकूल है। कुछ जगहों पर मकान मालिकों द्वारा कोरोना संक्रमण के डर से डॉक्टर्स को घर छोड़ने को कहने और दिल्ली में सफदरजंग की दो युवा डॉक्टर्स को भरे बाजार में कोरोना का संवाहक कहकर प्रताड़ित करने की दुर्भाग्यूर्ण घटनाओं को छोड़ कर देश हमें बहुत सम्मान दे रहा हैं। लोगों ने हमारे सम्मान में ताली-थाली बजाया, ढ़ोल पीटा और शंख तक फूँका। हम अभिभूत हो गये। करबद्ध होकर नम आँखों से आज हमें यह कहने दीजिए कि जब देश की सर्वश्रेष्ठ सेवा करने वाली हमारी सशस्त्र सेनाओं ने हम पर और हमारे अस्पतालों पर पुष्प वर्षा की तो हम आह्लादित नहीं हुए, विह्वल हो गये। उस सम्मान के लिए धन्यवाद ज्ञापन के शब्द ढ़ूँढ़ना बहुत कठिन कार्य है।

आप पर स्वयं के एवं आपके परिवार के संक्रमण का खतरा है। वह खतरा हम पर हर क्षण कई गुना अधिक है। कई बार हम 1-2 दिन घर नहीं जाते। हम जब घर जाते हैं तो एक अपराध बोध से ग्रस्त हो जाते हैं कि अनजाने ही सही, कहीं हम अपने अपनों को अपने पेशे की सजा न दे बैठें। अपनों के स्पर्श से जान-बूझकर बचना कारूणिक होता है। आम जन के लिए हमारी इस मानसिक स्थिति को समझना बेहद मुश्किल है। तुर्रा यह है कि ऐसे आदेश भी सुनने को मिले हैं कि हमारे संक्रमित हो जाने पर प्रोटकॉल के उल्लंघन पर स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी भी हमारी है।

इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हम कर्तव्य-पथ पर अडिग हैं। आखिर क्यों? आपको और देश को आरोग्य देने के लिए क्योंकि हम हर वाद से परे जिजीविषावाद के पहरूआ है। इस युद्ध में धीरे-धीरे हम भी शारीरिक रूप से थक रहे हैं पर हौंसले बुलन्द हैं। हमें भी विश्राम की आवश्यकता है। हमें विश्राम देने के लिए आप घरों में रहें। आपको स्वस्थ रखने के लिए बाहर हम एक पैर पर डटे हुए हैं। हमें निराश मत कीजिएगा।

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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