मंडली

दो घर

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साँझ ढ़लते ही जैसे ही समय रात्रि की चादर ओढ़ता है, दो घर कभी बेचैन तो कभी प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी बातें चाँदनी रात में सुंदर और कल्पनाशील होती हैं, तो अंधेरी रात में भूत का पश्चाताप और भविष्य की चिंताएँ लिए होती हैं। कभी दोनों आपस में मित्र सा व्यवहार करते हैं तो कभी देवरानी-जेठानी सी जलन सुलगती है, सास सा घमंड भी है। इसमें प्रेम का एक भाव भी दिखता है। ‘सदा दिन रहत ना एक समान’ की तर्ज पर शुरू करते हैं इन दो घरों की कहानी। नीम के पेड़ के बँटवारे से सामान दूरी पर एक दूसरे के ओर मुँह कर दो घर लगभग साठ वर्षों से खड़े हैं। बीतते दशकों के साथ लोग आते-जाते व बदलते रहे पर घर और उनके भाव लगभग समान रहे।

सन 1960 की एक मध्यरात्रि का समय …

राजनिवास : सब सो गए? बड़ा समय लगा दिया!

लालकोठी : हाँ, बस कुछ देर पहले ही। आपके पास तो बस दो लोगों का भार है। मेरे अंदर चार परिवार रहते हैं, इसलिए समय तो लगेगा ही।

राजनिवास: अब तुम एकदम कोठी सा व्यवहार करने लगी हो। यह रंग तुम पर जँचता है।

लालकोठी: और मेरे सामने आपका रंग कैसे फीका हो गया है। आपको बुरा लगता होगा कि आपमें ईंटे लगी हैं, तब भी कच्चे कहे जाते हैं। मैं मिट्टी से जुड़ी हूँ, फ़िर भी पक्की कोठी हूँ। सच बताइए, जलन होती है?

राजनिवास: यकीन भले ना करो पर सत्य यही है कि बुरा नहीं लगता। कुछ समय पहले तक तुम्हारे नाम पर एक कच्ची दीवार पर छप्पर पड़ा था। तब मैं एक बीघे में बना मकान था। आसपास के सभी गाँव मे सबसे सुंदर रहा हूँ। अब यह जान लिया है कि सुंदरता सदैव नहीं टिकती और दिन भी बहुरते हैं।

लालकोठी: अब तो आप समझ गए होंगे कि अब मेरे दिन रहने वाले हैं।

राजनिवास: भूलो मत, मेरे मालिक आज भी ज़मींदार हैं।

लालकोठी: तो क्या? आपके घर में सिर्फ़ दो जन रहते हैं। कोई डाका डालकर आपको क्षत-विक्षत कर दे तो भी वे बचा नहीं पाएंगे। मेरे घर में चार दृढ़ लाठियाँ है।

60 के दशक के अंत में राजनिवास में 2 पुत्र जन्म लेते हैं और उधर लालकोठी में हर परिवार में दो पुत्र जन्म लेते हैं।

1970 के दशक का ब्रह्म मुहूर्त …

राजनिवास: तुम्हारी चोट अब कैसी है?

लालकोठी: छत के कोने में गोली लगे हुए कई दिन हो गए हैं। बड़े मालिक जल्दी ही मरम्मत करवा देंगे। मेरी खूबसूरती में दाग अच्छा भी तो नहीं लगेगा।

राजनिवास: मुझे तुम्हारा चोटिल होना बहुत खल रहा है। जाने आने वाली पीढ़ी तुम्हारा ख़याल कैसे रखेगी।

लालकोठी: पता नहीं ये आपके वक़्त तक रहेंगे भी या नहीं। मिट्टी के बने हो आने वाली बरसात में मोम की तरह पिघल मत जाना।

राजनिवास: मुझे कुछ होगा भी तो तुम्हें क्या फर्क पड़ेगा। फिर भी तसल्ली के लिए बता दूँ कि पिघलते-पिघलते पिघल जाऊँगा पर टूट कर नहीं गिरूँगा।

इस दशक के अंत तक राजनिवास के जमींदार गुजर जाते हैं। बड़े बेटे का कम आयु में विवाह होता है और वह अलग घर बना लेता है। उधर लालकोठी में सभी परिवार एक घर में रहते हैं और मालिक गुजर चुके होते हैं।

सन 1980 – प्रदोष …

राजनिवास: सुना है तुम्हारे छोटे सरकार घर छोड़कर शहर बसने चले गए और बड़े मालिक के दोनों बेटे भी वहीं बसने की होड़ में हैं। मुझे तुम्हारी चिंता हो रही है।

लालकोठी: आपको मेरी चिंता क्यों होती है? जो जाता है वो वापस अपने घर नहीं आता है क्या? बड़े मालिक के बच्चे और छोटे सरकार के जाने पर भी मेरे लिए दो परिवार रहेंगे। वे मेरा ख़याल रखेंगे। आप अपना बताओ। सुना है कि छोटी बहू ने आकर कई कच्ची दीवारें तोड़कर माटी बराबर करवा दी है।

राजनिवास: मेरा क्या? मैं अब बूढ़ा हो रहा हूँ। मैं खत्म भी हो जाता हूँ तो भी तुम्हारी खूबसूरती क्यों कम हो? तुम अपने हठ के आगे मेरे प्रेम को कभी नहीं स्वीकारती। एक मालिक पागल है और दूसरा शराबी। बच्चे भी कैसे निकलेंगे, यह अभी नहीं पता चलेगा। आगे चलकर तुम्हारा ख़याल कौन रखेगा। तुमने देखा नहीं कैसे मालिक के गुजर जाने के बाद आज तक छत के कोने की मरम्मत नहीं हुई है। अब ये पागल कैसे रखेंगे तुम्हारा ख़याल?

लालकोठी: ये मत भूलिए कि यदि मेरे घरवाले पागल हैं, तो आपके ग़रीब।

सन 1990 की एक मध्यरात्रि …

लालकोठी: कितनी कोठरी बची हैं?

राजनिवास: बारिश बड़ी जोरदार थी, दो ही कोठरी बची हैं।

लालकोठी: आपके मालिक तो बाहर सोते हैं, औरत और बच्चे?

राजनिवास: छपरा के नीचे।

लालकोठी: डर लग रहा है?

राजनिवास: हिम्मत बहुत है, डर महसूस नहीं होता।

लालकोठी: इतनी ज़मीन है, बच्चों की पढ़ाई पर लगा सकते हैं, आप पर क्यों नहीं?

राजनिवास: क्योंकि बच्चे भविष्य हैं और मैं भूत। आगे चलकर शायद घर कहीं और बना लेंगे। ख़ैर, तुम्हें कैसा लग रहा है मेरे साथ बूढ़ा होकर?

लालकोठी: मैं और बूढ़ी? अक्ल ठीक है ना आपकी। वो तो तीसरे नम्बर के सरकार की बिटिया की शादी थी तो उन्होंने अपना हिस्सा पुताई करवा लिया। दीवाली आते ही पूरे घर की मरम्मत और पुताई होगी।

राजनिवास: और दीवारों पर जो काई लग रही है?

लालकोठी: इतनी चिंता है तो उसे अपनी माटी लेस कर सफेद कर दो।

राजनिवास: तुम्हें पता है तुम कितनी सुंदर हो? इधर मैं पिघल रहा हूँ और उधर तुम टूट रही हो।

सन 2000 की एक सुबह

राजनिवास: बहुत जोर से नींद आ रही होगी? सो जाओ, सब जागने वाले हैं।

लालकोठी: अब नींद आती ही कहाँ है। आपकी चिंता लगी रहती है। शुरुआत में मैं एक दीवार पर छपरा के साथ थी। अब धीरे-धीरे आपके पास भी उतना ही बच रहा है। मैंने कभी आपसे अच्छा व्यवहार नहीं किया पर आपके बग़ैर मेरी खूबसूरती भी कहाँ रहेगी।

राजनिवास: हा हा, तुम्हें पता है कल एक कम्बल बेचने वाला घर के सामने आया। छोटी बहू, बच्चों के साथ दरवाजे तक आयी। कम्बल पसन्द किया तो बेचने वाले ने कहा कि आपकी गरीबी को देखकर मैं आपको यह सस्ते में दे दूँगा। मालकिन बेचैन हुई। कम्बल वाले ने कहा कि इतने सुंदर कोठी के सामने आपका टूटा घर देखकर यही लगेगा ना। छोटी बहु बहुत संयमी और दूरदर्शी है, सिर्फ़ मुस्कुरा दी।

लालकोठी: आप भी कहानियों में मेरी तारीफ करते हैं। सुंदरता क्या है?

राजनिवास: सुंदरता उपमा है। मेरे सामने तुम सुंदर हो। कोई और तुमसे सुंदर होगा।

लालकोठी: सम्मान क्या है?

राजनिवास: प्रेम का मान रखना।

लालकोठी: तो फ़िर ख़याल रखिये अपनी आख़िरी दीवार का, गिर मत जाइयेगा।

राजनिवास: कमज़ोर क्यों समझती हो? देख लेना मैं गिराया जाऊँगा, गिरूँगा नहीं!

सन 2010 की एक रात्रि

लालकोठी: इतनी देर से आवाज़ दे रही हूँ, आप सुनते क्यों नहीं है? छोटी बहू के बेटे का तिलक कैसा गया?

राजनिवास: अर्रे, बहुत अच्छा गया। एक बात सुनकर बहुत हँसी आयी। वधु पक्ष से कुछ बच्चे आये थे जो तुम्हें देखकर बोले यह घर तो भूतखाना लगता है।

लालकोठी: आपको हँसी आयी? इसलिए कि छोटी बहू के बच्चों ने आपको एक नया और जवान रूप दिया है?

राजनिवास: नहीं। कैसी बातें करती हो? घर के अंदर से वो दो पागल झाँक रहे थे। एक जो हमेशा काले कपड़ों में रहता है। और दूसरा जो कभी दुमंजिले से नीचे नहीं उतरता, उन्हें देखकर हँसी आयी थी।

लालकोठी: वो पागल नहीं हैं, भले लोग हैं जो अब तक मुझे छोड़कर नहीं गए। खैर, मेरे बड़े मालिक के बच्चे भी आये थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा?

राजनिवास: हाँ। कुछ बातें हो रही थी मेरे बगल वाली ज़मीन में घर बनाने की। वह गाँव में ही बुढ़ापा काटना चाहते हैं।

लालकोठी: क्या? अलग बनाएंगे? मुझे इन दो पागलों के साथ छोड़ देंगे!

राजनिवास: उनका कहना है कि तुम में पैसा लगाना बहुत बड़ा काम हो जाएगा।

लालकोठी: फ़िर तुम पर सबने इतना पैसा क्यों लगाया? शहरी तरीके से क्यों बनवाया। तुम इतने सुंदर क्यों लगते हो?

राजनिवास: यहाँ मानसिकता का मतभेद है। तुममें चार हिस्से थे जिसे लोगों ने अपने अपने हिस्से के तरह इस्तेमाल किया। अपने हिस्से से प्रेम तो अन्य के हिस्से से ईर्ष्या की गयी। मुझे हमेशा एक घर माना गया। इसलिए भी कि मेरी एक ही लाठी थी और एक अगर सही हो तो पर्याप्त होती है।

लालकोठी: मुझे ऐसा अंत नहीं चाहिए था। तुम तो मुझे प्रेम करोगे ना? हर रात यूँ ही बातें किया करोगे?

राजनिवास: तुम्हें पता है प्रेम क्या है?

लालकोठी: क्या?

राजनिवास: तुम्हारा साथ, और बातें हमारे अस्तित्व के रहने तक होती रहेंगी।

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

2 thoughts on “दो घर

  1. दो इमारतों के बीच संवेदना प्रवाहित करके उनको जीवंत कर वार्तालाप के माध्यम से एक गहरा संदेश देने के अद्भुत प्रयोग के साथ-साथ लेखिका ने अनुपम कल्पना शक्ति का परिचय दिया है |😇🙏

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