मंडली

ढकलेट

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जिला स्कूल, छपरा के प्रांगण में ही स्थित छपरा शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के बीएड प्रशिक्षु अध्यापन अनुभव के लिए विद्यालय में कक्षाएँ लेते थे। नवीं कक्षा में प्रशिक्षु शिक्षक ब्रजेश सिंह पढ़ाने आये थे। छात्रों ने उन्हें थोड़ा ढीला पाकर गंभीरता से नहीं लिया। सिंह साहब का अहंकार जाग गया। उन्होंने छात्रों से प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया। भौतिकी पढ़ाने आए थे पर वह प्रश्न गणित से भी करने लगे। वह एक छात्र से प्रश्न तब तक पूछते जब तक वह उत्तर देने में हाथ खड़े न कर देता। कक्षा के बड़े-बड़े वीर-भूप खेत हो गये। तभी पीछे की बेंच पर बैठे एक दुबले, छोटे और साँवले छात्र पर सिंह साहब की नजर पड़ी। छात्र का नाम था रामाधार कुमार राय़। सिंह साहब ने उस पर भौतिकी का पहला गोला दागा। रामाधार ने उत्तर दे दिया। प्रश्नों का क्रम चलता रहा, उत्तर भी आते रहे। गणित के प्रश्नों पर भी रामाधार निरुत्तर नहीं हुआ। सिंह साहब खीझ गये। छात्र हँसने लगे। सिंह साहब भड़क गये। छात्रों ने विद्यालय की परम्परा के विरूद्ध उन्हें हूट आउट कर दिया।

हूटिंग का मामला स्कूल के सक्षम प्रिंसिपल शिव कुमार सिंह के पास गया। प्रशिक्षु शिक्षक ने अकारण ही रामाधार को मुख्य अभियुक्त बना दिया जबकि हूटिंग के लिए न उसने उकासाया और न ही उसमें योगदान किया। प्रिंसिपल साहब गणित शिक्षक महेन्द्र मिश्र के साथ हमारी कक्षा में आए। पूरी कक्षा में ‘पिन ड्रॉप साइलेंस’ था। महेन्द्र मिश्र की कड़कदार आवाज गूँजी, “यदि तुमलोगों को छैलचिकनिया और लफुआ ही बनना है तो जिला स्कूल में तुम्हारी जगह नहीं है …“ एक बोलतू छात्र कुछ कहने के लिए खड़ा ही हुआ था कि प्रिंसिपल साहब गरजे, “मुझे आदेशपाल लगनदेव सिंह ने सब बता दिया है। अनुशासन पर कोई समझौता नहीं हो सकता, शिक्षक हों या छात्र। प्रशिक्षु शिक्षक भी शिक्षक हैं, उनका अपमान स्वीकार्य नहीं।“ हमारी बहुत प्रताड़ना हुई। रामाधार की हथेली पर खजूर की चार छड़ी भी रसीद हुई। रामाधार ने अपना बचाव करने की कोशिश भी नहीं की।

मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। छात्रावास पहुँचने पर दबंग छात्रों ने उसे गरियाते हुए कहा, “सब इसके कारण हुआ है। ई बेसी तेज आ पढ़ुआ बनता है।“ मुँहदुबर रामाधार चुपचाप खड़ा था। एक छात्र ने उसे एक ठूँसा देते हुए कहा, “घठुआर जइसा सुन का रहे हो चुपचाप।“ तभी दसवीं कक्षा के छात्र और हॉस्टल प्रीफेक्ट अशोक भईया आ गये और रामाधीन की प्रताड़ना समाप्त हुई। मैंने हॉस्टल परिसर में ही अवस्थित अपने क्वार्टर में आकर बाबूजी को पूरी बात बता दी। उन्होंने मुझे रामाधार को बुलाकर लाने को कहा।

“रे रामाधारवा, तुमको कितनी बार बोले हैं कि तुम या तो बहुत बड़े आदमी बनोगे या समाज में ढकलेट होकर रह जाओगे। तुम मेरी दूसरी बात सिद्ध करने पर तुले रहते हो। मेधा का वरदान है तुम पर। ईमानदारी और भोलापन अपनी जगह है पर थोड़े व्यवहारिक भी बनो। तुमने अपने बचाव में प्रिंसिपल साहब से कुछ क्यों नहीं कहा? हॉस्टल की बात आकर मुझे क्यों नहीं बतायी? मैं तुम्हारा शिक्षक ही नहीं बल्कि छात्रावास अधीक्षक भी हूँ।”

“सर मेरी भी तो गलती थी हूटिंग में। और सर हॉस्टल वाले विषय में आप किसी को कुछ मत कहिएगा वरना वो लोग फिर …”

स्कूल के लगभग चौथाई छात्र ग्रामीण मेधा छात्रवृत्ति पाते थे। छात्रावास में रहने वाले 120 रुपया प्रति माह और शेष 30 से 60 रुपये प्रति माह। तीन महीने पर मिलने वाली छात्रवृत्ति के 360 रुपयों में से रामाधार 309 रुपये मेस वाले पंडित जी को देता। मेस में सिर्फ सुबह और शाम का खाना ही मिलता था। 15-20 रूपये का कॉपी-कलम आदि खरीदता। शेष बचे पैसे से वह मेरे साथ घोष मिष्ठान के रसगुल्ले खा लेता। अगले तीन महीने वह बिना पैसों के रहता। छपरा से 7-8 किमी दूर अपने घर वह पैदल ही जाता। जितनी बार घर से लौटता दुबारा न जाने की कसम खाता लेकिन एक-डेढ़ महीने पर कसम टूट जाती। उसके घर वाले उसकी पढ़ाई से खुश नहीं थे, ऐसा रामाधार कहता था। मुझे लगता था कि घर वाले उसकी अव्यवहारिकता और अत्यधिक ईमानदारी से नाराज रहते थे। हाँ, उसे घर से एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी। उसका संयुक्त परिवार खेतिहर था और उनकी आधा दर्जन से अधिक भैंसे थीं।

दसवीं में रामाधार सहित 15 लड़के स्कूल के अंग्रेजी शिक्षक के पास ट्यूशन पढ़ने गये। पहले दिन ट्यूशन में हम पहुँचे तो सोकर उठे सर की आँखें लाल थीं। उन्होंने अपने बेटे गुड्ड्न से नींबू-पानी लाने को कहा। पढ़ाई शुरु करने से पहले उन्होंने सारे छात्रों का नाम एक रजिस्टर में लिखा, मेरे नाम के सामने ‘स्टाफ वार्ड – नॉट टू पे’। अगले दिन उन्होंने छात्रों से एडवांस फी की माँग कर दी।

रामाधार ने धीरे से पूछा, “फीस कितना है सर?”

“अमीरों के लिए 40 रुपये प्रति माह और गरीबों के लिए 30 रुपये”

स्कूल के स्वयंभू रंगदार भेटरन भैया चुप न रह सके, “और सर दरिद्रों के लिए?”

सर क्रोधित होकर बोले, “तुम निकल जाओ यहाँ से। दरिद्रों को मैं नहीं पढ़ाता। कल सारे छात्र एडवांस जमा कर दें।“ पढ़ाई के बाद भगवान बाजार से छात्रावास आते हुए रामाधार ने कहा कि वह इतना पैसा नहीं दे पाएगा, इसलिए कल से पढ़ने नहीं जाएगा। छात्रावास में उसे शेष छात्रों ने डरा दिया कि यदि उसने लाडली शरण के यहाँ पढ़ कर पैसा नहीं दिया तो वह उसे नहीं छोड़ेंगे। शैलेन्द्र ने उसे रास्ता भी बता दिया, “तुम गरीब हो। दो दिन की पढ़ाई के दो रुपये हुए। देकर मामला साफ कर लो।“ अगले दिन रामाधार दो रूपये लेकर सर को ढ़ूँढ़ रहा था। सौभाग्य से मैं मिल गया और अनहोनी होते-होते टली। मेरे बाबूजी के माध्यम से पूरा घटनाक्रम लाडली शरण तक पहुँचा और रामाधार के बिना फीस ट्यूशन पढ़ने की व्यवस्था हो गयी।

दसवीं की बोर्ड परीक्षा आ गयी। रामाधार रोज शाम अपने चाचा से पिटता क्योंकि वह एक अक्षर भी नकल नहीं करता था और चाचा से यह झूठ भी नहीं बोलता था कि उसने नकल की। देखते-देखते दसवीं के परिणाम भी आ गये। जिला स्कूल के कुल 162 छात्रों में 151 प्रथम श्रेणी से पास हुए और 11 द्वितीय श्रेणी से। आधा दर्जन छात्रों को 75 प्रतिशत से अधिक अंक मिले, डेढ़ दर्जन को 70 प्रतिशत से अधिक। सबसे मेधावी या कम से कम टॉप-5 में एक छात्र रामाधार को सिर्फ 67 प्रतिशत अंक मिले लेकिन वह संतुष्ट था।

रामाधार ने ग्यारहवीं में नामांकन के लिए जगदम महाविद्यालय में फॉर्म भरा। पहली लिस्ट में उसका नाम नहीं था। मेरा नामांकन उसी महाविद्यालय में हुआ था। रामाधार बेहद दुखी था। एक दिन उसने कहा, “मैं चुप नहीं बैठूँगा।“ मुझे उसकी बात समझ नहीं आई। अगले दिन एक आदमी हमारे घर आया। उसने बाबूजी से कहा, “आपको प्रिंसिपल साहेब ने बुलाया है।“ बाबूजी जगदम कॉलेज के प्रिंसिपल सुशील कुमार सिंह का बहुत सम्मान करते थे। वह तुरन्त जगदम कॉलेज पहुँचे। प्रिंसिपल साहब के कमरे में रामाधार भी खड़ा था। उसने बाबूजी को प्रणाम किया और बाबूजी ने प्रिंसिपल साहब को। प्रिंसिपल साहब छूटते ही बोले, “आपके स्कूल का यह लड़का कह रहा है कि उसके अंक कम हैं लेकिन उसका नामांकन होना चाहिए। इसका दावा है कि इसने नकल नहीं किया।“ बाबूजी ने बिना झिझक कहा, “लड़का एकदम सच बोल रहा है।“ प्रिंसिपल साहब ने उसी क्षण रामाधार का नामांकन करने का आदेश दे दिया।

कॉलेज की पढ़ाई के लिए रामाधार ट्यूशन पढ़ाने लगा। वह लॉज में रहता था। जब पूछूँ तो कहता था कि दाल-भात-चोखा खाया है।  बारहवीं के बाद मेरा संपर्क रामाधार से टूट गया। बाबूजी भी रिटायर हो चुके थे। जीवन सरपट दौड़ रहा था। रामाधार हमारी विस्मृति में अंकित हो चुका था। यादों के आईने पर लगी विस्मृति की धूल 15 साल बाद साफ हुई। हुआ यूँ कि 2004 में बाबूजी हमारे एक रिश्तेदार से मिलने उनके स्कूल गये थे। वह एक मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे। विद्यालय में रामाधार दौड़ता हुआ आया और बाबूजी के पैर छूकर रोने लगा। बाबूजी भी बहुत खुश हुए। रामाधार ने मेरा हाल-चाल पूछा। बाबूजी ने रामाधार को बताया कि आजकल वह घर आया है। रामाधार रविवार को घर आने की बात कह कर अपनी कक्षा में चला गया।

बाबूजी ने हमारे रिश्तेदार को बताया कि रामाधार मेरा शिष्य है। हमारे रिश्तेदार ने बहुत फींकी सी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने उसे जातिसूचक संबोधन के साथ कोसना शुरु किया, “ई ढकलेट नाक में दम कर दिया है। रंगाई-पुताई और समारोह की मिठाई के पाई-पाई का हिसाब करता है। मेरे और अन्य शिक्षकों के विरूद्ध चिठ्ठी भेज देता है। दिन भर पढ़ाने से मन नहीं भरता तो सुबह-शाम बच्चों को बिना पैसा लिए घर पर पढ़ाता है।“ बाबूजी ने गुस्से में कहा, “तो? कुछ गलत भी तो नहीं कर रहा।“

रविवार की सुबह 30 किमी साइकिल चलाकर रामाधार मेरे घर आया। विह्वल हुआ रामाधार जब मुझसे मिला तो स्नेह, मित्रता, अपनत्व, भावना और करुणा जैसे शब्द बौने हो गये। रामाधार दिन भर रहा, खूब सारी बातें हुई। बदलाव का एक शेड भी नहीं दिखा उसके व्यक्तित्व में। वह शाम को चला गया। मैंने बाबूजी को उनकी भविष्यवाणी याद दिलायी, “तुम या तो बहुत बड़े आदमी बनोगे या ढ़कलेट बनकर रह जाओगे।“ बाबूजी ने गंभीरता से कहा, “समाज की स्थापित परिभाषा में उसके हेडमास्टर रामाधार को ढकलेट कह लें लेकिन उसने विद्यालय जैसा छोटा ही सही पर एक तंत्र कमोबेश ठीक कर दिया है। वह न छोटा आदमी है, न ढकलेट। हर व्यक्ति के सफलता और बड़प्पन के मानक अलग होते हैं।“

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

14 thoughts on “ढकलेट

  1. वाह! शानदार।
    बाबूजी ने गंभीरता से कहा, “हर व्यक्ति के सफलता और बड़प्पन के मानक अलग होते हैं।“

  2. It felt like I’m back to my roots in Jharkhand, reading some story from the books in my school. I’ve lost touch with all that. But your write brought it all back, the language, the names, the people, the feels. Thank you

  3. Felt good after reading about Ramadhar jee. I have spent some time of my early childhood in front of Saran Academy, but, spent my school days in schools of Motihari, Bettiah and Gopalgunj; some of them were in villages only. I can relate to Ramadhar jee.

  4. “उसने विद्यालय जैसा एक छोटा तंत्र ही सही कमोबेश ठीक कर दिया”. इस पंक्ति में आशा है …
    उसका चरित्र ठीक बना है, बस उसको काम करने का मौका जिस स्तर पर भी मिले उतना ही योगदान वह कर पाएगा. यह भी अपने आप में एक संतोषजनक स्थिति है.
    यह लेख भी सदा की तरह दिल को छू लेने वाली है

  5. डायरेक्टर साहब,
    छैलचिकनिया और लफुआ को हिंदी में छैला बाबू और लफंडर कहा जा सकता है ?
    प्रणाम!

    1. परनाम गुरू जी। बिल्कुल ठीक शब्द हैं।

  6. अनुकरणीय आदर्श से परिपूर्ण ये कहानियां मार्गदर्शन करती रहेंगी. घर के सबसे छोटे बच्चे क़ पढ़ने के लिए भेज रहा हूँ.
    बहुत अच्छी कहानी सर

  7. बहुत ही सुंदर सर…सहज किन्तु आंदोलित करने वाली भाषा लिखते हैं आप 🙏….

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