मंडली

दिल्ली से आइजॉल: भाग-3

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… गतांक से आगे
रास्ते में जेफरी ने अपने बारे में बताना आरम्भ कर दिया। उसके पिता ने मिजोरम पुलिस से स्वैच्छिक अवकाश लेकर उसकी जीविका के लिए गाड़ी खरीद दी। जेफरी के बड़े भाई आबकारी विभाग में काम करते हैं। उसकी बहन एम.कॉम. कर रही है और बैंक में नौकरी करना चाहती है। जेफरी ने बारहवीं तक पढ़ाई की है और उसने चार साल पहले प्रेम विवाह किया था। उसकी पत्नी त्रिपुरा की हैं और उनके दो बच्चे हैं। पत्नी ने नर्स की ट्रेनिंग ली है। उसे कोई नौकरी नहीं मिली। अब वह जेफरी और दो बच्चों की नर्सिंग करते हुए खुश है। जेफरी की बातें मैं ध्यान से सुनता रहा। जेफरी ने कभी मेरे बारे में कुछ नहीं पूछा।
शाम पाँच बजे मुझे होटल छोड़कर जेफरी चला गया। स्नैक्स में मैंने मिजो शैली का पनीर पकौड़ा खाया और कॉफी पिया। टीवी खोला तो पता चला कि दिल्ली और लखनऊ में वज्र बवाल मचा है। अगले दो-तीन घंटे मैं न्यूज चैनल्स की टीआरपी बढ़ाता रहा। साढ़े आठ बजे काफी सोच विचारकर मैंने चिली चिकन, चावल और एक सब्जी मँगाया। बस हो गया डिनर। पता नहीं चला कि ‘पर्वतारोहण’ की थकान ने कब मुझे नींद में ढ़केल दिया।
सुबह की वॉक के बाद स्नान-ध्यान करके मैं नाश्ता कर रहा था। तभी जेफरी का फोन आया कि आज वह नहीं आएगा और मुझे पिक करने उसके पिता आएंगे। मैंने कारण पूछा तो उत्तर मिला, “आइ नीड रेस्ट टुडे।“ जेफरी के पिता निर्धारित समय पर आ गये। वह मध्यम वय और छोटे कद के थे। वह जेफरी जितने बातूनी नहीं थे या यूँ कहिए कि अभी खुले नहीं थे। धीरे धीरे वह खुले और मुझे मेरे सरकारी मेजबान के दफ्तर ले जाते हुए उन्होंने अपनी दो सरकारी दिल्ली यात्राओं के बारे में बता दिया।
दफ्तर में कम से कम दर्जन भर लोग थे जो शनिवार की छुट्टी के दिन आए थे। हमारी बैठक आरम्भ हुई। मुझसे रिएक त्लांग के अनुभव पूछे गए। वहाँ मिले सौहार्द और सत्कार से उनके जोरदार आतिथ्य का बोध मुझमें और गहरा हुआ। चाय-कॉफी का दौर चलता रहा। औपचारिक-अनौपचारिक बातें भी होती रहीं। इस दौरान राजनीतिक चर्चा भी हुई। हमने स्व.लालडेंगा से श्री मोदी तक पर बातें कीं। बातों से पता चला कि दिल्ली की बातें लंबी दूरी लाँघकर आइजॉल तक पहुँच जाती हैं। कसक उठी कि यहाँ की आवाज में रास्तें में क्यों ठिठक जाती है, दिल्ली दूर क्यों हो जाती है। लंच यहीं हुआ, चाइनीज था। हमारा कार्यक्रम करीब साढ़े तीन बजे समाप्त हुआ। पूरे सम्मान के साथ मुझे विदा किया गया। मैंने भी उनलोगों को क्रिसमस की अग्रिम शुभकामनाएँ दीं।
जेफरी के पिता के साथ मैं होटल पहुँचा। थोड़ी देर रुककर मैंने अकेले बाहर जाने का फैसला किया। होटल से निकलकर पास ही स्थित के डी स्वीट्स पहुँचा। मिठाई प्रेम में दो दिन में के डी स्वीट्स पर यह तीसरा छापा था। मजाल कि कभी खुला मिले। वैसी दूसरी दूकान कहीं दिखी नहीं तो मिष्ठान्न भोग की इच्छा को दमित करने में ही मुझे भलाई लगी।
मैं पान की दूकान की तरफ चला गया। पान की दूकान क्या पूरा-पूरा प्रोविजनल स्टोर था। पान लिया। खुमारी सुपारी (ट्विटर पर किसी ने बताया कि इसे ‘ताव्लोहोपुआन’ कहते हैं) के साथ मिजो पान खाने के लिए जिगरा चाहिए। मेरे पास जिगरा की कोई कमी नहीं लेकिन थूकने की दिक्कत थी। आइजॉल की सड़के इतनी साफ थीं कि थूकने का मन नहीं कर रहा था, हालाँकि ‘स्वच्छ भारत’ का पोस्टर कहीं नहीं दिखा। सड़कों पर तमाम जगहों पर मैंने सैनिटेशन सेन्टर देखा। पहाड़ की चढ़ाई के रास्ते में भी मैंने डस्टबीन रखा हुआ पाया।
मुझे होटल लौटना पड़ा। पहले पान थूका और फिर सुपारी की खुमारी कम करने के लिए मै पानी पीकर बाहर निकल गया। क्रिसमस से तीन दिन पहले ही आइजॉल की सजावट दुल्हन जैसी थी। बस अनुमान लगा सकता हूँ कि क्रिसमस के दिन आलम क्या रहा होगा। जगह जगह संगीत बज रहे थे, बाजारों में जोरदार चहल-पहल थी। किसी समाज का जीवट अपने आस्तित्व के लिए उसके संघर्ष में दिखता है और उसकी जीवन्तता अपने त्योहार मनाए जाने के उत्साह में। मैं आइजॉल के समाज की जीवन्तता की पृष्ठभूमि में सेल्फी लेने का लोभ संवरण नहीं कर सका।
मैं सात बजे होटल लौटा। होटल में घुसते कमरे की हाउसकीपिंग करने वाली लड़की ने ‘हेल्लो सर’ कहा। वह यूट्यूब पर कुछ देखते हुए कपड़ों पर इस्त्री कर रही थी। उसके कपड़े या शैली कहीं से इस बात की पुष्टि नहीं कर रहे थे कि वह हाउसकीपिंग स्टाफ है। वहाँ हर आदमी अपना काम करता दिखा। जितना मैं समझ पाया उसके अनुसार काम के आधार पर कोई बड़ा वर्ग भेद नहीं था। यह दावात्याग भी टाँक देना उचित होगा कि मेरा यह अनुमान गलत भी हो सकता है।
पूरी यात्रा में एक कमी खल रही थी कि मैंने कोई खरीददारी नहीं की। इसके लिए मैं अपने आलस को कोस सकता हूँ और आइजॉल के बारे में अपने अज्ञान को। जेफरी ने एक दो जगह दिखाए थे लेकिन कुछ भाया नहीं मुझे। उसने विशाल मेगा मार्ट जाने को कहा तो मैं हँस पड़ा। होटल लौटते हुए ही मैंने यह निश्चय कर लिया कि इस शानदार यात्रा पर एक संस्मरण लिखूँगा। लगे हाथों मैंने लैपटॉप खोला और संस्मरण का खाका खींचने लगा।
इसी बीच पहले वैद्यनाथ राय का फोन आया और फिर वह। आते ही उन्होंने हाल-चाल पूछा और बोले, “खाना तो ठीक नहिये लग रहा होगा।“ मैं सिर्फ मुस्कुराया लेकिन वैद्यनाथ राय अपनत्व में दिल पर ले बैठे थे। वह बोले, “आज खाना मैं लाउँगा। क्या खाएँगे?” मैंने बहुत मना किया पर वह नहीं माने। वह होटल से चले गये और करीब 40 मिनट बाद खाना लेकर आए। मैंने बहुत मुश्किल से उन्हें खाने का पैसा दिया। पराठा, भिंडी मसाला और दो गुलाब जामुन। तीसरे दिन डिनर करने जैसा कुछ लगा। राय जी ने हमारे साथ नहीं खाया। थोड़ा अजीब लगा लेकिन अपनत्व ने मन मोह लिया। राय जी को विदा करके मैं सो गया।
सुबह मैं नाश्ता कर रहा था कि जेफरी आ गया, मुझे लेंगपुई एयरपोर्ट ले जाने के लिए। होटल की औपचारिकताएँ पूरी करके और उनके सत्कार के लिए उन्हें कॉम्प्लीमेन्ट देकर मैं जेफरी के साथ लेंगपुई के लिए निकल पड़ा। गाड़ी में बैठते ही जेफरी ने मुझसे अपनी मित्र को गाड़ी में बैठाने की अनुमति माँगी जो एडवेंचर के लिए पहाड़ पर जाने वाली थी। यदि मैं नहीं बैठाता तो जेफरी को दुबारा आइजॉल आना पड़ता। मैंने अनुमति दे दी और थोड़ी देर में बेबी नामक एक युवती गाड़ी में बैठी। हाय-हेल्लो हुआ के साथ कुछ बातें हुईं। बेबी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में निपुण थी। बातें करते हुए हम एयरपोर्ट पहुँच गये। चलते हुए मैंने जेफरी को थैंक यू कहा। उत्तर मिला, “माई प्लेजर।“ एयरपोर्ट में घुसते हुए लगा कि कोई अपना पीछे छूट रहा है। घूमकर देखा तो जेफरी अभी भी हाथ हिला रहा है।
दिन के एक बजे मैं गुवाहाटी पहुँचा। दिल्ली की फ्लाइट साढ़े तीन बजे थी। इन्टरनेट सेवा बहाल हो गयी थी। मैं प्रतीक्षा करते हुए इंटरनेट सर्फ करने लगा। मेरी बगल में एक भद्र असमिया महिला बैठी थीं। उनका 10-11 साल का बेटा अपने पिता की हाथ में हाथ डाले घूम रहा था। बातचीत से पता चला कि वह महिला बेटे के इलाज के लिए राम मनोहर लोहिया स्वास्थ्य संस्थान, दिल्ली से जा रही हैं, जहाँ उसका इलाज दो साल से चल रहा है और अब वह लगभग स्वस्थ हो चुका है। यही सब करते हुए फ्लाइट का टाइम हो गया और हम विमान में सवार हो गये।
शाम साढ़े छह बजे हम दिल्ली पहुँचे। जाते हुए डरे थे कि पूर्वोतर में इंटरनेट बंद होगा, गोया इन्टरनेट नहीं प्राण वायु हो। अब शक था कि दिल्ली में नेट बंद मिलेगा लेकिन एयरपोर्ट पर टनानटन इंटरनेट मिला। मैंने उबर बुलाया। गाड़ी में बैठते ही मन मन ही मन बोल उठा …
केतनो चिड़ई उड़िहें आकाश
फेर करिहें धरतिये के आस
समाप्त

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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