मंडली

काँग्रेस कार्यसमिति बैठक – एक बार फिर टाँय टाँय फिस्स

शेयर करें

दल की दशा और दिशा पर चिन्ता व्यक्त करते हुए पत्र लिखना हमारे लोकतंत्र की एक स्वस्थ परम्परा है। आम तौर पर ऐसे पत्राचार का उद्देश्य स्वयं के लिए चिन्तित होते हुए, स्वयं को विस्मृति की परत में दबने से बचाने के लिए, राजनीतिक और मीडिया के गलियारों में स्वयं ही ‘उपस्थित श्रीमान’ कहना होता है। ऐसे पत्रों से कुछ शहादत के लिए अपने नाखून काट दिए जाने की अपेक्षा रखते हैं जबकि कुछ राजनीतिक पुर्नवास या पेंशन की आकांक्षा। कभी कभी ऐसे पत्र खुन्नस में ‘खेलेब ना खेलाएब खेलिये बिगाड़ेब’ के पावन लक्ष्य के साथ भी लिखे जाते हैं। कई बार ऐसे पत्र अपने भाषा कौशल को धारदार करने और सुलेख को सुन्दर बनाने के व्यायाम के तौर पर लिखे जाते हैं। कभी कभी इन पत्रों का उद्देश्य टाइमपास भी होता है। पत्र लिखने वाला सरोवर में एक कंकड़ फेंक कर किनारे बैठ जाता है। फिर वह उठती हुई हिलोरों का आनन्द स्वयं भी लेता है और दूसरों को भी देता है। ऐसे पत्रों का उद्देश्य चाहे कुछ भी हो पर बहाना पार्टी की दशा और दिशा पर चिन्ता व्यक्त करना ही होता है।

काँग्रेस खुर्राट गण बनाम गूँगी गुड़िया की लड़ाई में इन्दिरा गाँधी का साथ देने वाले कमलापति त्रिपाठी उन दिनों 21 वीं सदी में जाने की तैयारी कर रहे राजीव गाँधी की युवा दूनवाहिनी के समक्ष असहज महसूस कर रहे थे। उन्होंने काँग्रेस के कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ते हुए एक विस्तृत पत्र लिख डाला। बाद में वीपी सिंह और आरिफ मोहम्मद खाने ने भी पत्र लिखे। शेष इतिहास है। पार्टी की पत्र परम्परा को आगे बढ़ाते हुए दो-तीन सप्ताह पहले काँग्रेस के 23 चिन्तित नेताओं ने पार्टी की स्थिति पर चिन्तन की आवश्यकता बताता हुआ एक पत्र लिखा। इससे पार्टी की स्थिति एक-दो दिन के लिए चिन्तनीय हो गयी। अंत में सब शुभ हुआ। इस पत्र ने इतिहास नहीं बनाया बल्कि कुछ महीने पुराने टाँय टाँय फिस्स के इतिहास को फिर दुहरा दिया।

सोनिया गाँधी वर्षों तक काँग्रेस अध्यक्ष रहीं। संभवत: बोर होकर या पुत्र मोह में उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। राहुल जी बहुत जल्द बोर हो गये। पार्टी की हार तो महज एक बहाना थी क्योंकि हमारे लोकतंत्र में सिर्फ दलों की जीत ही नेता की होती है, हार की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से पार्टी की। राहुल जी के बोर हो जाने के बाद पार्टी में घोर मंथन हुआ। मंथन ऐसा कि मक्खन पहले ही निकल चुका था पर मठ्ठे को मथते रहने का स्वाँग होता रहा। सोनिया जी अंतरिम अध्यक्ष बनीं।

23 नेताओं के पत्र से आहत होकर सोनिया जी ने इस्तीफा दे दिया। फिर पिछले मंथन जैसा ही मंथन हुआ। बड़ा दिल दिखाते हुए और अपने व्यक्तिगत दुख को परे रख कर सोनिया जी फिर अंतरिम अध्यक्ष बन गयीं। सब कुछ ठीक रहा तो वह आजीवन अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी, छह-छह महीने की चाहे जितनी किश्तें लेनी पड़ें। हालाँकि यह अन्याय है। बोर होने का एक मौका प्रियंका जी को भी मिलना चाहिए। इन्दिरा जी से मिलती नाक का सम्मान नहीं करना स्वयं इन्दिरा जी के प्रति अश्रद्धा है।

जो हुआ वह इतनी आसानी से नहीं हुआ। बेहद गर्म माहौल में बाजाप्ता काँग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। माहौल गर्म होने के बावजूद किसी अप्रिय घटना की आशंका इसलिए नहीं थी क्योंकि कोरोना काल में आवश्यक सोशल डिस्टैंसिंग के अनुपालन के लिए यह बैठक ऑनलाइन हुई। सोनिया गाँधी के इस्तीफे से उठे धुएँ से लोग-बाग अनुमान लगा रहे थे कि आग कहीं न कहीं है वरना उन्हें इस्तीफा देने की क्या आवश्यकता थी। न काँग्रेस ने माँगा था, न काँग्रेसियों ने, न देश ने और न लोकतंत्र ने। बैठक आरम्भ होते ही आग का खुलासा हुआ। बंद कमरों के खुले कंप्यूटर्स की सीमाएँ तोड़ती खबर आई कि राहुल गाँधी ने पत्र लिखने वाले 23 नेताओं पर भाजपा से साँठ-गाँठ करने का आरोप लगाया है।

साँठ-गाँठ के आरोप से आहत कपिल सिब्बल ने भड़कता हुआ ट्वीट का गोला दाग दिया। गुलाम नबी आजाद अलग चौड़े हो रहे थे, “यदि आरोप प्रमाणित हुए तो मैं ‘सभी’ पदों से इस्तीफा दे दूँगा।“ कितने पद हैं उनके पास? दोनों नेताओं का गुस्सा स्वाभाविक था। आरोप तो उल्टा राहुल जी पर है कि वह भाजपा के सबसे बड़े स्टार कंपेनर हैं। यह लेख लिखते हुए #SoniaHataoRahulLao हैशटैग  देखकर इसकी पुष्टि भी हो रही है। एक बात समझ नहीं आयी। 23 नेताओं में से सिर्फ 2 ही आहत हुए। क्यों? क्या शेष 21 ने एंटी हर्ट वैक्सीन ले रखा है?

आग की हल्की लपटें दिखीं। टीवी समाचार चैनलों ने उसे सब कुछ भस्म करने वाला दावानल बता दिया। डैमेज कंट्रोल का ‘नेतृतव’ करते हुए रणदीप सिंह सुरजेवाला आगे आए। कपिल सिब्बल की आग ठंडी हो गयी। गुलाम नबी आजाद शाम तक दहकते रहे। एक अग्निशमन दस्ता रात को उनके घर गया था। वह भी बुझ ही गये होंगे, दहकते रहने के लिए आवश्यक इंधन उनके पास नहीं है। वैसे ओवैसी साहब ने बतौर मुसलमान गुलाम को काँग्रेस की गुलामी से मुक्त होने का चैलेंज भी दिया है।

नये अध्यक्ष पर अनेक कयास लगाए जा रहे थे। प्रियंका जी ने गाँधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष चुनने का आह्वान किया था। कायदे से  उन्हें अध्यक्ष पद ही नहीं पूरी काँग्रेस को गाँधी परिवार से बाहर निकलने के लिए कहना चाहिए था। एक उत्साही मीडिया ब्रेकेश्वर ने उत्तर प्रदेश के एक नेता का नाम इशारों इशारों में उछाल दिया। उस नेता ने आह भरी, “हम तो प्रदेश का अध्यक्ष भी न बनें। राज्यसभा मिला है, चैन से कंचन चरने दो।“ खुशामद के ‘लुफुत’ से लाचार लोगों की ओर से राहुल जी और सोनिया जी के पक्ष में पुरजोर माँगें उठीं। दिल्ली के एक कॉरपोरेटर ने खून भरी माँग रखी, खून से लिखी अपनी चिठ्ठी से। सूत्रों का कहना है कि ये सज्जन अपने छात्र जीवन में आलते से प्रेम पत्र लिखा करते थे।

‘अंत भला तो सब भला मान कर’ काँग्रेस समर्थक तानों के बीच राहत की साँस ले रहे हैं। काँग्रेस में आमूल-चूल परिवर्तन की आस लगाए  बैठे लोग काँग्रेस की चूलें हिलती देखकर निराशा के भँवर में गोते लगा रहे हैं। ‘जो हुआ सो हुआ और जो होगा सो होगा’ पर ढृढ़ काँग्रेस सेटल हो जाने के मूड में हैं, काँग्रेसी भी।

दिन भर काँग्रेस की चर्चा होती रही पर यह दिन वास्तव में भाजपा समर्थकों का था। उन्होंने खूब मज़े लिए। उनका मन मयूर एक दिन पहले से ही नाच रहा था। उनका मानना है कि देश काँग्रेस मुक्त होने की राह पर कुछ कदम और बढ़ गया है। यह भविष्य के गर्भ में हैं कि देश काँग्रेस मुक्त होगा या नहीं। इतना तय है कि भाजपा इसके लिए प्रयास कर रही है किन्तु इस दिशा में काँग्रेस के प्रयास कहीं अधिक ईमानदार और सार्थक दिखते हैं।

इन प्रयासों के बीच समय की माँग यह है कि देश और काँग्रेस सहित सभी पार्टियाँ काँग्रेसियत से मुक्त हों – उस काँग्रेसियत से जो सत्ता प्रतिष्ठानों की अकथित संस्कृति है, जो वंशवाद को पुष्पित और पल्लवित करती है, जो खुशामद को सेवा का सोपान समझती है, जो आंतरिक लोकतंत्र को दमित करते हुए लोकतंत्र का दीमक बनती है, जो भ्रष्टाचार को एक संस्था की तरह सिंचित करती है, जो सरोकारों और संकेतों के धालमेल के सहारे स्वार्थ साधती है, जो संस्थाओं की स्वायत्ता में बाधक बनती है और जो बिना झिझक राजनीतिक लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करती है। सत्तर साल से अधिक के परिपक्व लोकतंत्र से यह आशा टू मच नहीं है। आशा पर आकाश टिका है।

#CWC #Congress #SoniaGandhi #RahulGandhi

#काँग्रेसकार्यसमिति #काँग्रेस #सोनियागाँधी #राहुलगाँधी

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

2 thoughts on “काँग्रेस कार्यसमिति बैठक – एक बार फिर टाँय टाँय फिस्स

  1. “यह भविष्य के गर्भ में है कि देश कांग्रेसमुक्त होगा या नहीं।इतना तय है कि भाजपा इसके लिए प्रयास कर रही है, किन्तु इस दिशा में कांग्रेस के प्रयास कहीं अधिक ईमानदार और सार्थक दिखते हैं।”
    वाह!बहुत बढ़िया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *