कांग्रेस कार्यसमिति बैठक – टाँय-टाँय फिस्स – मंडली
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कांग्रेस कार्यसमिति बैठक – टाँय-टाँय फिस्स

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सरकारी क्षेत्रों तक पहुँच रखने वाले पहुँचे हुए लोग अक्सर कहते हैं कि सरकारी बैठकों का सबसे बड़ा हासिल ‘फिरी’ का चाय समोसा ही है। निजी क्षेत्र भी कुछ अधिक अलग नहीं। लाला जी की कंपनी हो तो बैठक लाला जी के पूरब को पश्चिम बताने की हाँ में हाँ मिलाकर समाप्त हो जाती है। यदि मीटिंग कॉरपोरेट जगत की हो तो वहाँ कई बार ऐसी मीटिंग भी होती है जो अगली मीटिंग का एजेंडा सेट करती है और अगली मीटिंग पिछली मीटिंग की समीक्षा करके समाप्त हो जाती है, लंच-वंच चाहे जितना भी करारा हो।

पता चला कि नया अध्यक्ष चुनने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हो रही है। स्वरुप देखते हुए कांग्रेस को निजी क्षेत्र का ही समझा जाना चाहिए। बैठक भी कॉरपोरेट स्टाइल में ही हुई। कभी कांग्रेस की बैठकें दरी पर गद्दा और जाजिम बिछाकर होती थीं और प्रतिभागियों को आराम के लिए मसनद दिया जाता था। अच्छा हुआ कि ऐसा नहीं था वरना कार्यसमिति सदस्य कश्मीर जैसे मुद्दे पर सूरज बड़जात्या की फिल्मों के तकिया-फेंक खेल का उग्र मंचन ही कर देते।

वैसे इस कार्यसमिति बैठक की आवश्यकता ही नहीं थी। 9 सीटें तो बढ़ीं ही थी ना, राहुल जी को इस्तीफा देने की जरूरत नहीं थी लेकिन चुनाव परिणामों के तुरन्त बाद ही वह इस्तीफे की धमकी देने लगे। यह अपरिपक्व कदम था। लोकतंत्र में नेता को सदैव जीत में आगे और हार में पीछे होना चाहिए। यह कांग्रेस की स्थापित राजनीतिक संस्कृति है कि दल की जीत नेता की होती है और दल की हार सामूहिक। राहुल जी ने इस संस्कृति को आहत करके कांग्रेस के लोकतांत्रिक स्वरुप को चोटिल किया है।

राहुल जी अपने इस्तीफे की घोषणा पर अड़े रहने की बात कई सप्ताह तक करते रहे। आस बँधी कि बात आयी गयी हो जाएगी और किसी भी पल यह बयान आ जाएगा, “हुआ तो हुआ” लेकिन विधना को कुछ और ही मंजूर था। राहुल जी ने इस्तीफा दे ही दिया। मोरल हाई फुदककर हाईट पर चला गया। कांग्रेस अनाथ होने जैसा विहेब करने लगी। भाजपा बल्लियों उछलने लगी, गोया उनकी सीटें 303 से बढ़कर 403 हो गयी हों। ये प्रतिक्रयाएँ हाथी के दाँत जैसे थे। वस्तुस्थिति इसके उलट थी क्योंकि भारतीय राजनीति राहुलमय है। कांग्रेस राहुल को अपनी ताकत कहती है, मानती नहीं जबकि भाजपा उन्हें अपनी ताकत मानती है, कहती नहीं।

काफी मान-मनव्वल के बाद भी राहुल जी नहीं माने तो कांग्रेस ने एक कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया जो कांग्रेस से उम्र में लगभग उतने ही छोटे हैं जितने राहुल जी से बड़े। उन्होंने भी राहुल जी से पुन: अध्यक्ष बनने का निवेदन किया पर वह अपने निर्णय पर अटल रहे, टलने का स्कोप ही नहीं था। तब नया अध्यक्ष चुनने के लिए कार्यसमिति की बैठक बुलानी पड़ी। हालांकि मोदीमय हुए देश में कांग्रेस का नया अध्यक्ष ‘केसरी थेरेपी’ से भी चुन लिया जाता तो कोई बवाल नहीं होता क्योंकि इस बैठक को लोगों और मीडिया ने भारत-वेस्टइंडीज क्रिकेट सीरीज जितनी गंभीरता से ही लिया था। उधर भाजपा समर्थक इस बैठक पर मौज ले रहे हैं। कोई उन्हें भी ‘इंडिया शाइनिंग’ के औंधे मुँह गिरने के बाद या आडवाणी जी की संभावना समाप्त हो जाने के बाद हुई भाजपा कार्यसमिति की बैठकों की याद दिलाओ।

कॉरपोरेट शैली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आरम्भ हुई। माल-मत्ते की कमी से जूझ रही पार्टी के लिहाज से टशन कुछ कम नहीं था, हालांकि पक्की जानकारी के अभाव में मेनू पर सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है। बैठक के आरम्भ में बिगड़ी बात बनाने के लिए पूरी कार्यसमिति ने राहुल जी से फिर अध्यक्ष बनने की प्रार्थना की। राहुल जी ने धन्यवाद देते हुए प्रार्थना की हवा निकाल दी। साथ ही वह सोनिया जी के साथ अध्यक्ष चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए। पाँच उप-समितियां बना दी गयीं। सूत्र बताते हैं कि मोहरे फिट कर दिए गए और ब्रीफ किया गया कि रात तक नये अध्यक्ष का चयन हो जाएगा।

बैठक से पहले और बाद में अध्यक्ष के रुप में कई नाम हवा में तैरते रहे। कुछ नाम ऐसे भी थे जिन्हे सुनकर कांग्रेस समर्थक यह तक कहने लगे थे कि कांग्रेस को बिना अध्यक्ष के ही रहने दो। एक माँग कांग्रेस के अन्दर मजबूती से उभरी – जैसे अंधा माँगे आँख, कांग्रेस माँगे इन्दिरा सी नाक। प्रियंका जी के करिश्मा की बातें होने लगीं। मोदी जी द्वारा देश की रक्षा और अखंडता पर मिसाल कायम किए जाने के बाद आस जगी कि कांग्रेस भ्रष्टाचार पर कड़ा संदेश देगी, प्रियंका जी को अध्यक्ष बनाकर लेकिन यह हो न सका।

बैठक का अंत टाँय-टाँय फिस्स के एंटी-क्लाइमेक्स जैसा रहा। कांग्रेस ने अनौपचारिक रूप से कह दिया कि हुआ तो हुआ और जो होना है, वो भी हो ही जाए। रात 11 बजे के बाद खबर आयी कि सोनिया गाँधी अन्तरिम अध्यक्ष चुन ली गयी हैं। यदि अभी भी पूर्णकालिक अध्यक्ष के लिए सागर मंथन जारी है तो आशा की जानी चाहिए कि वह सफल होगा। कामना है कि नये अध्यक्ष देश को एक प्रभावी व सकारात्मक विपक्ष देंगे और वह लोकतंत्र के लिए सागर मंथन से निकले अमृत सिद्ध होंगे, सिर्फ सत्ताधारी भाजपा के अमृत नहीं। यदि सोनिया गाँधी में ही नया अध्यक्ष मिल गया है तो उन्हे शुभकामना कि वह सिद्ध कर दें – हँसले घर बसेला।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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