मंडली

नागरिकता संशोधन विधेयक: देर आए दुरुस्त आए

शेयर करें

नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा के बाद अब राज्यसभा से भी पास हो गया है। राष्ट्रपति के विधेयक पर हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन गया है और इससे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिन्दू, सिख, जैन और पारसी शरणार्थियों को बड़ी राहत मिलेगी।

कपिल सिब्बल को कहने दीजिए कि देश का विभाजन जवाहर और जिन्ना के बीच इंग्लिश कुकीज खाने के विवाद पर हुआ था लेकिन यह आम और स्थापित मत है कि देश का विभाजन द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर हुआ और इसका आधार यह था कि मुसलमानों का अलग देश (होमलैंड) पाकिस्तान होगा। भारत हिंदू राष्ट्र भले नहीं बना लेकिन यह हिन्दुओं का ही देश था। सिख, जैन, बौद्ध और पारसी जैसे अन्य अल्पसंख्यकों को भारत ने स्वाभाविक रूप से आत्मसात कर लिया। मुसलमानों के भी यहाँ रहने पर कोई बंदिश नहीं लगी, हालाँकि उन्हें एक अलग देश दे दिया गया था। यह ऐतिहासिक भूल थी या नहीं, इस पर आज तक बहस हो रही है।

इस पूरी पृष्ठभूमि में भारत का यह कर्तव्य था कि पाकिस्तान या अन्य पड़ोसी देशों में रहने वाले अल्पसंख्यकों या वहाँ से प्रताड़ित होकर भारत आने वाले हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध,पारसी और ईसाई अर्थात गैर-मुस्लिम शरणार्थियों का हित चिन्तन करना। जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था, वह अब हुआ है। देर आए, दुरुस्त आए। यह सर्वथा स्वागत योग्य है।

पाकिस्तान के कट्टरवाद से पूरी दुनिया त्रस्त है। वहाँ की जनसंख्या में अल्पसंख्यकों का प्रतिशत जिस प्रकार गिरा है, उससे साफ जाहिर है कि या तो वहाँ धर्मांतरण कराया गया या उन्हें देश छोड़ने को बाध्य किया गया। बांग्लादेश का मामला भी कुछ अलग नहीं है। धर्मांतरण और शोषण के अतिरिक्त इनकी महिलाओं के साथ अपहरण और बलात्कार तक की घटनाएँ हुईं। असमानता और भेदभाव के कारण इनसे विकास के मौके छीने गए। इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों की स्थिति से भारत कब तक आँखे मूँदता? उनका हित चिन्तन भारत का कर्त्तव्य था जिसे नागरिकता संशोधन कानून से पूरा किया गया है।

नागरिकता संशोधन कानून पर धर्म के आधार पर पक्षपाती होने का आरोप लग रहा है। गाँधी, अम्बेडकर और नेहरू का आह्वान किया जा रहा है। आरोप लगाने वाले यह बताएं कि क्या हिन्दू कोड बिल भी धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला था जिसे पंडित नेहरू की सरकार में कानून मंत्री बाबा साहेब ने संसद में पेश किया और जिसे बाद में संसद ने पास किया। शेष इतिहास है। यदि यह कानून सामाजिक सुधार था तो मुसलमानों को इससे वंचित क्यों रखा गया और यदि यह थोपा हुआ सामाजिक सुधार था तो यह सिर्फ हिन्दूओं पर क्यों थोपा गया। जिस तरह आज इस कानून का विरोध हो रहा है, उसी तरह हिन्दू कोड बिल का भी हिन्दू संगठनों ने विरोध किया था। एक सुप्रसिद्ध और सम्मानित संन्यासी तो इसी मुद्दे पर नेहरू के विरुद्ध लोकसभा चुनाव तक लड़ गये थे।

नागरिकता संशोधन कानून को संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताया जा रहा है लेकिन संविधान के सबसे मौलिक अवयव की मूल भावना यह है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है और जनता के प्रतिनिधि के रूप में संसद सर्वोच्च। इसलिए यदि संसद ने विधेयक को स्वीकृति दी है तो संविधान की मूल भावना से कथित छेड़छाड़ का आरोप सिर्फ बकैती समझा जाएगा। हद से हद इसे ‘खंभा नोचना’ ही कह लीजिए। सनद रहे यह अब नागरिकता संशोधन विधेयक नहीं बल्कि नागरिकता संशोधन कानून है।

यह चिन्ताजनक है कि देश के अल्पसंख्यकों में वेवजह भ्रम फैलाया जा रहा है। गृह मंत्री ने साफ कहा है कि भारतीय मुस्लिमों को डरने की आवश्यकता नहीं है। उनमें असुरक्षा के भाव को समाप्त करने लिए यह आश्वासन पर्याप्त है। साथ ही यह ध्यान रखना जरूरी है कि जो गृह मंत्री ने नहीं कहा, वह अधिक महत्वपूर्ण है: आप कृपया अपने घुसपैठी पाकिस्तानी व बांग्लादेशी बिरादरों की खैरख्वाही में दुबले न हों। दूसरी चिन्ता पूर्वोतर और खास तौर पर असम की स्थिति है। वहाँ हालात नहीं सँभाले गए तो ८० के दशक जैसा आन्दोलन हो सकता है और अलगाववादी माँगे उठ सकती हैं। कल बंगाल में आन्दोलनकारियों का चलती ट्रेन पर पथराव का वीडियो भी बेहद चिन्ताजनक है। आशा है कि गृह मंत्रालय और राज्य सरकार स्थिति का सख्त संज्ञान लेंगे।

देश में इस कानून पर कुछ लोग व्यर्थ में विलाप कर रहे हैं और कुछ निहित स्वार्थ में। दूसरी ओर यह भी कहना ही होगा कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक सप्ताह से यह समझा रहा है कि यह बिल किसी के खिलाफ नहीं है लेकिन पार्टी के कुछ मुखर समर्थक अति उत्साह में इससे इतर संदेश छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक पर लोकतंत्र की दुहाईयाँ भी दी जा रही हैं और कहा जा रहा है कि देश को ठगा गया है जबकि यह भाजपा के घोषणापत्र में कब से दर्ज है। इतना श्रेय इस भाजपा सरकार को दिया ही जाना चाहिए कि उसने राजनीतिक विचार को घोषणापत्र की शोभा बढ़ाने से आगे ले जाने का क्रम आरम्भ कर दिया है। राममंदिर को अदालती मामला मानकर छोड़ भी दें तो धारा ३७० के बाद यह दूसरा मुद्दा है जो भाजपा के कोर मुद्दों में रहा है और उसने अपने इन चुनावी वादों को पूरा करके घोषणापत्र को गंभीरता जाने की आस जगायी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *