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चुनावनामा दिल्ली का

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देश के आम चुनाव का या बड़े राज्यों के विधानसभा चुनावों का डंका बजता है। इस लिहाज से तो वृहतर नगरपालिका सी दिल्ली के विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बजनी चाहिए थी पर यहाँ तो पत्रकार, ट्वीटकार, स्तंम्भकार और व्यंग्यकार (इस लेख के लेखक भी) खाली-पीली डंका ही नहीं पीट रहे बल्कि जोश में सिंघा भी फूँक रहे हैं। पूर्वोत्तर को छोड़िए, यदि यह चुनाव उड़ीसा का ही होता तो एक-एक लेख, विश्लेषण या व्यंग्य कूँथ-कँहरकर ही आते। यहाँ तो ‘एक बुलावे तेरह धावे’ चल रहा है क्योंकि यह दिलवालों की दिल्ली है भाई। इसे देश की राजधानी और देश का दिल नहीं, देश ही समझिए। मैंने डंका पीटने में नेताओं और उनके पालक-बालक गण का नाम इसलिए नहीं लिया क्योंकि दूल्हा और बाराती बनकर कंचन चरने के लिए उनका ऐसा करना स्वाभाविक है, लेकिन उपरोक्त सारे ‘कार’ बेकार ही बेगार कर रहे हैं, ओवरटाइम वाला।

हर चुनाव में यह गड़बड़झाला होता है कि चुनाव का मुद्दा आखिर है क्या। अब तो हमें चुनाव से पहले चुनावी मुद्दों पर एक जनमत संग्रह करा लेना चाहिए ताकि मुद्दे शीशे की तरह साफ दिखें। मुद्दों की अस्पष्टता के बीच इस चुनाव में एक अच्छी बात यह है कि इसमें कोई ‘घोषित’ गठबंधन नहीं है। कोई अपनी हार का ठीकरा चाहकर भी दूसरे पर नहीं फोड़ सकता। चुनाव में आम मुद्दा न होने के कारण हर दल अपना मुद्दा गढ़ रहा है। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी अपने ‘काम’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है। कथित काम को कलही कला से जोड़कर वह अपने मुद्दे को निखार रही है। भाजपा अपने सबसे बड़े नेता के नाम पर चुनाव लड़ रही है। नेता में दम है भाई, पार्टी के सांसद से सरपंच तक उनके नाम पर ही जीतते हैं। किसी और के हुनर दिखाने का अवसर ही नहीं आता। वहीं चुनावों से विरक्त होती जा रही काँग्रेस पर लोगों ने और ‘कारों’ ने ध्यान नहीं दिया, इसलिए उसने अपना मुद्दा ही नहीं चुना। वह चुनाव लड़कर स्वयं पर और दिल्ली पर उपकार करती हुई प्रतीत होती है।

आआपा मुफ्त की बिजली और पानी को अपना मुद्दा बताती है। भाजपा इसे मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति कहकर कोसती है, लेकिन वह भी अपने वादों से मुफ्तीलालों का मन रख ही लेती है। सुसुप्त काँग्रेस तक ने मुफ्त का वादा करने में अपना सब कुछ झोंक दिया – बबुनी लोग की पीएचडी तक फ्री पढ़ाई, बाबा लोग को 5000 रुपये का पेंशन और लोकसभा चुनाव में पिट चुका ‘न्याय’ का 72000/। आआपा द्वारा शिक्षा के पोस्टरीय कायाकल्प के दावे को भाजपा का आड़े हाथों लेना स्वागत योग्य है। तो क्या हुआ जो उसकी केन्द्रीय शिक्षा नीति स्वयं बीरवल की खिंचड़ी की तरह पके ही जा रही है। आआपा मुहल्ला क्लिनिक से आरोग्य का दावा करती है किन्तु ‘आयुष्मान भारत’ लागू नहीं करने की बात पर झाँकती है। दिल्लीवासी मन ही मन दोनों की खिल्ली उड़ाते हैं। उड़ाए भी क्यों नहीं, देश में शिक्षा और स्वास्थ्य भी भला कोई मुद्दा है। बजट और अर्थव्यवस्था छोड़िए, दिल्लीवासी तो ऐसे मनमौजी हैं कि वे जीवन की पहली आवश्यकता हवा के दमघोंटू होने के मुद्दे को भी मुद्दा नहीं मानते। लिहाजा पार्टियों ने भी उस पर रस्म अदायगी ही की है। वहीं काँग्रेस दबे स्वर पूछती है, “मेट्रो कौन लाया और राष्ट्रमंडल खेलों में दिल्ली को किसने चमकाया?” दबे स्वर इसलिए कि कोई न पूछ बैठे कि राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाला किसने किया।

इधर चुनाव का पर्व चल रहा है और उधर शाहीन बाग में आजादी का त्योहार। बँटती बिरयानी और पकती खीर के बीच हवन और अजान साथ-साथ चल रहे हैं। चिकन नेक का टेंटुआ बदाने का दंभ भरने वाले शाहीन बाग के तथाकथित मास्टरमाइंड पुलिस रिमांड में हरदी-गुरदी बोल रहे हैं। फिर भी मजमा जमा है और रोज नये नये मनोंरंजक बवाल हो रहे हैं। एक हठ्ठा-कठ्ठा युवा कट्टे का करतब दिखाता है, आआपा चौड़ी होती है लेकिन जाँबाज जब आआपा का क्रांतिकारी निकलता है तो गाल बजने लगते हैं। एक मैडम बुर्का पहनकर स्टिंग करते हुए पकड़ी जाती हैं। चारों ओर उनकी गूँज उठती है। कुछ ही घंटों में वह गूँज रिवर्स गूँज में बदल जाती है। शाहीन बाग को नागरिक अधिकारों का धर्मनिरपेक्ष कर्मयुद्ध बताने वाले प्रखर बुद्धिजीवी, प्रकांड पत्रकार और कुछ दल दिल्ली विधानसभा चुनावों में तथाकथित ह-म ध्रुवीकरण के अंदेशे में दुबले हुए जा रहे हैं। यदि ऐसा हो भी रहा है तो क्या ध्रुवीकरण नया है? लौह महिला का ‘बहम’ व चच्चा-ताऊ का MY भूल गये? ठंड रखिए व वास्तविकता स्वीकारिए … ये तो है योगा … ये अब ऐसे ही होगा।

यह लोकतंत्र की सुन्दरता है कि जीत की आस हो या हार का अंदेशा या हार या जीत से परे विरक्ति का भाव, लेकिन सब अंतिम समय तक जीत ही रहे होते हैं। यह चुनाव भी अपवाद नहीं, यहाँ भी 11 तारीख तक सब जीतते रहेंगे। ओपिनियन पोल्स मनोंरंजक रहे, आशा है कि एग्जिट पोल्स भी निराश नहीं करेंगे। सारे ‘कारों’ ने भी आशा के अनुरूप अपने जलवे बिखेरे हैं। परिणामों के भविष्य वक्ताओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। हमेशा की तरह इस बार भी कुछ भविष्यवाणियों से चुनाव आयोग भ्रम में पड़ गया कि मतदान/ मतगणना कराएं या यही मान लें।

चुनाव अभियान जोरदार रहा। आरोप-प्रत्यारोप और छींटाकशी चुनाव अभियानों के आभूषण हैं जो इस बार संभवत: पिछले चुनाव से कतई स्वस्थ रहे। काँग्रेस के कार्यकर्ताओं का आआपा नेत्री के समक्ष हूमच हूमचकर प्रचार करना और बीच-बीच में आआपा नेत्री द्वारा उन्हें हुर्र-हुर्र करना अद्भुत दृश्य था। फिर भी कुछ लोग मानते हैं कि एंटरटेनमेंट में शायद थोड़ी कमी रह गयी। इसकी भरपाई हुई एक स्वस्थ संकेत से। भाजपा के चर्चित प्रत्याशी तेजिन्दर बग्गा ने अपनी प्रकृति के अनुरुप कुछ हटके किया। वह चुनाव प्रचार करते हुए आआपा के दफ्तर में ही वोट माँगने पहुँच गये। वहाँ माहौल सर्वथा स्वस्थ बना रहा और क्षणिक ही सही पर यह स्वस्थ संकेत उभरा कि चुनाव लड़ रहे हैं, युद्ध नहीं; लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्वी हैं, शत्रु नहीं। काश, यह क्षणिक संकेत स्थायी हो जाता।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

2 thoughts on “चुनावनामा दिल्ली का

  1. Bahut hi behtareen lekh. AAP ko hindi me padhne me kuch kathin hai aur आआपा ke badle आप shayad jyada aasan hota padhne me.

    1. पढ़ने और सराहने के लिए धन्यवाद। आपका सुझाव महत्वपूर्ण है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि आप से थो़ड़ी गफलत हो सकती है, इसलिए आआपा लिखा।

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