मंडली

इन्हें चिंदियों में हिंदुस्तान चाहिए!

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अरुंधती राय को कौन नहीं जानता? चिंदियों का देवता (गॉड आफ स्माल थिंग्स) नामक उपन्यास के लिए इन्हें बुकर पुरस्कार मिला है। इस नाते वे अंर्तराष्ट्रीय बौद्धिक व्यक्तित्व हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के छात्रों को यह मशविरा देते हुए उन्हें टीवी पर सुना गया कि सरकार जब नाम पूछे तो अपना नाम रंगा या बिल्ला बताइए तथा पता प्रधानमंत्री का निवास 7 रेसकोर्स रोड, नई दिल्ली दर्ज कराइए। वे नागरिकता कानून के संदर्भ में यह समझा रहीं थी और कह रही थीं कि सरकार के इस कानून के खिलाफ जिससे जो बन पड़े करे, किसी भी हद तक जाकर।

अरुंधती यदि यही बयान उस मुल्क में देतीं जिसने उन्हें बुकर दिया है तो वहाँ इनकी अगली रात जेल की सलाखों के पीछे गुजरती। लेकिन यहाँ सब कुछ करने की छूट है। राष्ट्र से जुड़ा जब भी कोई सवाल सामने आता है तो अरुधंतियों के इस बौद्धिक जमात की वैचारिक मटरगश्ती सामने आ जाती है। ये लोग देश को ‘बनाना रिपब्लिक’ बनाने में जुटे हैं। यही अरुंधती कभी बस्तर के माओवादियों के साथ खड़ी दिखती हैं और कभी कश्मीर के अलगाववादी यासिन मलिक के साथ फोटो खिंचवाती हैं। इनका न तो संसद पर यकीन है और वह न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणी करके जेल जा चुकी हैं।

अरुंधती राय अकेली ऐसी नहीं हैं। एक पूरी जमात है जिसे देश में सब कुछ गलत दिखता है। मध्यप्रदेश काडर के आईएएस रहे और इस्तीफा देकर एक्टिविस्ट बने हर्ष मंदर भी इससे पहले बोल चुके हैं कि वे अपना नाम मुसलमान दर्ज कराएंगे। फिर अवार्ड वापसी करने वाले महापुरुषों के बारे में सुना होगा, जिनकी आँखें सरहद पर दुश्मनों से और जंगल में माओवादियों से लड़ते हुए शहीद होने वालों को लेकर कभी नम नहीं होतीं। ये हर घटना में बारीकी के साथ हिंदू एंगल खोजते हैं और उस पर विमर्श करते हैं। कश्मीर में धारा 370 हटी तो उनचासियों ने सरकार के खिलाफ हस्ताक्षर करके के बयान जारी किया। इन उनचास लेखकों, फिल्मकारों और रंगकर्मियों में से कुछ तो कश्मीर के पंडित घराने से थे जिन्हें मजहबी कट्टरपंथियों ने घाटी से निकाल दिया था, जिनके घर जले, बहू, बहन और बेटियों की इज्जत लुटी और वे अब अपने ही देश में शरणार्थी हैं।

ऊपर की जमात में जितने भर बौद्धिक मसखरे हैं, उन्हीं में से प्रायः सबने मुंबई को दहलाने वाले आतंकी याकूब मेमन और संसद पर हमले के गुनाहगार अफजल गुरू की फाँसी रोकने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया था। याद करिए 2013 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का चुनाव अभियान शुरू हुआ तो इसी जमात के लोगों ने खुले मुँह मोदी को खून का सौदागर, भारत का इदीअमीन, आदमखोर और न जाने क्या-क्या कहा। मोदी जी दुनिया के दुर्लभ राजनेता हैं जिन्हें ऐसी गालियाँ और विशेषण मिलते हैं। फिर भी वह इन सबके लिए असहिष्णु बने हुए हैं। इन्हीं में से कुछ बौद्धिक ऐसे थे जिन्होंने ऐलान किया था कि यदि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो वे देश छोड़ देंगे। वे छः साल बाद भी अपने ऐलान पर अमल नहीं कर पाए और फिलहाल अरुंधती जैसे बयान व व्याख्यान देने में जुटे हैं। इन सभी के बीच देश की प्रमुख यूनिवर्सिटीज बाँटी गई हैं, जहां वे सक्रिय होकर छात्रों को विचारों के ज्वलनशील ईंधन देने के काम पर जुटे हैं।

अभी ये सबके सब हिंदुस्तान के भीतर आखिरी खुंदक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन्हें ऐतराज है कि सरकार नागरिकता कानून क्यों लायी। बड़ी मुश्किल है कि देश में नागरिकों का लेखाजोखा और हिसाब क्यों रखा जा रहा है। दुनिया के हर देश का अपना नागरिकता कानून है। किसी को शरण देना या नागरिक बनाना धर्मशाले में टिकाने जैसा नहीं है। अमेरिका व यूरोपीय देशों की नागरिकता कितनी मुश्किल है। आए दिन कड़े कानून बनते हैं पर उस देश के भीतर कोई आवाज उठती है क्या? अमेरिका ने मैक्सिको के शरणार्थियों को रोकने के लिए कितने कड़े कानून नहीं बनाए। दूसरे देश के लोग न घुसें इसलिए इलेक्ट्रिक तारबंदी की गई है। फ्रांस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड जहाँ भी आतंकी हमले हुए हैं, वहाँ-वहाँ कड़े कानून बने। श्रीलंका में तो मस्जिदों में कैमरे लगाने और मुल्लाओं की तकरीर की सीडी पास के थाने में जमा कराने के आदेश हैं। चीन ने उइगर मुसलमानों को आम चीनियों जैसे नागरिक अधिकारों से वंचित कर रखा है। घुसपैठ और शरणार्थी समस्या वैश्विक है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ये बौद्धिक अराजकता और अतिवाद फैलाने वाले तत्वों, जनता द्वारा नकार दिए गए राजनीतिक दलों को कवर फायर नहीं दे रहे? इनकी साजिशों को समझना होगा। हालिया कानून पड़ोसी इस्लामिक मुल्कों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का है। संसद में ये आँकड़े सबने सुने होंगे कि आजादी के समय किस देश में ये कितने प्रतिशत थे,अब घटकर कितने हो गए। दुनिया इन देशों के आचरण से परिचित होती कि यहाँ मानवाधिकारों को कैसे कुचला गया। ये पता नहीं क्यों बाधक बन रहे है।

एक बात स्पष्ट दिखती है कि ये बौद्धिक और उनके पोषक राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए चिंदी-चिंदी हिंदुस्तान चाहते हैं। यह खुली जानकारी है कि सीमावर्ती प्रदेशों में आजादी के बाद से अब तक किस तरह डेमोग्राफिक जियाग्रफी बदली है। अखंड भारत जिस तरह खंड-खंड हुआ, उसके पीछे के तर्कों व तथ्यों पर जाइये तो पता चलेगा कि जहां हिंदू घटा वहीं देश बँटा।

सीमावर्ती प्रदेशों में पेट्रोडालर और यूरोडालर का खेल चल रहा है। ये डालर दोहरी नागरिकता वाले उन बुद्धिजीवियों के एनजीओ में खपता है। मिशनरीज अपना काम कर रही हैं। यूपीए सरकार के समय तो इनपर विशेष कृपा रही है। इन बौद्धिकों का एक मिशन वनवासियों और दलितों को भी देश के खिलाफ खड़ा करने का है। ये जेएनयू, जादवपुर, हैदराबाद जैसे विश्वविद्यालयों के छात्रों को अपने शिकार का चारा बना रहे हैं। हाल ही में एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जो कि मूलतः पत्रकार है, ने हिंदू धर्मग्रंथ पर जूता रखकर फोटो प्रसारित की कि यह कानून मनुवादी राज कायम करने के लिए है। इस प्राध्यापक का बाल बाँका तक नहीं हुआ। किसी दूसरे धर्म के ग्रंथ के साथ ऐसा करते तो अब तक शरीर छह इंच कलम हो चुका होता। उन विद्यार्थियों का जरूर बिगड़ गया जिन्होंने इस कृत्य के खिलाफ आवाज उठाई।

इन सबके पीछे एक शातिर गठजोड़ कामकर रहा है। वह हर तरीके से देश को अस्थिर करने में जुटा है, राजनीतिक और सांस्कृतिक आधार पर। 370 के बाद की शांति और तीन तलाक, राममंदिर निर्माण के निर्णय की स्वीकार्यता के बाद से ये बेचैन है कि देश में कुछ हो क्यों नहीं रहा। ये देश में ऐसा ही कुछ करने के लिए पेट्रो और यूरो डालर की पगार पाते है। बुकर, आस्कर, मेग्सेसे जैसे पुरस्कारों के पीछे छुपी अंदरूनी कहानी समझने की कोशिश करिए। एक छोटे से उदाहरण से समझिए। विकट गरीबी में भी
भारतीय नारी के पराक्रम को रेखांकित करने वाली ‘मदर इंडिया’ को आस्कर नहीं मिलता लेकिन देश के भीतर झोपड़पट्टियों की सड़ांध को चित्रित करने वाली ‘स्लम डाग मिलेनियर’ आस्कर पा जाती है। ये बौद्धिक देश के सांस्कृतिक मोर्चे पर भी युद्धरत हैं। इन कालिनेमियों को समय रहते पहचानिए जो हिंदुस्तान को चिंदियों में करने की ख्वाहिश रखते हैं।

लेखकजयराम शुक्ल

(लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

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