मंडली

चेन रिएक्शन: भाग-1

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दिसम्बर का आखिरी हफ्ता शुरू हो चुका था। समय एक साल और बूढ़ा हो गया … पर मौसम का मिज़ाज़ अबकी कुछ अलग ही था – कंफ्यूज्ड सा, बिल्कुल मेरे जैसा वरना शिमला में अब तक तो अच्छी खासी बर्फ पड़ चुकी होती है।

शिमला में मेरा पाँचवा साल है। चार साल पहले एक टीचर बन के मैं बनारस से आया था। बस तभी से यहीं का होकर रह गया था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था पर पिछले साल से मेरे साथ शुरू हुए घटनाओ और दुर्घटनाओं के ‘चेन-रिएक्शन’ ने सब बदल के रख दिया। मैं इन विंटर वेकेशन में खुद को समेटना चाहता था, जो पूरे घर में टुकड़ो में, हर कोने में बिखरा पड़ा था।

मैं अपने को जोड़ने की कोशिश कर रहा था। अंजान था किसी भी दस्तक से- तभी मेरा  नोकिया 3310 बजा-

“हेलो”

“प्रोफेसर”

“हम्म” – शब्द गले में अटक गये।

“देखो, मैं चंडीगढ़ पहुँच चुकी हूँ। 4-5 घण्टों में शिमला आ जाउँगी। कहीं जाना मत” – आदेश था या निवेदन …पता नही।

“लेकिन, सुनो …”

टूँ… टूँ… लाइन डिसकनेक्ट हो चुकी थी।

“सैंडी”….”उफ़…फिर से पर उसकी आवाज़ को क्या हुआ? इतनी सधी तो नही थी। उसकी आवाज़ ही तो पहचान थी उसकी। उन्मुक्त और स्वछन्द सी, फिर ये ठहराव कहाँ से आया?”

ना चाहते हुए भी, मैं फिर से छन्न से टुकड़ो में टूट कर बिखर चुका था पूरे कमरे में। सिगरेट सुलग चुकी थी, मेरी उँगलियों के बीच।

पिछले साल भी, इसी दिसम्बर, मेरा फ़ोन बजा था। अमेरिका से राय अंकल का फ़ोन था … उनके बिज़नेस पार्टनर की बेटी शिमला आ रही थी … पढ़ने। ऊपर वाला कमरा उसको देना था।

राय अंकल, मेरे पिताजी के बचपन के दोस्त थे। अब अपने बेटों के साथ अमेरिका में शिफ्ट हो गए है, यहाँ के घर का जिम्मा मेरे हवाले कर के। अब आप जो भी समझिये – केयरटेकर या चौकीदार या किरायेदार- सब मैं ही था।

31 दिसम्बर की रात, बर्फबारी हुई थी पर थोड़ी। ठण्ड बढ़ गयी थी। बाहर नये साल का शोर शुरू हो चुका था। मैं पूरे मूड में था, रज़ाई तान के सोने की पर रज़ाई गर्म ही नहीं हो रही थी। फिर, कब आँख लगी पता नहीं।

सुबह ही सुबह डोर बेल से मेरी आँख खुली। मैं बेमन से उठा। ठिठुरते हुए मैंने दरवाज़ा खोला। सोचा था कि जो भी होगा उसको सौ गालियाँ दूँगा। नये साल का गालियों से शुरुआत करूँगा।

दरवाज़ा खुला-

“गुड मॉर्निंग एंड हैप्पी न्यू ईयर मिस्टर सुयोधन”

मेरा मुँह खुला का खुला सा रह गया। मैं कुछ कन्फ्यूज़्ड सा, हैरान सा ठंडा पड़ता गया। दरअसल मुझे आदत नही थी, ऐसी किसी घटना की।

“सेम टू यू, आ….आप कौन?”

“वेल मैं सैंडी…आय मीन सैरन्ध्री। राय अंकल ने बताया होगा” उसने हाथ मिलाने को अपना हाथ बढ़ाया।

“ओह … तो आप ही सैरन्ध्री जी है। हाँ हाँ चाचाजी का फ़ोन आया था..” अभी भी मेरी नज़र उसके चेहरे पर ही जमी थी, कम्बख्त हट ही नहीं रही थीं।

“वेल! अंदर आने को नही कहेंगे?”

“आइये ना प्लीज..” हड़बड़ा के मैंने अपनी गलती सुधारी।

“नाइस रूम, मेरा बेड कहाँ है प्रोफेसर?” अंदर आते ही धमाका किया।

“जी मैं टीचर हूँ, प्रोफेसर नहीं। और आपका कमरा ऊपर है। ये मेरा कमरा है।” एक ही साँस में सारी बात उलट दी।

“टीचर हो या प्रोफेसर कोई फर्क नही पड़ता। दोनों ही पढाते है। क्यों है ना। मैं तुमको प्रोफेसर ही बुलाऊंगी।”

क्या कॉन्फिडेंस था। एक बिंदास हँसी गूँजी।

“जैसी आपकी मर्ज़ी। क्या लेंगी…चाय या कॉफ़ी?”

“कॉफ़ी विथ आउट मिल्क और देखो मुझसे इतनी फॉर्मेलिटी नही होती। मैं तुमको तुम ही बोलूंगी और तुम भी मुझे तुम ही बोलो। ये आप-आप आंटियों जैसा लगता है।”

“ये लीजिये आपकी कॉफ़ी” मैंने कप बढ़ाया। “क्या अभी अमेरिका से आ रही हो?”

“नहीं, नहीं मैं तो माँ के जाने के बाद ही इंडिया आ गयी थी- अगस्त में। तब से दादी के पास गुजरात में ही थी। फ़ॉर योर इनफार्मेशन, मैं बता दूँ कि मेरी माँ ब्रिटिश थीं और पापा गुजरात से हैं। पापा का डायमंड का बिज़नेस है यूरोप में और राय अंकल के बेटे की पार्टनर शिप है हमारे साथ। मैंने लास्ट ईयर लीडस् यूनिवर्सिटी में अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम में एडमिशन लिया था पर मेरा मन इंडिया आकर पढ़ने का हुआ तो पापा ने यहाँ भेज दिया।”

“अच्छा बहुत अच्छा लगा आपके बारे मे जान के। वैसे मैं बनारस का हूँ,  तीन चार सालों से यहाँ हूँ। अब यहां से कहीं और जाने को मन ही नही करता।” – मैंने भी छोटा सा परिचय दिया।

“सैरन्ध्री, बड़ा ही अच्छा और अलग सा नाम है। सैरन्ध्री यानी द्रौपदी।”

“थैंक्स, पर सुयोधन मतलब?”

“आपसे ही जुड़ा है, हा हा हा..। आप और मैं दोनों महाभारत काल से है। दरअसल, सुयोधन दुर्योधन ही है।”

“फिर तो हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट है।“

वो कह कर मुस्कुरा दी और मैं अन्दर तक हिल गया.. इतनी खूबसूरत मुस्कान मैंने शायद ही कभी देखी थी ..

कैसे महीना गुज़र गया उसको आये। इस बीच मैं काफी हद तक जान गया था उसको पर और भी जानने की कोशिश कर रहा था। बड़ा रहस्य था इस पीढ़ी में, उसी को समझने की कोशिश में था। बमुश्किल आठ-दस सालों का ही तो अंतर था मेरी और उसकी पीढ़ी में। इन आठ दस सालों में ऐसा क्या बदल गया कि इस पीढ़ी का पूरा नज़रिया ही बदल गया। सुना था कि ये पीढ़ी रोमांच और रोमांस के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहती है। अब मैं ये महसूस भी करना चाहता था।

सैरन्ध्री, 23-24 साल की, एक आकर्षक लड़की, बिल्कुल उन्मुक्त, खुले विचारों की, बिंदास। कहीं भी, कुछ भी बोलने वाली। हिंदी में अभी भी अटकती थी। कभी कभी शब्द पकड़ाने पड़ते थे।

एक महीने में, अब तक हम “आप” से “तुम” होते हुए, “तू और तेरी” तक आ गए थे .. अब तक मेरी सोहबत में थोड़ी बहुत हिंदी भी सुधर गयी थी। मैं जितनी बार मैं सोचता कि उसको जान चुका हूँ, वो हर बार मुझे गलत साबित कर देती। हर बार कोई नया धमाका और मेरी सोच तहस नहस।

एक शाम यूँ ही अचानक-

“प्रोफेसर चल आज बीयर- शीयर पीते है।”

“मैं नहीं पीता।”

“बड़ा आउटडेटेड है यार तू। चल ना पीते है। बस हल्का सा सुरूर होगा”- हाथ पकड़ के खींचा उसने।

“नहीं । मैंने आज तक नहीं पी और आज बहुत सारा काम भी निपटाना है स्कूल का।” – मैंने बहाना बना के पीछा छुड़ाना चाहा।

“बिल्कुल लड़कियों जैसा बिहैव कर रहा है तू। चल मेरे रूम पे चल के पीते है और तू घबरा मत, नशे में तेरा रेप करके  एमएमएस बनाने का मेरा कोई इरादा नही। चल आ जा।” – एक बिंदास ठहाका गूँजा।

“कुछ तो शरम करो, लड़की हो कम से कम….” मैंने किसी तरह से खुद को संभाला।

“लड़की होना कोई पाप है क्या? क्या सोच है! तुम्हारे इंडिया में बातें भी जेंडेरली डिस्क्रिमिनटेड हैं। ये बात लड़कियों की, ये बातें लड़कों की। गर्ल्स हॉस्टल की दीवारें तो तुम लोगो का ‘आल टाइम फेवरिट प्लेस’ है बाथरूम करने का। ये तुम लोगों का मेल शौविनिस्म है, और लड़कियों से उम्मीद करते हो कि वो अपनी आँखे बंद कर लें। रब्बिश!”

उस दिन मैं निरुत्तर था।

पहाड़ों पर बारिश का कोई भरोसा नहीं। ना जाने कब शुरू हो जाए। एक दिन अच्छी बारिश हुई। शाम तक मौसम खुल गया था – हम दोनों की तरह कुछ कुछ ।

उसको आये तीन महीने हो चुके थे। शायद अब हम दोनों को एक दूसरे की ‘लत’ लग चुकी थी। सुबह तो दोनों बिज़ी रहते पर शाम हर दिन साथ गुज़रती। इतना समय गुज़ारने के बाद भी एक डर सा लगा रहता उसके टेम्परामेंट को लेकर। बड़ी अंप्रेडिक्टबिल सी थी वो।

एक शाम, स्कैनडल पॉइंट पर यूँ ही खड़े थे।शादियों का सीजन था। पूरे शिमला में नए जोड़े छाये थे। वो ध्यान से नए जोड़ो को देख रही थी। बीयर का कैन हाथ में अटका था। तभी, फिर से बम फूटा-

“प्रोफेसर, आर यू वर्जिन?”

चौंकना लाज़मी था।

“हाँ भई, शादी नहीँ की तो कुँवारा ही तो हुआ।” बात पलटने की कोशिश की।

“मैंने बैचलर या कुँवारा नहीं पूंछा। मैंने पूछा आर यू वर्जिन?” – तल्ख़ी थी आवाज़ में।

“क्या वाहियात बात कर रही हो”, हड़बड़ा गया मैं।

“वाह मिस्टर, तुम लोग हम गर्ल्स को जिस चीज़ से जज करके ‘प्योर’ होने का सर्टिफिकेट देते हो और उसके बारे में लड़की बात भी ना करे। रियली सिक इंडियन माइंडसेट।”

“सैंडी.. हमारा समाज अभी इतना नही खुला कि हम इन पर बात या बहस कर सकें।”, मैंने समझाने की कोशिश की।

“अच्छा प्रोफेसर, प्यार-व्यार किया है कभी या वो भी समाज ने नहीं करने दिया?” , उसने छेड़ा मुझे।

“मुझे लड़कियों में कोई इंट्रेस्ट नही है।”, आँख चुराई मैंने।

“क्यों भला? लड़कियों में इंट्रेस्ट नही है! ओ यार, नॉर्मल तो है ना तू या “गे” है।” -एक ठहाका

“ओ शट अप सैंडी । क्या फ़ालतू का मज़ाक है।”

“नॉर्मल है तो प्यार व्यार भी नहीं किया किसी से?” ज़ोर से बोली-

“किया था, दो बार …पर …” अधूरी छोड़ दी मैंने अपनी बात।

क्रमश:

लेखक – जॉय बनर्जी (@JoyBanny19)

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