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विकास को प्रतिबद्ध स्वत: स्फूर्त मानव श्रृंखला की आस

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दुनिया के विकसित देशों में उनके कौशल और उनके या उनके उपनिवेशों के कच्चे माल व श्रम से औद्योगिक क्रांति हुई। तैयार उत्पाद पूरी दुनिया में बेचकर वे संपन्न बने। विकासशील देश भी अपनी बढ़ती जनसंख्या का भरण पोषण सिर्फ कृषि या परम्परागत व्यापार से नहीं कर सकते थे। उन्होंने भी स्वयं को औद्योगीकरण में झोंक दिया और उन्हें पश्चिमी शैली के औद्योगीकरण की लत लग गयी। पहले विकसित देश उन्हें अपना उत्पाद बेचते थे, अब उत्पाद के साथ-साथ तकनीक और औद्योगिक यंत्र-संयंत्र भी बेचने लगे। पश्चिम की औद्योगिक क्रांति के लगभग सौ साल बाद पर्यावरण को उद्योगों से खतरा होने लगा। तब तक पर्यावरण इतना ढ़ीठ था कि दो परमाणु विस्फोटों सहित दो विश्वयुद्धों के धमाके भी हँसते हुए झेल गया। यह महज संयोग है कि यह खतरा तब आया जब दुनिया में हुई औद्योगिक क्रांति के तहत उपभोक्ता ही निर्माता और विक्रेता बनकर चुनौती देने लगे। औद्योगीकरण के पुराने घाघ फिर भी नहीं माने। आज भी वे उद्योगों की तकनीक और शैली बेच रहे हैं, पर्यावरण चिन्तन और पर्यावरण संरक्षण की अपनी संकल्पना भी।

आज पूरी दुनिया में पर्यावरणवादी उद्योगों को कोस रहे हैं और विकासवादी पर्यावरणवादियों को विकास की राह का रोड़ा मानते हैं। तदर्थ दृष्टिकोण के साथ पूरी दुनिया में औद्योगिक विकास भी हो रहा है और पर्यावरण संरक्षण पर चिन्तन भी। इस तदर्थता के बीच एक स्वस्थ संकेत औद्योगिक सूचकांक में नीचे से टॉप बिहार से उभरता दिख रहा है, जहाँ सरकार ‘जल, जीवन और हरियाली’ पर जन जागृति अभियान चला रही है।

बाढ़ की विभीषिका के बीच बिहार जल संकट से जूझने लगा। यह पता तब चला जब भूगर्भ जलस्तर पाताल की ओर प्रवृत्त दिखा। कोई बदलते जलवायु को कारण बताने लगा, कोई जल संरक्षण बोध की कमी को कोसने लगा। कुछ ऐसे भी निकले जिन्होंने बिहार की बिजली की स्थिति में सुधार और स्वच्छ भारत अभियान के शौचालयों को दोषी ठहरा दिया, इस आधार पर कि आज घर घर में चलते मोटर के कारण सुबह-सवेरे के एक लोटा पानी का काम दस-बारह लीटर पानी से होने लगा है। बहरहाल, सरकार जग गयी और आशा है कि जनता को जागृत कर गुजरेगी।

बिहार में लगभग शून्य औद्योगीकरण के बीच ही पर्यावरण संकट में पड़ गया है। यह मान्यता खतरे में है कि उद्योगों ने पर्यावरण पर सबसे प्रतिकूल असर डाला है। यह भी हो सकता है कि बिहार सरकार ने औद्योगीकरण रणनीति के तहत रोक रखा हो कि पहले पर्यावरण संरक्षण पर जन जागृति कर लें और फिर पर्यावरण और विकास पर एक समग्र और समर्थ नीति के साथ उद्योग लगाने का काम शुरू हो। तब तक बिहारी पूरे देश को धाँगें और देश का विकास सुनिश्चित करते हुए अपना पेट पालें।

‘जल, जीवन, हरियाली’ पर जन जागृति के क्रम में राज्य में विभिन्न स्थानों पर आज मानव श्रृंखलाएँ बनायी जा रही हैं। बिहार सरकार को अपने संसाधनों की सच्ची पहचान है। उसे पता है कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में खलिहर लोग हैं, जिनसे वह मानव श्रृंखला में बनवा रही है। इन खलिहरों का समुचित उपयोग करने के लिए राज्य के सरकारी मानव संसाधन तंत्र का अमला-फमला भी काम पर लगा है। उत्साह में राज्य के एक अधिकारी का ठुमका लगाता वीडियो भी सामने आया है। राज्य के सीमित वित्तीय संसाधनों का एक विरोधाभास यह है कि आज की मानव श्रृंखलाओं को शूट करने के लिए हेलीकॉप्टर्स लगाए गए हैं। सरकार को इसके लिए ताना न दें क्योंकि ऐसे आयोजनों का भव्य होना आवश्यक है। मुख्यमंत्री की नाक का सवाल है, भाई। बस एक ही कसर बची है कि मानव श्रृंखला के पर्यावरण पर किसी संभावित प्रतिकूलता पर भी लगे हाथों अध्ययन हो।

बिहार सरकार नशामुक्ति और अन्य ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर जन-जागरण के लिए भी मानव श्रृंखलाएँ आयोजित करती रही है। नशामुक्ति पर जन जागृति कितनी आयी, यह जाँचने के लिए ही सक्षम लोगों के लिए शराबबंदी के बावजूद शराब के ‘उचित दाम पर होम डिलीवरी’ की सुविधा उपलब्ध है। वैसे भी शराबबंदी के तहत जब्त करके थाने में रखी गयी शराब चूहे पी जाते हैं। साथ ही बिहार में नशामुक्ति के जन-जागरण का एक पैमाना पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में बिहार से बढ़ा एक दिवसीय पर्यटन भी है।

समाज परिवर्तन पर प्रतिरोध करता है और अक्सर नवीन सकारात्मक पहल की आलोचना करता है। नीतिश कुमार के जन जागरण अभियान के आलोचक भी नीतिश पर अपनी छवि चमकाने का आरोप लगा रहे हैं। छवि का पता नहीं पर पिछले चार साल में वह भाजपा को दो बार और राजद को एक बार चमका चुके हैं। दो और एक के क्रमश: तीन और दो हो जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि नीतिश उन विरले राजनेताओं में से हैं जिनके पास यह लग्जरी है कि लेफ्ट-राइट-सेन्टर सब ‘उन पर मरते हैं’। उनके एक इशारे पर नैरेटिव बदल जाता है। उनकी यही विलक्षणता उन्हें ऐसे जन-जागरण अभियान की शक्ति देता है।

बिहार पिछले 1500 दिनों में ढ़ाई कोस भी नहीं चला। नीतिश कुमार शराबबंदी और मानव श्रृंखला से सुशासनी पूजा कर रहे हैं, ध्यान सुविधाजनक गठबंधन से मिलने वाले सत्ता के भूँजा पर है। भाजपा असहज होकर भी गठबंधन बचाने की जुगत में है पर सुशील मोदी अपनी कर्तव्यपरायणता पर खरे उतरते हैं। चच्चा जेल खट रहे हैं, तेजस्वी लोकतंत्र बचा रहे हैं, तेजप्रताप स्वयं की रक्षा में लगे हैं एवं जगतानन्द सिंह और रघुवंश सिंह बचे-खुचे राजद को बचाने के बहाने खुद को प्रासंगिक करने की कोशिश कर रहे हैं। काँग्रेस लालू में लाल देखती है, कभी कभी नीतिश में हरा। पासवान लोजपा को कम और सत्ता के चिराग को प्रज्जवलित करने का जतन अधिक कर रहे हैं। माँझी निबट गये हैं, कुशवाहा लिपट गये हैं। पप्पू जेएनयू बचा रहे हैं और मुकेश साहनी अपने अटपटे नाम वाली पार्टी।

बिहारीपना फिर भी बचा है जो आस को मरने नहीं देता कि क्या पता कभी एक स्वत: स्फूर्त मानव श्रृंखला विकास के सरोकारों के पक्ष में बन पड़े। नहीं बना तो बिहार कहता रहेगा …

बिहार में अबहु ओइसही बहार है                                                                                                काहे कि अबहियो नीतिशे कुमार है

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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