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बिहार चुनावों की पड़ताल-6-जदयू

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पटना इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र रहे नीतीश कुमार भी जेपी आन्दोलन में जेल गये। लालू प्रसाद और रामविलास पासवान 1977 में सांसद बन गये लेकिन नीतीश कुमार 1977 और 1980 में दो बार नालन्दा जिले के कुर्मी बाहुल्य हरनौत विधान सभा चुनाव से ल़ड़े और दोनों बार हार गये। ये हार उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को नहीं हरा सके। इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद काँग्रेस के लिए सहानुभूति लहर के बावजूद 1985 में वह विधायक बन गये। विधायक बनने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

नवंबर 1989 में नीतीश कुमार बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से काँग्रेस के यादव क्षत्रप और ‘शेर-ए-बिहार’ कहे जाने वाले रामलखन सिंह यादव को हरा कर सांसद बने। उन्हें वीपी सिंह की मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री बनाया गया। 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने रामसुन्दर दास, लालू प्रसाद और रघुनाथ झा की लड़ाई में लालू का साथ दिया और लालू मुख्यमंत्री बने। लालू-नीतीश की दोस्ती अगले तीन-चार वर्ष कायम रही लेकिन दोनों का व्यक्तित्व भी अलग है और कार्यशैली भी। दोनों में निभ न सकी। 1994 में नीतीश कुमार जनता दल से अलग हुए और उन्होंने धुरंधर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्णांडीज के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। ऐसा समझा जाता है कि बड़े नेता जॉर्ज को एक पिछड़े चेहरे की आवश्यकता थी और नीतीश को एक राष्ट्रीय छतरी की।

1995 में समता पार्टी ने संयुक्त बिहार की कुल 324 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा। लव-कुश जनाधार से उसे मात्र सात सीटें मिलीं लेकिन असफलता से हारना नीतीश की प्रवृत्ति नहीं थी। उधर लालू प्रसाद पिछड़ों के एकछत्र नेता बनकर उभर चुके थे जिन्हें अल्पसंख्यकों का भी भरपूर समर्थन था। 1995 के अंत में ही जॉर्ज ने भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव लाते हुए समता पार्टी का भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन किया। तब तक भाजपा भारतीय राजनीति में अश्पृश्य थी और उसके सिर्फ दो ही सहयोगी थे – शिव सेना और अकाली दल।

समता-भाजपा गठबंधन में समता पार्टी ने 1996 के लोकसभा चुनावों में 8 सीटें जीतीं और 1998 में 12। 2000 विधानसभा चुनावों में समता को 34 और भाजपा को 67 सीटें मिलीं लेकिन अटल-आडवाणी के आशीर्वाद और गोविन्दाचार्य के तथाकथित फॉर्मूले से नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली किन्तु बहुमत के अभाव में सरकार गिर गयी। नीतीश कुमार केन्द्रीय मंत्री बन गये। समता पार्टी जेडीयू में विलीन हो गयी। 2005 में भी बिहार में त्रिशंकु विधानसभा बनी। लोजपा ने 29 सीटें जीतीं और सत्ता की चाभी लेकर पासवान जी दिल्ली चले गये। केन्द्र की काँग्रेस सरकार ने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। नवंबर 2005 में पुन: हुए चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। तब से वह बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं।

नीतीश कुमार को विरासत में बदहाल बिहार मिला था। नरसंहारों का दौर जारी था। अपहरण उद्योग की शक्ल ले चुका था। बिजली नदारद थी। सड़कों के नाम पर वैसे खेत बचे थे जिन पर कुछ पत्थर फेंक दिए गए हों। बाहुबलियों और नक्सलियों का खौफ चरम पर था। पलायन सिर्फ रोजगार के लिए नहीं बल्कि जान-माल की सुरक्षा के लिए भी हो रहा था। पारिवारिक शादी के लिए शोरूम से गाड़ियाँ जबरदस्ती उठाई जा रही थीं। मनोंरंजक मसखरी के बीच चरवाहा विद्यालय खुल चुके थे और आम विद्यालय चरवाहों के विद्यालय से भी बेहाल हो चुके थे। वेतन और पेंशनभोगी बेहाल थे, अपराधी और सत्ता के पालक-बालक निहाल। कुल मिलाकर चारों तरफ निराशा का माहौल था। देश अपने को बिहार से बेहाथ मान चुका था।

चरम पर पहुँचकर नीचे तो आना ही था। यह प्राकृतिक नियम हो सकता है पर इसे 2005 तक के बिहार के कुशासन पर लागू करना नीतीश कुमार के सुशासन से क्रेडिट छीनने जैसा होगा। सबसे पहला काम कानून व्यवस्था पर हुआ। पुलिस प्रशासन को सबल किया गया। अपराधियों पर सख्ती हुई। लगभग 50 हजार अपराधियों को सजा हुई और दो तीन वर्षों में कानून का राज स्थापित हुआ। टूटी सड़कों पर भी काम शुरू हुआ और आज बिहार में सड़कों का वैसा जाल है जिसकी कल्पना भी 2004 तक नहीं की जा सकती थी। विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियाँ हुईं। अन्य विभागों में भी नियुक्तियाँ हुईं जिससे पंगु बने प्रशासन में दम फूँका जाए। अधिकांश नियुक्तियाँ तदर्थ ही थीं। उधर नीतीश सोशल इंजीनियरिंग से भी लालू और पासवान को कमजोर कर रहे थे। अन्य क्षेत्रों में भी नीतीश सरकार ने ईमानदार प्रयास किए और जनता ने 2010 में उन्हें भारी बहुमत देकर पुरस्कृत भी किया।

दूसरे शासनकाल में नीतीश कुमार ने बिजली पर खूब काम किए। परिणाम सामने है कि आज प्रदेश के हर हिस्से में बाइस से चौबीस घंटे बिजली रहती है। सड़कों और पुलों का निर्माण भी बदस्तूर जारी था। स्कूली बच्चियों को साइकिल देने की योजना भी बहुत अच्छी योजना थी जिसने छात्राओं को स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया। दूसरा कार्यकाल भी ठीक ही चल रहा था। तभी नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण हुआ और वे भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए गए। नाटकीय परिस्थितियों में नीतीश कुमार ने भाजपा से संबंध विच्छेद कर लिया और वे 2014 का चुनाव अपने दम पर लड़े। जदयू को सिर्फ दो सीटें मिलीं। शरद यादव के दबाव में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।

जीतनराम माँझी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर नीतीश कुमार पुन: मुख्यमंत्री बने। 2015 का चुनाव उन्होंने अपने धुर विरोधी राजद के साथ लड़ा और पुन: मुख्यमंत्री बने। वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह के अनुसार नीतीश जी निजी बातचीत में यह कहते हैं कि उन्होंने सुशासन के मुद्दे पर 2014 का चुनाव लड़कर देख लिया। संभवत: यह बयान उनके लालू संग किए गए फॉर्मूला पॉलिटिक्स का डिफेंस है। तीसरे कार्यकाल में शासन-प्रशासन लुंज-पुंज था जो पुन: भाजपा के साथ आकर भी सुधर नहीं पाया। शराबबंदी और मानव शृंखला सबसे प्रमुख मुद्दे बन गये। बिजली और सड़क से आगे की सोचने की जहमत नहीं उठाई गयी। अफसरशाही का बोलबाला हद से बढ़ता गया और घुसखोरी बहुत बढ़ गयी। हालाँकि नीतीश कुमार द्वारा किये गये विकास का एक प्रमुख कारण अफसरशाही को दी गयी खुली छूट ही थी।

नल-जल बहुत महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन उसमें आधे-अधूरे काम हुए और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड सरकार और बिहार के लिए शर्म बने। शिक्षा की स्थिति लालू काल से नीचे नहीं गयी पर उसका स्तर उपर नहीं उठा। लालू द्वारा किये गये संस्थाओं के क्षरण पर थोड़ी बहुत रोक लगी लेकिन संस्थाओं को ठीक नहीं किया जा सका। निवेश के लिए दो-तीन बार सम्मेलन हुए पर ढेले का भी निवेश नहीं हुआ। रोजगार के लिए पलायन जारी रहा। औद्योगीकरण की शुरूआत होना दूर, उसकी बात भी नहीं हुई। जले पर नमक छिड़कते हुए बिहार के लैंड लॉक्ड होने का हास्यास्पद डफेंस दे दिया गया।

इस चुनाव में नीतीश कुमार एनडीए के मुख्यमंत्री उम्मीदवार हैं। आज भी अपने सात निश्चय में वह रोजगार या उद्योग की बात नहीं करते लेकिन अपने काम के नाम पर वोट माँगकर एक सकारात्मकता दिखाते हैं। 15 साल बनाम 15 साल की बात भी करते हैं। कोरोना पर एक उपलब्धि दिखती है। 30 लाख प्रवासियों के बिहार लौटने पर कोरोना का बहुत बड़ा खतरा था पर बिहार कोरोना से सबसे बेहतर निबटने वाले राज्यों में से है।

चुनाव प्रचार में कई बार आपा खो चुके नीतीश कुमार अपनी पुरानी छवि से ठीक उलट दिखते हैं। यह संभवत: साफ दिख रहे एंटी इनकमबेन्सी का दबाव है। ‘जो किए हैं हम ही किए हैं और जो करेंगे हम ही करेंगे’ जैसे बयानों में थोड़ा बहुत अहंकार भी दिखने लगा है।

राजनीतिक रूप से लोजपा नीतीश कुमार के लिए रोड़ा खड़ा कर रही है। कई लोग यह मानते हैं कि यह सब भाजपा की मिलीभगत से हो रहा है, हालाँकि भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया है। यदि वह मुख्यमंत्री बने तो सबसे पहले वह लोजपा से ही निबटेंगे। ‘महादलित’ से वह लोजपा को पहले ही आधा निबटा चुके हैं। तेजस्वी यादव दस लाख नौकरी का वादा करके एक अलग ही नेरेटिव सेट कर रहे हैं ताकि युवाओं को लुभाया जा सके। नीतीश कुमार रोजगार पर बात ही नहीं करना चाहते। वह बिजली, सड़क और कानून व्यवस्था की उपलब्धियाँ गिना रहे हैं और लालू राज का खौफ दिखा रहे हैं। शराबंदी से महिलाओं को जीतने के प्रति वह आश्वस्त हैं।

नीतीश कुमार की उपलब्धियाँ छोटी नहीं हैं लेकिन रोजगार और उद्योग पर उनका कुछ नहीं कर पाना उनके तीसरे कार्यकाल को औसत बना देता है। लोकतंत्र में ऊब और खीझ की भी जगह है। इस कारण 15 साल की सरकार का एंटी इनकमबेन्सी उनके विरूद्ध है। ‘भाजपा है तो भरासा है’ और पोस्टरों पर नीतीश की जगह प्रधानमंत्री का फोटो लगाकर जदयू भी इसे परोक्ष रूप से मान रही है।

एक यक्ष प्रश्न है कि नीतीश नहीं तो आखिर कौन। सामने दिखता चेहरा एक बड़े वर्ग को असहज करता है। चुनाव में मतदाता के निर्णय का एक पैमाना सापेक्षता भी है। साथ ही लोकतंत्र में संख्या बल का अपना महत्व है। बिहार के जाति आधारित सामाजिक ढाँचे में एनडीए संख्या बल में महागठबंधन पर भारी है। यदि आप लोजपा का फैक्टर देखते हैं तो आपको पप्पू यादव और ओवैसी का कोण भी देखना पड़ेगा। ये लोग सीटें 2-4 ही जीतेंगे पर खेल तो बिगाड़ेंगे। बताने की आवश्यकता नहीं कि कौन किसका खोल बिगाड़ेगा।

एंटी इनकमबेन्सी के बावजूद एनडीए को बहुमत मिलने की संभवना है, जीत भले ही 2010 जैसी न हो। इस स्थिति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनेंगे पर पाँच साल की गारंटी नहीं होगी। महागठबंधन को बहुमत मिलने की संभावना क्षीण है। कुछ उल्टा-पुल्ट हुआ तो बिहार में महाराष्ट्र जैसी स्थिति भी हो सकती है क्योंकि नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में से हैं जिनके दोनों हाथों में लड्डू है और इस बार तो भोजपा के लोजपा फैक्टर का पईंचा भी नीतीश कुमार पर ड्यू है।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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