मंडली

बिहार चुनावों की पड़ताल-2-लोजपा फैक्टर

शेयर करें

1969 मे मेरा DSP मे और MLA दोनो मे एक साथ चयन हुआ।तब मेरे एक मित्र ने पूछा कि बताओ Govt बनना है या Servant ? बस तभी मैंने राजनीति ज्वाइन कर ली।

ये शब्द रामविलास पासवान के 26 मार्च 2016 का एक ट्वीट हैं। प्रसंग 1969 का है जब वह खगड़िया जिले की अलौली विधान सभा सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता मिसरी सदा को हराकर बिहार विधानसभा पहुँचे थे। इस प्रसंग की यहाँ चर्चा करने का उद्देश्य सिर्फ यह बताना है कि बिहार की राजनीति में उनकी पीढ़ी के तीन अन्य शिखर नेताओं (लालू, नीतिश और सुशील मोदी) में राजनीतिक रूप से सबसे वरिष्ठ पासवान जी ही हैं। लालू जी जनता लहर में 1977 में पहली बार संसद पहुँचे। तब वह भी हाजीपुर से विश्व रिकॉर्ड बनाकर लोकसभा के लिए चुने गये थे। नीतिश कुमार के माथे ऐसा बहुत बाद में चढ़ा, मोदी के सबसे बाद में।

पासवान जी अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में हैं। काँशीराम का बामसेफ बसपा तक पहुँचकर बहुत कुछ कर गुजरा लेकिन उनकी दलित सेना लोजपा ही बन सकी जो पूरे कुनबे को विधायक और सांसद बना तो लेती है लेकिन वहाँ से आगे नहीं बढ़ सकी। पासवान जी का राष्ट्रीय कद कभी वैसा नहीं रहा जिससे वह प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखें। हाँ, हाजीपुर में हारकर 1985 में वह बिजनौर, उप्र सुरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ने गये थे जहाँ काँग्रेस की मीरा कुमार ने उन्हें पराजित किया। उस चुनाव में तब 27 वर्ष की रहीं सुश्री मायावती भी एक उम्मीदवार थीं और तीसरे स्थान पर रही थीं। राजनीति में पासवान जी ने लगभग सब कुछ पा लिया। शायद एक इच्छा दमित रह गयी – बिहार का मुख्यमंत्री बनना। पुत्र से उस महत्वाकांक्षा को पूरा करने की लालसा स्वाभाविक है।

लोजपा में वंशवाद है पर वह राजद से अधिक स्वस्थ है। राजद में हम दो हमारे नौ चलता है जबकि लोजपा संयुक्त परिवार को बढ़ावा देता है। तीनों भाईयों का भरा-पूरा परिवार लोजपा में आराम से चल रहा है। संयुक्त परिवार के भरण-पोषण के मामले में सपा लोजपा से मुकाबला कर सकती है। राजद तो साधू-सुभाष को भी नहीं सह सकी। काँग्रेस मेनका गाँधी को भी नहीं रख सकी और उन्हें जनता दल और भाजपा में जाना पड़ा।

चिराग पासवान के राजनीति में आते ही वह सांसद बने और पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी। बाद में वह राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये गये। पासवान जी ने सफाई दी थी, “बरगद के पेड़ के नीचे यह पनप नहीं पाएगा। इसलिए इसे जिम्मेदारी दी है।“ आज चिराग पासवान बहुत बड़ा राजनीतिक स्टंट कर रहे हैं लेकिन बीमार पासवान जी उनके साथ हैं। उनका ट्वीट है – मैं हर फैसले में चिराग के साथ हूँ।

बिहार विधानसभा चुनावों को रोचक और जटिल बनाने के लिए लोगों को चिराग को धन्यवाद कहना चाहिए। चुनाव विश्लेषकों और विशेषज्ञों का काम आसान नहीं होने वाला। चुनाव के बाद भी स्थिति रोचक हो सकती है। यह डायलाग कभी भी आ सकता है – पिक्चर अभी बाकी है दोस्त। तेजस्वी यादव और राजद के लिए तो यह डूबते को तिनके का सहारा जैसा है। हालाँकि यदि चिराग थोड़े भी सफल रहे तो कालांतर में वह तेजस्वी को ही चुनौती देंगे, नीतिश कुमार से उनकी प्रतिद्वंदिता तात्कालिक है।

कई लोगों का मानना है कि चिराग भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं और भाजपा ऐसा नीतिश को कमजोर करने के लिए कर रही है। हालाँकि कल गठबंधन की सीटों के समझौते की घोषणा करते हुए भाजपा ने इसका पूरी तरह से खंडन किया लेकिन कौन नहीं जानता कि राजनीति में खंडन भी पुष्टि का एक रूप होता है। राजनीति में भावना कभी भी मार दी जा सकती है पर संभावना अमर होती है।

उपरोक्त संभावना का प्रापण करने वाले यह मानते हैं कि लोजपा में अनेक लोग ऐसे लड़ाए जाएँगे जिन्हें भाजपा चाहेगी। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह का लोजपा में जाना ऐसा ही कुछ कहता है। कहा जा रहा है कि उनकी दिनारा सीट जदयू के कोटे में चली गयी है। वैसे लोजपा की कार्यशैली और संगठन के आलोक में यह पक्का कहा जा सकता है कि यदि वह सच में 143 सीटों पर लड़ी तो कम से कम दर्जन भर लोग पासवान जी के कुनबे के होंगे। शेष सीटों पर अधिकांश उम्मीदवार वे होंगे जो भाजपा, राजद और काँग्रेस में टिकट से वंचित रह जाएँगे।

भाजपा का उद्देश्य यह हो सकता है कि लोजपा जदयू को अधिक से अधिक सीटों पर नुकसान पहुँचाए और कुछ सीटें जीते भी। ऐसा माना जा रहा है कि बराबर सीटों पर लड़ते हुए भाजपा और जदयू में भाजपा का स्ट्राइक रेट बेहतर होगा। जदयू पर एंटी-इनकमबेन्सी अधिक है और नीतिश कुमार की लोकप्रियता भी घटी है। भाजपा नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता भुनाएगी। यदि सच में यह मिलीभगत है और सफल रहती है तो चुनाव के बाद कुछ भी हो सकता है। जैसे भाजपा का मुख्यमंत्री हो और लोजपा साथ आए। घटत-बढ़त के लिए हाथ-पैर मारे जाएँ। ऐसा न भी हो तो संख्या बल के आधार पर नीतिश पर केन्द्र चलने के लिए दबाव बनाया जाए ताकि बिहार में भाजपा का नेतृत्व हो।

यदि लोजपा-भाजपा के संभावित स्टंट में संतुलन बिगड़ा तो यह भी हो सकता है कि नीतिश कुमार फिर राजद के साथ चले जाएँ और सरकार महागठबंधन की बन जाए। तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बनकर भी संतुष्ट होंगे। यह सही है कि लालू की अनुपस्थिति में राजद दिशाहीन है पर उसकी स्थिति 2010 जैसी नहीं होने वाली। एनडीए में भ्रम की कोई स्थिति या भाजपा-जदयू के बीच अविश्वास या अविश्वास की अफवाह भी राजद के पक्ष में जाएगी।

लोजपा की नीतिश कुमार से खुन्नस 2004 से ही है जब उसे 30 सीटें मिली थीं। विधानसभा त्रिशंकु थी। पासवान जी लालू को अति भ्रष्ट के नाम पर नेता मानने को तैयार नहीं थे, न ही वह नीतिश को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे। सत्ता की चाभी लेकर वह दिल्ली चले गये। 30 में से 12 विधायक नीतिश के पक्ष में आ गये लेकिन एनडीए की सरकार बनने से पहले राज्यपाल बूटा सिंह ने राष्ट्रपति शासन लगवा दिया। दुबारा चुनाव होने पर एनडीए की सरकार आराम से बन गयी।

रामविलास पासवान कभी दलित नेता थे। वैसे दलित राजनीति कभी भी बिहार में उतनी असरदार नहीं रही, बाबू जगजीवन राम के जमाने में भी। शायद इसलिए कि दलित राजनीति टकराव से होती है। बाबू जगजीवन राम बहुत बड़े नेता थे पर टकराव उनके चरित्र में नहीं था। पासवान जी अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं निकलते। मुख्यमंत्री बनकर नीतिश कुमार ने अनेक सोशल इंजीनियरिंग किए। उनमें से एक था – महादलित की संकल्पना गढ़ना। इस कदम ने लोजपा को बहुत कमजोर किया। दलितों की जगह वह पासवानों की पार्टी बन गयी। बाद में महादलित कोटे से जीतनराम माँझी परिदृश्य में आ गये। यह महज संयोग नहीं है कि नीतिश की कृपा से मुख्यमंत्री बनकर जदयू से बाहर जाने वाले माँझी आज जदयू के साथ खड़े हैं। यह नीतिश कुमार के लोजपा प्रबंधन का हिस्सा है।

सरकार के सात निश्चय और अन्य मुद्दों पर चिराग का नीतिश विरोध भी अधिक दमदार नहीं लगता क्योंकि सरकार में भाजपा भी शामिल है और चिराग भाजपा पर नरम हैं। चिराग सैद्धांतिक मतभेद की बात भी कर रहे हैं लेकिन भारतीय राजनीति में सिद्धांतो की कितनी जगह शेष है। रही बात लोजपा की तो उसके पास बोरा भर सिद्धांत हैं और जदयू के पास झोरा भर।

एक अंतिम संभावना यह भी हो सकती है कि लोजपा की भाजपा से कोई मिलीभगत नहीं हो। वह सच में अकेले चुनाव लड़ना चाहती हो। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के कारण और कैबिनेट में बने रहने के लिए प्रधानमंत्री का नाम जप रही हो। संभवत: यह नीतिश कुमार का अंतिम चुनाव है, भाजपा अब तक कोई नेता स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं कर पायी है। हो सकता है कि चिराग भविष्य की या अगले चुनाव की राजनीति कर रहे हों। यह चुनाव अकेले लड़कर वह पानी थाहना चाहते हों। पानी थाहने के क्रम में डूबने का खतरा भी है। अगले चुनाव तक गंगा में बहुत पानी बह जाएगा। यदि यह संभावना ठीक है तो यह लोजपा के चरित्र के विरूद्ध है क्योंकि लोजपा और पासवान जी कभी अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं निकलते। इस स्थिति में बहुत कुछ दाँव पर लग सकता है। उसे एनडीए में जगह और केन्द्रीय कैबिनेट का बर्थ भी गँवाना पड़ सकता है।

जोखिम कोई तो ले ही रहा है – लोजपा या लोजपा और भाजपा दोनों। चुनाव के बाद आए अंकों पर निर्भर करेगा लेकिन संभावना सबकी बन सकती है, कम या अधिक। नीतिश कुमार के राजनीतिक चातुर्य को कभी कमतर नहीं आँका जा सकता। वह ऐसे ही लगभग 15 वर्ष से बिहार के मुख्यमंत्री बने नहीं बैठे हैं जबकि आधार वोट में भाजपा और राजद दोनों जदयू से मजबूत हैं। नीतिश कुमार ने कोई जोखिम नहीं लिया लेकिन अपने लिए नयी संभावनाएँ गढ़ने और दूसरे के लिए संभावना बनाने की क्षमता तो उनमें है ही।

#लोजपा #बिहार_चुनाव

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

2 thoughts on “बिहार चुनावों की पड़ताल-2-लोजपा फैक्टर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *