मंडली

भूत की व्यथा

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दृश्य 1:- 

अरे … अरे … मैं अचानक से आसमान में क्यों आ गया? अरे, मैं तो नीचे गिर रहा हूँ। हे प्रभु! मैं तो बस छत पर खड़ा था। मैं कब कूद गया? झटके के साथ मेरी नींद खुल गयी। उफ्फ! काफी बुरा सपना था। उठ कर बाहर घूम आता हूँ, सुट्टा मार लेता हूँ। अरे, अब मैं इतना हल्का हो गया,  एकदम रुई जैसा हल्का महसूस हो रहा है। मैं चल रहा हूँ या हवा में तैर रहा हूँ?

ये नीचे कौन?

हे भगवान! ये तो मैं हूँ।

पर अगर वो मैं हूँ तो ये कौन है?

क्या वो सपना नहीं था ?

क्या वास्तव में मैं मर गया?

दृश्य 2 :-

खट खट…खट खट

अरे दादा दरवाजा खोलो। कब से आवाज़ लगा रहा हूँ, सुनते क्यों नहीं?

मैं – जल्दी से दरवाजा खोलता हूँ। शायद ये लोग कुछ कर सकें।

अरे ये क्या … ये सिटकनी मेरे हाथ मे क्यों नही आ रही? कैसे दरवाजा खोलूँ?

धड़ाक …

भाई – दादा उठो (हिलाते हुए)। दादा उठो ना (झिंझोड़ते हुए)। माँ, देखो दादा उठ नहीं रहा। पापा जल्दी आइए। देखिये दादा को क्या हो गया, इसके मुँह से झाग सा निकल रहा है।

पापा- अरे जल्दी कोई डॉक्टर को बुलाओ। लगता है इसने कुछ खा लिया।

माँ- जल्दी बुलाओ। देखो मेरे बच्चे ने क्या कर लिया।

चाचा जी – (नब्ज टटोलते हुए) भैया …. ये गया …

पापा – (अविश्वास से) क्या? क्या कहा तुमने?

चाचा – (बेहद दुखी स्वर में) भैया, अब ये नहीं रहा।

मा – (रोते हुए) नहीं भैया, ठीक से देखो ना। ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा नहीं कर सकता मेरा बच्चा।

भाई – (रूँधे गले से) चाचा सही कह रहे है माँ। दादा हमे छोड़ कर चला गया।

दृश्य 3 :-

मैं – यार तुमलोग तो दोस्त हो। कम से कम तुम तो सुनो देखो मुझे। क्या बाकी सब की तरह तुम्हे भी मैं नही दिख रहा? क्या यहाँ कोई है जो मुझे देख सुन सकता है?

दोस्त (आपस मे बात करते हुए) – यार, ये इसने क्या किया? ठीक है 2 दिन परेशान था पर क्या इतना कि बचपन के दोस्तो को भी नहीं बताया। हाँ, परसों शाम को इसका कॉल आया था पर मैं बच्चे को डॉक्टर के यहाँ दिखाने ले गया था। मैं कॉल करने को कह कर भूल गया। काश, कॉल कर लेता तो आज शाम को हम तीन फिर साथ बैठे होते। काश एक बार तो …

दृश्य 4:-

कुछ देर बाद श्मशान में

उफ्फ! ये लोग मुझे जला रहे हैं। कितनी गर्मी लग रही मुझे। थोड़ा पानी पी लेता हूँ, गला सूख रहा है। अरे ये क्या… ये पानी मेरे अंदर क्यों नही जा रहा? ये तो आर-पार हुआ जा रहा है।

मुझे जोर से प्यास लगी है। मेरी प्यास कैसे बुझेगी अब? बहुत गर्मी लग रही है अब। घर जाता हूँ। नीचे वाला कमरा ठंडा रहता है, कुछ देर वही बैठूँगा।

दृश्य 5:-

घर पर

माँ – (सुबकते हुए) हाय मेरे बच्चे ये तूने क्यो किया? तुझे बस मेरे ताने सुनाई दिए पर मेरा प्यार न दिखा। भूल गया जब तू बीमार पड़ा तो मै रात रात भर जागती थी। तू  एक बार तो मेरी गोद में सर रख कर अपनी बात कहता, पर तूने तो …

पिता जी – (मन में) बेटा एक बार वापिस आ जा। फिर कभी तुझे नहीं डाटूँगा। इतना परेशान था तो एक बार मेरे गले लग कर मुझसे कहा तो होता। बचपन में जब तू रोता था तो तुझे मैं गोद में ले कर चुप कराया करता था। ठीक है तू बड़ा हो गया था, पर इतना बड़ा कब हो गया रे कि छोड़ कर ही चला गया। एक बार तो …

भाई – दादा, प्लीज़ वापस आ जाओ। दादा, अब मैं किसको अपनी बात कहूँगा? एक तुम ही तो थे जिस पर मेरा पूर्ण अधिकार था। दादा, तुम तो जानते थे न कि मेरी हँसने की आदत है। साथ मे हम कितना हँसते थे पर जाने कब तुम्हे बुरा लग गया। सॉरी दादा, वापस आ जाओ ना…

मैं – ये मैंने क्या कर लिया? मैंने तो सोचा था कि मेरे जाने से किसी को कोई दुख नही होगा। किसी को मेरी फिक्र नहीं, कोई नही रोयेगा। अभी कल ही तो नौकरी छूट जाने पर पिता जी डाँट रहे थे। माँ ताने मार रही थी और भाई मुझे देख कर हँस रहा था। मुझे तो वो सच लगा था। तो फिर क्या ये आँसू झूठे है जो अभी सबकी आँखों में हैं?

मैं – अरे माँ मत रो। मैं यही हूँ। देख तेरे सामने खड़ा हूँ। मैं माँ को छू क्यों नहीं पा रहा। माँ, मुझे सुन ना माँ। क्या तुझे मेरी आवाज नहीं सुनाई दे रही? पापा, तुम तो देखो मुझे … ये क्या हो रहा है? मैं यहाँ होकर भी सबके लिए नही हूँ अब?

सब तो थे मेरे पास। मैं क्यों किसी तक नहीं पहुँच पाया? काश, मैंने अमित को फिर कॉल कर लिया होता। काश घर पर बात की होती, काश मैंने किसी से तो एक बार बात की होती …

काश काश काश …

ये मैंने क्या कर लिया? अब अनुभूति होगी पर उनकी अभिव्यक्ति नहीं। भाव भी होंगे पर व्यक्त होने के अभाव से व्यर्थ होंगे। सबके मन में मेरी यादें होंगी जिन पर धीरे-धीरे विस्मृति की मोटी परत चढ़ जाएगी। बस अब ऐसे ही सब को देखते सुनते रहना है। अब मुझे मेरे अपने कभी देख सुन नही पाएंगे क्योंकि अब मैं भूत हूँ।

लेखक – अनभिज्ञ (@OldModelBullet)

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