भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: तीन – मंडली
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भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: तीन

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गतांक से आगे

1990 के दशक में आ रहे तथाकथित लोकगीतों के भोजपुरी कसेट्स और वीडियो एलबम में अधिकांश की सामग्री अश्लील थी, यहाँ तक की एलबम और कसेट्स के नाम ही फूहड़ होते थे। अच्छा और श्लील गाने वालों की आवाज दब गयी। गाछ के कवनो एगो आम ना बाग के बाग कुलवांसी होखे लागल*। उधर भोजपुरिया जगत में मंडल ने समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया था। भोजपुरी फिल्में अव्वल तो बन नहीं रही थीं और यदि बनतीं भी तो मौजूदा कानून-व्यवस्था के आलोक में भोजपुरी फिल्मों के असली दर्शक मइया-बहिनी उन्हें देखने नहीं जाते। भोजपुरी लोकगीत और उनके वीडियो फूहड़ मनोंरंजन का पर्याय बन चुके थे। ‘लूट में चरखा नफा’ की तर्ज पर इसने एक दर्शक वर्ग अवश्य बना लिया, जिन्हें ध्यान में रखकर भोजपुरी सिनेमा के तीसरे अध्याय की फिल्में बनीं और व्यवसायिक सफलता की बुलन्दियों पर पहुँचीं।

भोजपुरी सिनेमा में लगभग दस वर्षों से सुतल भगत का नाच ** चल रहा था। लंबी रात की सुबह हुई और पटल पर अवतरित हुए दो भोजपुरिया सितारे – मनोज तिवारी एवं रवि किशन। ‘ससुरा बड़ा पईसा वाला’, ‘सईयां हमार’ और ‘पंडिजी बताईं ना बियाह कब होई’ जैसी अनेक फिल्में व्यवसायिक रुप से सफल रहीं। इसने भोजपुरी फिल्मों का तीसरा अध्याय 2001-02 में आरम्भ किया जो अब तक जारी है।

आज भोजपुरी सिनेमा 2000 करोड़ का एक स्थापित उद्योग है। हर साल दर्जनों फिल्में बन रही हैं। रवि किशन की मानें तो इससे 50,000 घरों के चूल्हे जलते हैं। बँसवारी और खरिहानी में होने वाली भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग लंदन और मारीशस में होने लगी है। दो भोजपुरी फिल्म स्टार भारत की संसद में हैं, तीसरे जाते-जाते रह गये। कई भोजपुरी स्टार प्रसिद्ध टीवी शो ‘बिग बॉस’ में जा चुके हैं। भोजपुरी स्टार नेशनल टीवी शो में बुलाए जाते हैं। यह बात अलग है कि शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए कपिल शर्मा उन्हें बुलाते हैं तथा ‘आम का आम और गुठली के दाम’ के तहत उन स्टार्स की सॉफ्ट बेइज्जती भी करते हैं।

मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव, खेसारीलाल यादव, पवन सिंह जैसे अभिनेता हैं तो रानी चटर्जी, टिंकू घोष, श्वेता तिवारी और भाग्यश्री से लेकर पाखी हेगड़े, अक्षरा सिंह, आम्रपाली दुबे और काजल राघवानी जैसी अभिनेत्रियाँ हैं और संभावना सेठ जैसी आइटम गर्ल। मनोज तिवारी मखमली आवाज वाले भोजपुरिया उदित नारायण हैं जिन्होंने भोजपुरी लोक गायन की अच्छी सेवा की है। वह भोजपुरी फिल्मों की भी सेवा कर रहे हैं, देश सेवा भी। रवि किशन मँझे हुए अभिनेता हैं, तभी तो वह हिन्दी सहित अन्य भाषाओं की फिल्मों में धाक जमाते हैं और अब संसद में भी छाप छोड़ रहे हैं। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ की अपनी छवि के आस-पास ही खड़े हैं। खेसारी लोक गायक और नर्तक पहले हैं, अभिनेता बाद में। पवन सिंह गायक अच्छे हैं या अभिनेता, कहना मुश्किल है।

इन सितारों ने भोजपुरी सिनेमा को बस जीवित रखा है। भोजपुरी फिल्मों का सिर्फ फैलाव हुआ है, उँचाई नहीं बढ़ी। उल्टा यह पहले से बौना हुआ है और अपने बौनेपन से वह भोजपुरी, भोजपुरिया मानस और उसकी प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ रहा है। फिल्में कौन सी बनीं, इसकी चर्चा कैसे करूँ? कौन से गाने रखूँ, यह भी समझ से परे है। फिल्मों के नाम भी ढ़ंग के रख लेते तो शाबाशी दी जाती। समझना मुश्किल होता है कि इन फिल्मों में किस गोला की भोजपुरी बोली जा रही है, किस लोक संस्कृति की बात हो रही है। कला और मनोंरंजन के नाम पर हरवाही में कीर्तन हो रहा है। कोई पूछे इनसे कि गीत लिखे जा रहे हैं या शब्दों का चीरहरण हो रहा है, संगीत बन रहा है या म्यूजिकल पॉर्न।

आइए, भोजपुरी सिनेमा के तीसरे अध्याय के कुछ गीत देख लें।

https://www.youtube.com/watch?v=tx0Dml5zdCU

भोजपुरी फिल्मों की दुर्दशा के क्रम में एक पोएटिक जस्टिस जाने-अनजाने हुआ है। भोजपुरिया लोग देश भर में रोजगार के लिए जातें और रोजगार पाते हैं। बदला चुकाते हुए भोजपुरी फिल्म उद्योग ने ऐसे अवसर पैदा किए हैं कि देश भर की फिल्मों का स्क्रैप भोजपुरी फिल्मों में आराम से खपाया जा रहा है। बड़े बड़े नाम छोटे काम के साथ भोजपुरी में खिंचे चले आते हैं, कम लागत और अधिक मुनाफा देखकर।

अन्हर कोठरी में एगो दीया दिख गया*** – ‘देसवा’। इस बेजोड़ भोजपुरी फिल्म के निर्माता थे नीतिन चन्द्रा और नीतू चन्द्रा एवं निर्देशक थे नितिन चन्द्रा। मुख्य भूमिकाओं में कांति प्रकाश झा, दीपक सिंह, अजय कुमार, आरती पुरी, पंकज झा और आशीष विद्यार्थी थे। ‘देसवा’ के लिए चंपारण टॉकीज पूरे भोजपुरिया समाज का सल्यूट डिजर्व करता है।

‘देसवा’ बिहार के उस कालखंड का सजीव सिनेमाई चित्रण है जिसमें पूरा देश बिहार से हाथ धो चुका था। आधुनिकता का पुट है, बिना फूहड़ हुए। प्रस्तुति और शैली लाजबाब है। ठेंठ भोजपुरी ऐसी कि आरा, बलिया, छपरा और बक्सर में आप कहीं भी सुन लें। ‘देसवा’ देखकर तीसरे अध्याय की अनेक फिल्मों से स्वयं को दिए गए टॉर्चर का मेरा दर्द कम हो गया। दुर्भाग्य यह है कि इस फिल्म को डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिल रहे थे। इससे यही लगा कि भोजपुरिया समाज वही फिल्में डिजर्व करता है जो इसे आज परोसी जा रही हैं। बहरहाल, ‘देसवा’ 2011 में प्रदर्शित हुई लेकिन उसका व्यवसायिक प्रदर्शन ऐसा रहा कि दुबारा ऐसी भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए चन्द्रा बंधुओं को जाँबाज बनना पड़ेगा। यह फिल्म देखकर यह प्रश्न उठा कि भोजपुरिया कथानक पर हिन्दी फिल्में बनाने वाले बड़े फिल्मकार प्रकाश झा ने कभी भोजपुरी फिल्मों की सुध क्यों नहीं ली।

इस फिल्म के संगीतकार थे आशुतोष सिंह और फिल्म के गीत गाये सोनू निगम, श्रेया घोषाल, भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा, सुनिधि चौहान और मिका ने।

बिहार कोकिला शारदा सिन्हा का करुणा से ओत-प्रोत माधुर्य … लेके आईल सवेरवा …

नीतू चन्द्रा पर फिल्माया गया यह आइटम नंबर … सईंया मिले लरकईंया में …

बिना फूहड़ हुए फिल्म के संगीत को आधुनिक बनाने की कोशिश भी हुई, मिका के इस रैप से …

तीसरे अध्याय में भोजपुरी सिनेमा की चाल थोड़ी अलग थी। दर्शकों का टार्गेट वर्ग मइया-बहिनी से बदलकर वह वर्ग हो गया था जिसे फूहड़ भोजपुरी एलबम की लत लग चुकी थी। कच्ची उम्र के दर्शक भी शिकार हुए जिन्हें अच्छे-बुरे के पहचान की समझ नहीं थी। बहरहाल, भोजपुरी सिनेमा ने वह रफ्तार पकड़ी कि पिछले बीस सालों से वह रुकने का नाम नहीं ले रही। अत्यधिक रफ्तार कहें या आधुनिकता से कदमताल पर भोजपुरी सिनेमा ‘साठा का पाठा’ हो चुका है लेकिन वह बचकानी हरकतें कर रहा है। इस प्रौढ़ अवस्था में बचकानी हरकतों का कोढ़ है एवं फूहड़ता और अश्लीलता का खाज। कुणाल सिंह दुखी होकर कहते हैं कि कुछ साल में भोजपुरी सिनेमा एक और मृत्यु को प्राप्त होगा लेकिन भोजपुरी सिनेमा इतिहास पर पुस्तक लिखने वाले मनोज भावुक उनसे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि विकृति चाहे जितनी बढ़े पर भोजपुरी सिनेमा जहाँ है, वहाँ से बंद नहीं होगा।

भोजपुरी सिनेमा की दशा को दुर्दशा कहना अन्डरस्टेटमेंट होगा। उसकी दिशा कतई उत्साहवर्द्धक नहीं दिखती। भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरिया समाज और संस्कृति के चित्रण के बेसिक पर वापस आना होगा। फूहड़ता और अश्लीलता के दीमक को तिलांजलि देनी होगी और स्वस्थ प्रयोगधर्मिता को अपनाना होगा। भोजपुरिया मानस का प्रदूषण रोकने के लिए एक बड़े जन जागृति की अवश्यकता है। बड़े फिल्मी नाम जैसे शत्रुघ्न सिन्हा, मनोज वाजपेयी, प्रकाश झा आदि भोजपुरी सिनेमा के लिए कुछ करें। मनोज तिवारी और रवि किशन बड़े स्टार हैं और अब सांसद भी। अब भोजपुरी मनोरंजन उद्योग के स्वास्थ्य और गुणवत्ता पर उनके कुछ कर गुजरने का समय है। दो बड़े प्रदेशों में भोजपुरिया आबादी बहुत बड़ी संख्या में है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ये सरकारें भोजपुरी सिनेमा की फूहड़ता समाप्त करने और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कुछ करें?

अंत में एक कहानी सुनिए। एक गरीब परिवार था। खाने के लाले पड़ते थे पर संस्कारों की थाती के साथ पूरा परिवार खुशी खुशी जीवन यापन करता था। कुछ दिनों बाद परिवार ने शराब का व्यापार किया और खूब पैसे बनाए। व्यापार से पैसे बनाने के क्रम में संस्कारों की थाती गुम हो गयी। परिवार संपन्न हुआ पर घर में डोमघाउच होने लगा, बात-बेबात गारी गुत्ता भी। भोजपुरी सिनेमा इसी संपन्नता की गिरफ्त में है – लंगई में नयका धनिक पछुआ में लालटेन टँगले बा**** गरीबी को ठोकर मारकर परिश्रम से संपन्न बनना पुरुषार्थ है लेकिन संस्कार गंवाकर धनाढ्य होने से अच्छा है दरिद्रता की चादर लपेटे रहना – सैयद गरीब हो जइहन तs तरकारी ना बेचे लगिहन *****

(समाप्त)

लेख में प्रयुक्त भोजपुरी मुहावरों के अर्थ

* पेड़ का एक आम नहीं बल्कि सारे बगीचे ही प्रदूषित हो रहे थे

** सन्नाटा छाना

***  अँधेरे में आस की किरण दिखना

**** नव धनाढ्य द्वारा धन का भौंडा प्रदर्शन करना

***** कुलीन लोग विपन्नता में भी छोटा काम नहीं करते

भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: दो का लिंकhttp://mandli.in/post/bhojpuri-cinema-ke-teen-adhyay-do

भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: एक का लिंकhttp://mandli.in/post/bhojpuri-cinema-ke-teen-adhyay-ek

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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