मंडली

भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: एक

शेयर करें

भोजपुरी सिनेमा की दशा और दिशा के पड़ताल पर यह श्रृंखलाबद्ध लेख लिखते हुए एक दावात्याग देना आवश्यक है, वरना कई लोगों के अकारण ही ‘आंगिल-बिछिल’ होने का खतरा है। मैं ठेंठ भोजपुरिया हूँ, लेकिन भोजपुरी के उन दो ध्रुवों के बीच खड़ा हूँ जो कथित रुप से आधुनिक होकर या भाषायी हीनता में भोजपुरी का त्याग कर चुके हैं और जो भोजपुरिया अस्मिता में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की माँग पर पर खूँटा गाड़े बैठे हैं।

मैं भोजपुरी में सपनाता हूँ, हिन्दी में बतियाता हूँ और अँग्रेजी से जीविका कमाता हूँ। मैंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मेरी अगली पीढ़ी चाहे अँग्रेजी, फ्रेंच या कोई और भाषा सीखे पर बिना हीन भाव के भोजपुरी भी बोलेगी। मैं यह मानता हूँ कि अँग्रेजी मजबूरी है, हिन्दी बहुत जरुरी है और भोजपुरी संवाद की धुरी है, बाद बाकी दूर-दफ्फे जाए सरकारी मान्यता। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि मैं कोई इतिहासकार नहीं हूँ। भोजपुरी प्रेम में लिखे इस लेख में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हो सकती हैं। ध्यान आकृष्ट कराने पर उनका संज्ञान लिया जाएगा, खेद व्यक्त किया जाएगा और तदनुसार परिमार्जन कर दिया जाएगा।

ईंट पर चढ़कर उँचा बनने वाले कुछ लोग भोजपुरी फिल्म के इतिहास का आरम्भ ‘इन्द्रसभा’ नामक एक हिन्दी फिल्म से मानते हैं, जिसके कुल 71 गानों में से 2 भोजपुरी में थे। यह ‘आलम आरा’ के बाद दूसरी ध्वनिपूर्ण फिल्म थी और 1932 में आयी थी। 1948 में महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ की अभिनेत्री नरगिस दत्त की माँ जद्दनबाई की जिद्द पर दो भोजपुरी ठुमरी फिल्म में डाली गयी थी। इसी दौर में आयी एक अन्य हिन्दी फिल्म ‘नदिया के पार’ में भी दो भोजपुरी गाने थे। कहा जा सकता है कि भोजपुरी गाना इक्का-दुक्का हिन्दी फिल्मों में ‘चिखना जइसन’ परोसा जा रहा था – छंग ना छटा आ रहरी के दाल में इमली खट्टा।

एक संपूर्ण भोजपुरी फिल्म का बनना साठ के दशक तक असंभव ही लग रहा था। हालाँकि तब तक अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में दर्जनों फिल्में बन चुकी थीं। असंभव को अपने पुरुषार्थ या उपक्रम से संभव करने वाले नायक कहलाते हैं। ऐसे ही एक नायक थे नाजिर हुसैन ने। उन्होंने देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से पहली भोजपुरी फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया और एक पटकथा लिखी। वह निर्माता की खोज में यहाँ वहाँ भटकते रहे। इस क्रम में वह विमल राय के पास भी गये। उन्हें कहानी पसंद भी आयी पर वह इस पर हिन्दी फिल्म बनाना चाहते थे। इसे नाजिर हुसैन ने अस्वीकार कर दिया, “ई फिलिमिया तs बनी भोजपुरिये में।“

आखिरकार नाजिर हुसैन को निर्माता मिल ही गया। ये थे धनबाद के कोयला व्यापारी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी। इस प्रकार भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनी। इस फिल्म के निर्देशक थे कुन्दन कुमार। फिल्म के गीत लिखे थे शैलेन्द्र ने और कर्णप्रिय संगीत दिया था चित्रगुप्त ने। गानों को स्वर दिया लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने। फिल्म के नायक और नायिका थे – असीम कुमार और कुमकुम। रामायण तिवारी, पद्मा खन्ना, पटेल, भगवान सिन्हा और स्वयं नाजिर हुसैन आदि सह-कलाकार थे।

‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का आरम्भिक बजट दो लाख रुपये से भी कम था लेकिन फिल्म बनाने में 5 लाख रूपये लग गये। 21 फरवरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में इसे रिलीज किया गया। रिलीज से पहले सदाकत आश्रम में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को फिल्म दिखायी गयी थी। फिल्म ने लगभग 80 लाख का व्यापार किया। देहेज, बेमेल विवाह, नशाखोरी और अंधविश्वास जैसे सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर बनी इस साफ-सुथरी फिल्म से भोजपुरिया लोगों ने मार्मिकता के साथ कनेक्ट किया। इसने भोजपुरी फिल्मों के लिए लीक ही नहीं बनाया बल्कि नाजिर हुसैन को भोजपुरी सिनेमा का भीष्म पितामह बना दिया।

इस फिल्म का संगीत बेहद कर्णप्रिय था, जो आज तक लोकप्रिय है। फिल्म का शीर्षक गीत गंगा के प्रति भोजपुरिया समाज की आस्था का संगीतमय प्रतीक है।

काहे बँसुरिया बजवले …

‘मोरा कुसमी रे चुनरिया इतर गमके …’ के तो कहने ही क्या …

बनी लीक पर गाड़ियाँ चलने लगीं। एक फिल्म आयी ‘बिदेसिया’। इसे भोजपुरी साहित्य के अमर नाटककार और महान गीतकार भिखारी ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘बिदेसिया’ से भी जोड़ा जाता है। फिल्म के नायक का नाम और फिल्म का शीर्षक छोड़कर इसमें ‘बिदेशिया’ जैसा कुछ भी नहीं था। भिखारी ठाकुर को इस फिल्म के लिए मुम्बई बुलाया गया था। उन्होंने फिल्म में फीचर भी किया, अपने इस अमर गीत के साथ। भिखारी ठाकुर का संभवत: यही एकमात्र वीडियो उपलब्ध है।

सुनिए और देखिए भिखारी ठाकुर को … डगरिया जोहत ना हो डगरिया जोहत ना हो डगरिया जोहत ना, बीते आठो रे पहरिया हो डगरिया जोहत ना …

कहते हैं कि फिल्म के लिए भिखारी ठाकुर को कोई खास आर्थिक लाभ नहीं दिया गया और उन्हें ट्रेन का टिकट देकर वापस भेज दिया गया। बहरहाल, बच्चू भाई साह के निर्माण और एस एल त्रिपाठी के निर्देशन में इस फिल्म ने भी अच्छा व्यवसाय किया। फिल्म के नायक थे सुजीत कुमार और नायिका थीं कुमारी ऩाज। अन्य कलाकारों में जीवन और पद्मा खन्ना आदि प्रमुख हैं। फिल्म सामाजिक भेद-भाव और जात-पात पर प्रहार करती है। फिल्म के एक डायलॉग में नायक प्रेम में जात-पात की बाधा पर प्रहार करते हुए कहता है … भूख न जाने बासी भात, नींद न जाने टूटी खाट और प्रीत न जाने जात-कुजात।

आर तिवारी के निर्माण और कुन्दन कुमार के निर्देशन में बनी संगीतमय फिल्म ‘लागी नाही छूटे राम’ के नायक थे असीम कुमार और नायिका थीं कुमकुम। सह-कलाकारों में नाजिर हुसैन, अनवर हुसैन, इन्द्राणी मुखर्जी और तिवारी प्रमुख थे।  फिल्म के गीत लिखे मजरूह ने, अमर संगीत दिया चित्रगुप्त ने और गीतों को स्वर दिया लता मंगेशकर, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर, तलत महमूद और मन्ना डे ने। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर बनी इस साफ-सुथरी फिल्म के एक गीत में ‘बनवारी हो …’ में भोजपुरिया कला संस्कृति की वह पुरानी झलक दिखती है जिसमें गाती हुए हुई नृत्यांगना के लिए वादक कमर में अपना वाद्य बाँधकर चलते हुए संगीत दे रहे हैं और थोड़े बहुत भाव भी …

लाल लाल ओठवा से बरसे ला ललइया … का बोल श्रृंगार के एक अलग स्तर पर ही है और धुन अत्यंत मोहक।

फिल्म की शीर्षक गीत विरह की कारुणिक वेदना लिए प्यार की बेबसी बताता है …

‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’, ‘बिदेसिया’ और ‘लागी नाहीं छूटे राम’ जैसी फिल्मों ने अच्छा व्यवसाय किया। ब्लैक एंड व्हाइट में बनी ये फिल्में सिनेमाई श्रेष्ठता और तकनीकी गुणवत्ता का मानक नहीं हैं पर देश की एक बड़ी जनसंख्या की आकांक्षाओं का मूर्त रुप हैं – भूख भला कि मेहरी के जूठ भला। ये उन मुद्दों पर बनी फिल्म हैं जो इस समाज से सरोकार रखती हैं और उन्हें दर्शाती हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि इनमें माटी की महक थी और ये फिल्में किसी भी पैमाने पर फूहड़ और अश्लील नहीं थीं।

पूँजी के अभाव और भोजपुरी के प्रचार-प्रसार व स्वीकार्यता में कमी के बावजूद भोजपुरी सिनेमा इतिहास के पहले अध्याय के 4-5 वर्षों में दर्जन भर और फिल्में भी बनीं लेकिन बाकी फिल्में अच्छा व्यवसाय नहीं कर सकीं। 1967 आते आते भोजपुरी फिल्म के शिशु उद्योग पर तालाबंदी हो गयी और यह ताला 10 वर्षों तक लगा रहा।

क्रमश: …

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

5 thoughts on “भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: एक

    1. धन्यवाद श्रवण जी। भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय का दूसरा अध्याय भी आ गया है।

  1. एकदमे सटीक वर्णन बा, पढ़ के मजा आ गइल। जा तानी 3नो भाग पढ़े।

    1. धन्यवाद राहुल। तीनों पढ़ीं आ प्रतिक्रिया दीहिं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *