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भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: दो

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… गतांक से आगे

1967-77 के दस साल भोजपुरी सिनेमा एक अदद फिल्म के लिए हहरता रहा, छछनता रहा। पत्थल पर फेर दुभ जामल – 1977 में ‘बिदेसिया’ के निर्माता बच्चू भाई शाह ने यह लंबी चुप्पी तोड़ी और बनी भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म – दंगल। सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती, रति कुमार निर्देशित इस संगीतमय फिल्म के नायक थे सुजीत कुमार और नायिका थीं मिस इंडिया रही प्रेमा नारायण। अन्य कलाकरों में इफ्तिखार, राम सिन्हा और उर्मिला भट्ट आदि थे। फिल्म के गीत लिखे कुलवन्त जानी ने जिन्हें गाया मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर और मन्ना डे ने और धुन बनाया कालान्तर में हिन्दी फिल्म संगीत की सनसनी बनी नदीम-श्रवण की जोड़ी ने जिन्होंने अपने संगीतमय दंगल से काशी, पटना और कलकत्ता तक हिला दिया।

https://www.youtube.com/watch?v=6qYTMU8jHS4

और इस भोजपुरी मुजरा के तो कहने ही क्या … मोरे होठवा से नथुनिया कुलेल करेला, जइसे नागिन से सपेरा अठखेल करेला …

https://www.youtube.com/watch?v=yX1hKDbOvns

‘दंगल’ के बाद भोजपुरी सिनेमा के भीष्म पितामह नाजिर हुसैन फिर सक्रिय हुए। उनके ही निर्देशन में बनी फिल्म ‘बलम परदेसिया’। ‘गोरकी पतरकी रे … हो हो ए हो …’ गाँव-जवार, हाट-बाजार और खेत-पथार में गूँजने लगा।

अब तक बनी भोजपुरी फिल्मों में हिन्दी फिल्मों के कलाकारों का ही घोर-मठ्ठा हो रहा था। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी और माटी की महक से सजी फिल्म ‘बलम परदेसिया’ से भोजपुरी फिल्म को अपना पहला स्टार मिला – राकेश पाण्डेय। फिल्म की अभिनेत्री थीं पद्मा खन्ना। सह-कलाकारों में लीला मिश्रा, जयश्री टी और स्वयं नाजिर हुसैन प्रमुख हैं। अनजान के लिखे गीतों को अपने मधुर संगीत से सँवारा चित्रगुप्त ने और उन्हें स्वर दिया मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने।

टुकुर टुकुर ताके काहे रे बहेलिया …

रफी का गाया विरह का यह गीत तो अमर ही है … मोरा सजना सनेहिया बिसर गइले रे …

1981 में तो जैसे एक धमाका हुआ जब लोगों ने यह कहना शुरु किया कि भोजपुरी में ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्म आयी है। यह फिल्म थी – धरती मइया। इस फिल्म में पद्मा खन्ना संभवत: अपने फिल्मी करियर की सबसे सशक्त भूमिका में थी। इसी फिल्म से भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार कुणाल सिंह का पदार्पण हुआ और उनकी जोड़ी बनी गौरी खुराना के साथ जो आगे लगभग ढ़ाई दर्जन फिल्मों में चली। फिल्म में राकेश पाण्डेय अतिथि भूमिका में थे। कमर नार्वी निर्देशित इस फिल्म का अमर संगीत दिया चित्रगुप्त ने।

माटी की महक लिए श्रृंगार का यह गीत सुनिए … भउजी दिहें हमरा के गरिया ना …

‘केहु लुटेरा केहु चोर हो जाला …’ का शोख और अल्हड़ लोक धुन बहुत बड़ा हिट रहा …

संतोषी मइया के इस गीत के बिना ‘धरती मइया’ की बात पूरी नहीं होगी … संतोषी मइया सुन लs अरजिया हमार …

और मोहम्मद रफी के गाए इस गीत में तो जैसे करुणा बहती है … ‘जल्दी जल्दी चल रे कहारा’ के अन्तरा में ये शब्द बेटी को विदाई के समय मार्मिक करुणा से भरी यह सीख देते हैं …  दुनो कुल के इज्जत रखिहs बोलिहs जन तीत बोलिया …

1982 में एक हिट फिल्म आयी थी राकेश पांडे और पद्मा खन्ना की ‘बलमा नादान’। न तो फिल्म यृ-ट्यूब पर उपलब्ध है, न ही इसके गीत। इस फिल्म की च्रर्चा यहाँ सिर्फ इसलिए की जी रही है कि यह बताया जा सके कि भोजपुरी फिल्मों से तब कितने बड़े बड़े नाम जुड़े थे। इस फिल्म के अधिकांश गीत लिखे थे भोजपुरी आन्दोलन के अग्रणी ध्वजवाहक, बिहार विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष और बिहार के पूर्व राज्य मंत्री, वित्त स्व. डॉ प्रभुनाथ सिंह।

फिल्म के गीतों का लिंक … https://gaana.com/album/balma-nadaan

सुजीत कुमार, पद्मा खन्ना, राकेश पाण्डेय और गौरी खुराना अभिनीत ‘भईया दूज’ भी खासी हिट फिल्म थी। इसके गीतों में भोजपुरी फिल्म संगीत की ट्रेडमार्क मधुरता थी।

ससुररिया जइहs भईया धीरे-धीरे …

और गौरी खुराना पर फिल्माये गये इस गाने में अल्हड़ जवानी में बचपन की नॉस्टाल्जिया अद्भुत है … कहवा गइल लरिकइयां हो तनी हमके बता दs …

इस लेख में सुपरहिट फिल्म ‘नदिया के पार’ की चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा। राजश्री प्रोडक्शन की यह फिल्म आधिकारिक रूप से भले ही हिन्दी में हो पर इसका भोजपुरिया कलेवर इसका यूएसपी था। सचिन और साधना सिंह अभिनीत इस फिल्म ने भोजपुरिया जगत में खूब धूम मचाया। रवीन्द्र जैन के संगीत ने हल्फा मचा दिया।

कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया …

साँची कहें तोरी आवन से हमरे अंगना में आइल बहार भउजी …

और लवंडा नाच से आरम्भ होता यह होली गीत … वाह … जोगी जी धीरे जोगी जी वाह …

भोजपुरी सिनेमा का तीसरा अध्याय ‘गंगा किनारे मोरा गाँव …’ की बात के बिना अधूरा रहेगा। फिल्म के नायक थे कुणाल सिंह और नायिका गौरी खुराना। अशोक जैन के निर्माण में इस फिल्म का निर्देशन किया दिलीप बोस ने। फिल्म के मार्मिक गीत लिखे लक्ष्मण शाहाबादी ने जो पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी के भाई हैं। कर्णप्रिय संगीत चित्रगुप्त का था लेकिन उनके दोनों पुत्रों आनन्द और मिलिन्द ने भी इस फिल्म में अपना हुनर दिखाया और कुछ ही साल बाद हिन्दी फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ से हिट संगीतकार जोड़ी के रूप में उभरे।

लक्ष्मण शाहाबादी का यह गीत जीवन का पूरा मर्म समेटता है … कहे के तs सभे केहु आपन आपन कहावे वाला के बा ….

‘भींजे रे चुनरी भींजे रे चोली …’ में बारिश को ब्लेम करती मांसलता दिखी, गोया यह आने वाले दिनों का संकेत हो।

https://www.youtube.com/watch?v=0wZSpGYzKD8

और इस मोहक गीत के तो कहने ही क्या … दे दs पिरितिया उधार धरम होई …

10-12 सालों में इनके अलावा ‘पिया के गाँव’, ‘दगाबाज बलमा’, ‘दुलहिन’, ‘दुल्हा गंगा पार के’ और ‘हमार भउजी’ जैसी दर्जनों फिल्में बनीं। अकेले भोजपुरी सिनेमा सुपरस्टार कुणाल सिंह और गौरी खुराना की जोड़ी ने ढ़ाई दर्जन फिल्में दीं लेकिन एक उद्योग की भाँति भोजपुरी सिनेमा का परिपक्व होना अभी शेष था। एक ही तरह के कथानक पर फिल्में बनती रहीं। कहानी और प्रस्तुति में नयापन का अभाव था, लेकिन दूसरे अध्याय की अधिकांश फिल्में अश्लीलता व फूहड़ता से बची रहीं। संगीत में लोकधुन और माधुर्य कमोबेश कायम रहा। पूँजी के अभाव, सरकारी प्रोत्साहन की कमी, भोजपुरी के प्रति बढ़ती हीन भावना से भोजपुरी सिनेमा जूझ ही रहा था कि वीडियो अध्याय आरम्भ हो गया। टेलीविजन पहले ही आम हो चुका था और कई विशेषज्ञ सिनेमा के पतन की भविष्यवाणी करने लगे थे। खैर, सिनेमा तो समाप्त नहीं हुआ पर 80 के दशक उत्तरार्द्ध में भोजपुरी सिनेमा एक बार फिर हाँफने लगा लेकिन कुछ साल और हुटहुटी पर टान गया। 1990 आते आते यह हुटहुटी भी जाती रही।

वीडियो ने भोजपुरी सिनेमा पर इस दूसरी तालाबंदी में अहम भूमिका निभायी। गुलशन कुमार की टी-सीरीज क्रांति भी हो चुकी थी। अनेक भोजपुरिया गायकों को पेशेवर रूप से गाने का मौका मिला। भोजपुरी वीडियो एलबम बनने लगे। मनोंरंजन का एक नया विकल्प लोगों के सामने आया। यही वो दौर था जब भोजपुरी गीत-संगीत से लेकर उसके वीडियो तक अश्लीलता की चपेट में आए, जिससे भोजपुरी के मनोरंजन उद्योग का उबरना आज भी शेष है। घूम घूमकर पौराणिक कहानियों का लोक गायन करने वाले व्यास डिजिटल हो गये और भोजपुरी एवं भोजपुरी लोक गायन को बे-आस करने लगे।

वैसे यह अलग ही बहुत बड़ा विषय है कि ‘बार अइनी हो जगदम्बा घर में दियरा’ और ‘लिखवली रजमतिया पतिया रोई रोई के’ से भोजपुरी का लोक गायन ‘बोकवा बोलत नइखे’ और ‘जा झाड़ के’ पर कैसे पहुँच गया। सूखती गुणवत्ता, रिसती फूहड़ता और बहती अश्लीलता के लिए कलाकार संगीत कंपनियों पर दोषारोपण करने लगे। संगीत कंपनियों ने श्रोताओं की पसन्द का हवाला दिया। श्रोताओं ने स्वयं को डिफेन्ड किया कि जो मिल रहा है, वह सुन रहे हैं। प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों ने बाजारवादी संस्कृति को कोसा। मूक बाजार अपना बचाव नहीं कर सका, संगीत सिसकता रहा।

बहरहाल, भोजपुरी सिनेमा का दूसरा अध्याय 1990 के आस-पास समाप्त हो गया और एक बार फिर 10-11 साल की चुप्पी छा गयी।

क्रमश: …

भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय – भाग: एक का लिंक: http://mandli.in/post/bhojpuri-cinema-ke-teen-adhyay-ek

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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