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भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय

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अध्याय – ए

भोजपुरी सिनेमा की दशा और दिशा के पड़ताल पर यह श्रृंखलाबद्ध लेख लिखते हुए एक दावात्याग देना आवश्यक है, वरना कई लोगों के अकारण ही ‘आंगिल-बिछिल’ होने का खतरा है। मैं ठेंठ भोजपुरिया हूँ, लेकिन भोजपुरी के उन दो ध्रुवों के बीच खड़ा हूँ जो कथित रुप से आधुनिक होकर या भाषायी हीनता में भोजपुरी का त्याग कर चुके हैं और जो भोजपुरिया अस्मिता में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की माँग पर पर खूँटा गाड़े बैठे हैं।

मैं भोजपुरी में सपनाता हूँ, हिन्दी में बतियाता हूँ और अँग्रेजी से जीविका कमाता हूँ। मैंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मेरी अगली पीढ़ी चाहे अँग्रेजी, फ्रेंच या कोई और भाषा सीखे पर बिना हीन भाव के भोजपुरी भी बोलेगी। मैं यह मानता हूँ कि अँग्रेजी मजबूरी है, हिन्दी बहुत जरुरी है और भोजपुरी संवाद की धुरी है, बाद बाकी दूर-दफ्फे जाए सरकारी मान्यता। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि मैं कोई इतिहासकार नहीं हूँ। भोजपुरी प्रेम में लिखे इस लेख में तथ्यात्मक त्रुटियाँ हो सकती हैं। ध्यान आकृष्ट कराने पर उनका संज्ञान लिया जाएगा, खेद व्यक्त किया जाएगा और तदनुसार परिमार्जन कर दिया जाएगा।

ईंट पर चढ़कर उँचा बनने वाले कुछ लोग भोजपुरी फिल्म के इतिहास का आरम्भ ‘इन्द्रसभा’ नामक एक हिन्दी फिल्म से मानते हैं, जिसके कुल 71 गानों में से 2 भोजपुरी में थे। यह ‘आलम आरा’ के बाद दूसरी ध्वनिपूर्ण फिल्म थी और 1932 में आयी थी। 1948 में महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ की अभिनेत्री नरगिस दत्त की माँ जद्दनबाई की जिद्द पर दो भोजपुरी ठुमरी फिल्म में डाली गयी थी। इसी दौर में आयी एक अन्य हिन्दी फिल्म ‘नदिया के पार’ में भी दो भोजपुरी गाने थे। कहा जा सकता है कि भोजपुरी गाना इक्का-दुक्का हिन्दी फिल्मों में ‘चिखना जइसन’ परोसा जा रहा था – छंग ना छटा आ रहरी के दाल में इमली खट्टा।

एक संपूर्ण भोजपुरी फिल्म का बनना साठ के दशक तक असंभव ही लग रहा था। हालाँकि तब तक अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में दर्जनों फिल्में बन चुकी थीं। असंभव को अपने पुरुषार्थ या उपक्रम से संभव करने वाले नायक कहलाते हैं। ऐसे ही एक नायक थे नाजिर हुसैन। उन्होंने देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से पहली भोजपुरी फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया और एक पटकथा लिखी। वह निर्माता की खोज में यहाँ-वहाँ भटकते रहे। इस क्रम में वह विमल राय के पास भी गये। उन्हें कहानी पसंद भी आयी पर वह इस पर हिन्दी फिल्म बनाना चाहते थे। इसे नाजिर हुसैन ने अस्वीकार कर दिया, “ई फिलिमिया तs बनी भोजपुरिये में।“

आखिरकार नाजिर हुसैन को निर्माता मिल ही गया। ये थे धनबाद के कोयला व्यापारी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी। इस प्रकार भोजपुरी की पहली फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनी। इस फिल्म के निर्देशक थे कुन्दन कुमार। फिल्म के गीत लिखे थे शैलेन्द्र ने और कर्णप्रिय संगीत दिया था चित्रगुप्त ने। गानों को स्वर दिया लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने। फिल्म के नायक और नायिका थे – असीम कुमार और कुमकुम। रामायण तिवारी, पद्मा खन्ना, पटेल, भगवान सिन्हा और स्वयं नाजिर हुसैन आदि सह-कलाकार थे।

‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ का आरम्भिक बजट दो लाख रुपये से भी कम था लेकिन फिल्म बनाने में लगभग 5 लाख रूपये लग गये। 21 फरवरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में इसे रिलीज किया गया। रिलीज से पहले सदाकत आश्रम में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को फिल्म दिखायी गयी थी। फिल्म ने लगभग 80 लाख का व्यापार किया। देहेज, बेमेल विवाह, नशाखोरी और अंधविश्वास जैसे सामाजिक और पारिवारिक मुद्दों पर बनी इस साफ-सुथरी फिल्म से भोजपुरिया लोगों ने मार्मिकता के साथ कनेक्ट किया। इसने भोजपुरी फिल्मों के लिए लीक ही नहीं बनाया बल्कि नाजिर हुसैन को भोजपुरी सिनेमा का भीष्म पितामह बना दिया।

इस फिल्म का संगीत बेहद कर्णप्रिय था, जो आज तक लोकप्रिय है। फिल्म का शीर्षक गीत गंगा के प्रति भोजपुरिया समाज की आस्था का संगीतमय प्रतीक है।

काहे बँसुरिया बजवले …

‘मोरा कुसमी रे चुनरिया इतर गमके …’ के तो कहने ही क्या …

बनी लीक पर गाड़ियाँ चलने लगीं। एक फिल्म आयी ‘बिदेसिया’। इसे भोजपुरी साहित्य के अमर नाटककार और महान गीतकार भिखारी ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक ‘बिदेसिया’ से भी जोड़ा जाता है। फिल्म के नायक का नाम और फिल्म का शीर्षक छोड़कर इसमें ‘बिदेशिया’ जैसा कुछ भी नहीं था। भिखारी ठाकुर को इस फिल्म के लिए मुम्बई बुलाया गया था। उन्होंने फिल्म में फीचर भी किया, अपने इस अमर गीत के साथ। भिखारी ठाकुर का संभवत: यही एकमात्र वीडियो उपलब्ध है।

सुनिए और देखिए भिखारी ठाकुर को … डगरिया जोहत ना हो डगरिया जोहत ना हो डगरिया जोहत ना, बीते आठो रे पहरिया हो डगरिया जोहत ना …

कहते हैं कि फिल्म के लिए भिखारी ठाकुर को कोई खास आर्थिक लाभ नहीं दिया गया और उन्हें ट्रेन का टिकट देकर वापस भेज दिया गया। बहरहाल, बच्चू भाई साह के निर्माण और एस एल त्रिपाठी के निर्देशन में इस फिल्म ने भी अच्छा व्यवसाय किया। फिल्म के नायक थे सुजीत कुमार और नायिका थीं कुमारी ऩाज। अन्य कलाकारों में जीवन और पद्मा खन्ना आदि प्रमुख हैं। फिल्म सामाजिक भेद-भाव और जात-पात पर प्रहार करती है। फिल्म के एक डायलॉग में नायक प्रेम में जात-पात की बाधा पर प्रहार करते हुए कहता है … भूख न जाने बासी भात, नींद न जाने टूटी खाट और प्रीत न जाने जात-कुजात।

आर तिवारी के निर्माण और कुन्दन कुमार के निर्देशन में बनी संगीतमय फिल्म ‘लागी नाही छूटे राम’ के नायक थे असीम कुमार और नायिका थीं कुमकुम। सह-कलाकारों में नाजिर हुसैन, अनवर हुसैन, इन्द्राणी मुखर्जी और तिवारी प्रमुख थे।  फिल्म के गीत लिखे मजरूह ने, अमर संगीत दिया चित्रगुप्त ने और गीतों को स्वर दिया लता मंगेशकर, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर, तलत महमूद और मन्ना डे ने। पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर बनी इस साफ-सुथरी फिल्म के एक गीत में ‘बनवारी हो …’ में भोजपुरिया कला संस्कृति की वह पुरानी झलक दिखती है जिसमें गाती हुए हुई नृत्यांगना के लिए वादक कमर में अपना वाद्य बाँधकर चलते हुए संगीत दे रहे हैं और थोड़े बहुत भाव भी …

लाल लाल ओठवा से बरसे ला ललइया … का बोल श्रृंगार के एक अलग स्तर पर ही है और धुन अत्यंत मोहक।

फिल्म की शीर्षक गीत विरह की कारुणिक वेदना लिए प्यार की बेबसी बताता है …

‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो’, ‘बिदेसिया’ और ‘लागी नाहीं छूटे राम’ जैसी फिल्मों ने अच्छा व्यवसाय किया। ब्लैक एंड व्हाइट में बनी ये फिल्में सिनेमाई श्रेष्ठता और तकनीकी गुणवत्ता का मानक नहीं हैं पर देश की एक बड़ी जनसंख्या की आकांक्षाओं का मूर्त रुप हैं – छूँछ भला कि मेहरी के जूठ भला। ये उन मुद्दों पर बनी फिल्म हैं जो इस समाज से सरोकार रखती हैं और उन्हें दर्शाती हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि इनमें माटी की महक थी और ये फिल्में किसी भी पैमाने पर फूहड़ और अश्लील नहीं थीं।

पूँजी के अभाव और भोजपुरी के प्रचार-प्रसार व स्वीकार्यता में कमी के बावजूद भोजपुरी सिनेमा इतिहास के पहले अध्याय के 4-5 वर्षों में दर्जन भर और फिल्में भी बनीं लेकिन बाकी फिल्में अच्छा व्यवसाय नहीं कर सकीं। 1967 आते आते भोजपुरी फिल्म के शिशु उद्योग पर तालाबंदी हो गयी और यह ताला 10 वर्षों तक लगा रहा।

अध्याय – दो

1967-77 के दस साल भोजपुरी सिनेमा एक अदद फिल्म के लिए हहरता रहा, छछनता रहा। पत्थल पर फेर दुभ जामल – 1977 में ‘बिदेसिया’ के निर्माता बच्चू भाई शाह ने यह लंबी चुप्पी तोड़ी और बनी भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म – दंगल। सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती, रति कुमार निर्देशित इस संगीतमय फिल्म के नायक थे सुजीत कुमार और नायिका थीं मिस इंडिया रही प्रेमा नारायण। अन्य कलाकरों में इफ्तिखार, राम सिन्हा और उर्मिला भट्ट आदि थे। फिल्म के गीत लिखे कुलवन्त जानी ने जिन्हें गाया मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर और मन्ना डे ने और धुन बनाया कालान्तर में हिन्दी फिल्म संगीत की सनसनी बनी नदीम-श्रवण की जोड़ी ने जिन्होंने अपने संगीतमय दंगल से काशी, पटना और कलकत्ता तक हिला दिया।

https://youtu.be/6qYTMU8jHS4

और इस भोजपुरी मुजरा के तो कहने ही क्या … मोरे होठवा से नथुनिया कुलेल करेला, जइसे नागिन से सपेरा अठखेल करेला …

https://www.youtube.com/watch?v=yX1hKDbOvns

‘दंगल’ के बाद भोजपुरी सिनेमा के भीष्म पितामह नाजिर हुसैन फिर सक्रिय हुए। उनके ही निर्देशन में बनी फिल्म ‘बलम परदेसिया’। ‘गोरकी पतरकी रे … हो हो ए हो …’ गाँव-जवार, हाट-बाजार और खेत-पथार में गूँजने लगा।

अब तक बनी भोजपुरी फिल्मों में हिन्दी फिल्मों के कलाकारों का ही घोर-मठ्ठा हो रहा था। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी और माटी की महक से सजी फिल्म ‘बलम परदेसिया’ से भोजपुरी फिल्म को अपना पहला स्टार मिला – राकेश पाण्डेय। फिल्म की अभिनेत्री थीं पद्मा खन्ना। सह-कलाकारों में लीला मिश्रा, जयश्री टी और स्वयं नाजिर हुसैन प्रमुख हैं। अनजान के लिखे गीतों को अपने मधुर संगीत से सँवारा चित्रगुप्त ने और उन्हें स्वर दिया मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने।

टुकुर टुकुर ताके काहे रे बहेलिया …

रफी का गाया विरह का यह गीत तो अमर ही है … मोरा सजना सनेहिया बिसर गइले रे …

1981 में तो जैसे एक धमाका हुआ जब लोगों ने यह कहना शुरु किया कि भोजपुरी में ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्म आयी है। यह फिल्म थी – धरती मइया। इस फिल्म में पद्मा खन्ना संभवत: अपने फिल्मी करियर की सबसे सशक्त भूमिका में थी। इसी फिल्म से भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार कुणाल सिंह का पदार्पण हुआ और उनकी जोड़ी बनी गौरी खुराना के साथ जो आगे लगभग ढ़ाई दर्जन फिल्मों में चली। फिल्म में राकेश पाण्डेय अतिथि भूमिका में थे। कमर नार्वी निर्देशित इस फिल्म का अमर संगीत दिया चित्रगुप्त ने।

माटी की महक लिए श्रृंगार का यह गीत सुनिए … भउजी दिहें हमरा के गरिया ना …

‘केहु लुटेरा केहु चोर हो जाला …’ का शोख और अल्हड़ लोक धुन बहुत बड़ा हिट रहा …

संतोषी मइया के इस गीत के बिना ‘धरती मइया’ की बात पूरी नहीं होगी … संतोषी मइया सुन लs अरजिया हमार …

और मोहम्मद रफी के गाए इस गीत में तो जैसे करुणा बहती है … ‘जल्दी जल्दी चल रे कहारा’ के अन्तरा में ये शब्द बेटी को विदाई के समय मार्मिक करुणा से भरी यह सीख देते हैं …  दुनो कुल के इज्जत रखिहs बोलिहs जन तीत बोलिया …

1982 में एक हिट फिल्म आयी थी राकेश पांडे और पद्मा खन्ना की ‘बलमा नादान’। न तो फिल्म यृ-ट्यूब पर उपलब्ध है, न ही इसके गीत। इस फिल्म की च्रर्चा यहाँ सिर्फ इसलिए की जी रही है कि यह बताया जा सके कि भोजपुरी फिल्मों से तब कितने बड़े बड़े नाम जुड़े थे। इस फिल्म के अधिकांश गीत लिखे थे भोजपुरी आन्दोलन के अग्रणी ध्वजवाहक, बिहार विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष और बिहार के पूर्व राज्य मंत्री, वित्त स्व. डॉ प्रभुनाथ सिंह।

फिल्म के गीतों का लिंक … https://gaana.com/album/balma-nadaan

सुजीत कुमार, पद्मा खन्ना, राकेश पाण्डेय और गौरी खुराना अभिनीत ‘भईया दूज’ भी खासी हिट फिल्म थी। इसके गीतों में भोजपुरी फिल्म संगीत की ट्रेडमार्क मधुरता थी।

ससुररिया जइहs भईया धीरे-धीरे …

और गौरी खुराना पर फिल्माये गये इस गाने में अल्हड़ जवानी में बचपन की नॉस्टाल्जिया अद्भुत है … कहवा गइल लरिकइयां हो तनी हमके बता दs …

इस लेख में सुपरहिट फिल्म ‘नदिया के पार’ की चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा। राजश्री प्रोडक्शन की यह फिल्म आधिकारिक रूप से भले ही हिन्दी में हो पर इसका भोजपुरिया कलेवर इसका यूएसपी था। सचिन और साधना सिंह अभिनीत इस फिल्म ने भोजपुरिया जगत में खूब धूम मचाया। रवीन्द्र जैन के संगीत ने हल्फा मचा दिया।

कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया …

साँची कहें तोरी आवन से हमरे अंगना में आइल बहार भउजी …

और लवंडा नाच से आरम्भ होता यह होली गीत … वाह … जोगी जी धीरे जोगी जी वाह …

भोजपुरी सिनेमा का तीसरा अध्याय ‘गंगा किनारे मोरा गाँव …’ की बात के बिना अधूरा रहेगा। फिल्म के नायक थे कुणाल सिंह और नायिका गौरी खुराना। अशोक जैन के निर्माण में इस फिल्म का निर्देशन किया दिलीप बोस ने। फिल्म के मार्मिक गीत लिखे लक्ष्मण शाहाबादी ने जो पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी के भाई हैं। कर्णप्रिय संगीत चित्रगुप्त का था लेकिन उनके दोनों पुत्रों आनन्द और मिलिन्द ने भी इस फिल्म में अपना हुनर दिखाया और कुछ ही साल बाद हिन्दी फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ से हिट संगीतकार जोड़ी के रूप में उभरे।

लक्ष्मण शाहाबादी का यह गीत जीवन का पूरा मर्म समेटता है … कहे के तs सभे केहु आपन आपन कहावे वाला के बा ….

‘भींजे रे चुनरी भींजे रे चोली …’ में बारिश को ब्लेम करती मांसलता दिखी, गोया यह आने वाले दिनों का संकेत हो।

और इस मोहक गीत के तो कहने ही क्या … दे दs पिरितिया उधार धरम होई …

10-12 सालों में इनके अलावा ‘पिया के गाँव’, ‘दगाबाज बलमा’, ‘दुलहिन’, ‘दुल्हा गंगा पार के’ और ‘हमार भउजी’ जैसी दर्जनों फिल्में बनीं। अकेले भोजपुरी सिनेमा सुपरस्टार कुणाल सिंह और गौरी खुराना की जोड़ी ने ढ़ाई दर्जन फिल्में दीं लेकिन एक उद्योग की भाँति भोजपुरी सिनेमा का परिपक्व होना अभी शेष था। एक ही तरह के कथानक पर फिल्में बनती रहीं। कहानी और प्रस्तुति में नयापन का अभाव था, लेकिन दूसरे अध्याय की अधिकांश फिल्में भी अश्लीलता व फूहड़ता से बची रहीं। संगीत में लोकधुन और माधुर्य कमोबेश कायम रहा। पूँजी के अभाव, सरकारी प्रोत्साहन की कमी, भोजपुरी के प्रति बढ़ती हीन भावना से भोजपुरी सिनेमा जूझ ही रहा था कि वीडियो अध्याय आरम्भ हो गया। टेलीविजन पहले ही आम हो चुका था और कई विशेषज्ञ सिनेमा के पतन की भविष्यवाणी करने लगे थे। खैर, सिनेमा तो समाप्त नहीं हुआ पर 80 के दशक उत्तरार्द्ध में भोजपुरी सिनेमा एक बार फिर हाँफने लगा लेकिन कुछ साल और हुटहुटी पर टान गया। 1990 आते आते यह हुटहुटी भी जाती रही।

वीडियो ने भोजपुरी सिनेमा पर इस दूसरी तालाबंदी में अहम भूमिका निभायी। गुलशन कुमार की टी-सीरीज क्रांति भी हो चुकी थी। अनेक भोजपुरिया गायकों को पेशेवर रूप से गाने का मौका मिला। भोजपुरी वीडियो एलबम बनने लगे। मनोंरंजन का एक नया विकल्प लोगों के सामने आया। यही वो दौर था जब भोजपुरी गीत-संगीत से लेकर उसके वीडियो तक अश्लीलता की चपेट में आए, जिससे भोजपुरी के मनोरंजन उद्योग का उबरना आज भी शेष है। घूम घूमकर पौराणिक कहानियों का लोक गायन करने वाले व्यास डिजिटल हो गये और भोजपुरी एवं भोजपुरी लोक गायन को बे-आस करने लगे।

वैसे यह अलग ही बहुत बड़ा विषय है कि ‘बार अइनी हो जगदम्बा घर में दियरा’ और ‘लिखवली रजमतिया पतिया रोई रोई के’ से भोजपुरी का लोक गायन ‘बोकवा बोलत नइखे’ और ‘जा झाड़ के’ पर कैसे पहुँच गया। सूखती गुणवत्ता, रिसती फूहड़ता और बहती अश्लीलता के लिए कलाकार संगीत कंपनियों पर दोषारोपण करने लगे। संगीत कंपनियों ने श्रोताओं की पसन्द का हवाला दिया। श्रोताओं ने स्वयं को डिफेन्ड किया कि जो मिल रहा है, वह सुन रहे हैं। प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों ने बाजारवादी संस्कृति को कोसा। मूक बाजार अपना बचाव नहीं कर सका, संगीत सिसकता रहा।

बहरहाल, भोजपुरी सिनेमा का दूसरा अध्याय 1990 के आस-पास समाप्त हो गया और एक बार फिर 10-11 साल की चुप्पी छा गयी।

अध्याय – तीन

1990 के दशक में आ रहे तथाकथित लोकगीतों के भोजपुरी कसेट्स और वीडियो एलबम में अधिकांश की सामग्री अश्लील थी, यहाँ तक की एलबम और कसेट्स के नाम ही फूहड़ होते थे। अच्छा और श्लील गाने वालों की आवाज दब गयी। गाछ के कवनो एगो आम ना बाग के बाग कुलवांसी होखे लागल। उधर भोजपुरिया जगत में मंडल ने समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया था। भोजपुरी फिल्में अव्वल तो बन नहीं रही थीं और यदि बनतीं भी तो मौजूदा कानून-व्यवस्था के आलोक में भोजपुरी फिल्मों के असली दर्शक मइया-बहिनी उन्हें देखने नहीं जाते। भोजपुरी लोकगीत और उनके वीडियो फूहड़ मनोंरंजन का पर्याय बन चुके थे। ‘लूट में चरखा नफा’ की तर्ज पर इसने एक दर्शक वर्ग अवश्य बना लिया, जिन्हें ध्यान में रखकर भोजपुरी सिनेमा के तीसरे अध्याय की फिल्में बनीं और व्यवसायिक सफलता की बुलन्दियों पर पहुँचीं।

भोजपुरी सिनेमा में लगभग दस वर्षों से सुतल भगत का नाच  चल रहा था। लंबी रात की सुबह हुई और पटल पर अवतरित हुए दो भोजपुरिया सितारे – मनोज तिवारी एवं रवि किशन। ‘ससुरा बड़ा पईसा वाला’, ‘सईयां हमार’ और ‘पंडिजी बताईं ना बियाह कब होई’ जैसी अनेक फिल्में व्यवसायिक रुप से सफल रहीं। इसने भोजपुरी फिल्मों का तीसरा अध्याय 2001-02 में आरम्भ किया जो अब तक जारी है।

आज भोजपुरी सिनेमा 2000 करोड़ का एक स्थापित उद्योग है। हर साल दर्जनों फिल्में बन रही हैं। रवि किशन की मानें तो इससे 50,000 घरों के चूल्हे जलते हैं। बँसवारी और खरिहानी में होने वाली भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग लंदन और मारीशस में होने लगी है। दो भोजपुरी फिल्म स्टार भारत की संसद में हैं, तीसरे जाते-जाते रह गये। कई भोजपुरी स्टार प्रसिद्ध टीवी शो ‘बिग बॉस’ में जा चुके हैं। भोजपुरी स्टार नेशनल टीवी शो में बुलाए जाते हैं। यह बात अलग है कि शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए कपिल शर्मा उन्हें बुलाते हैं तथा ‘आम का आम और गुठली के दाम’ के तहत उन स्टार्स की सॉफ्ट बेइज्जती भी करते हैं।

मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव, खेसारीलाल यादव, पवन सिंह जैसे अभिनेता हैं तो रानी चटर्जी, टिंकू घोष, श्वेता तिवारी और भाग्यश्री से लेकर पाखी हेगड़े, अक्षरा सिंह, आम्रपाली दुबे और काजल राघवानी जैसी अभिनेत्रियाँ हैं और संभावना सेठ जैसी आइटम गर्ल। मनोज तिवारी मखमली आवाज वाले भोजपुरिया उदित नारायण हैं जिन्होंने भोजपुरी लोक गायन की अच्छी सेवा की है। वह भोजपुरी फिल्मों की भी सेवा कर रहे हैं, देश सेवा भी। रवि किशन मँझे हुए अभिनेता हैं, तभी तो वह हिन्दी सहित अन्य भाषाओं की फिल्मों में धाक जमाते हैं और अब संसद में भी छाप छोड़ रहे हैं। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ की अपनी छवि के आस-पास ही खड़े हैं। खेसारी लोक गायक और नर्तक पहले हैं, अभिनेता बाद में। पवन सिंह गायक अच्छे हैं या अभिनेता, कहना मुश्किल है।

इन सितारों ने भोजपुरी सिनेमा को बस जीवित रखा है। भोजपुरी फिल्मों का सिर्फ फैलाव हुआ है, उँचाई नहीं बढ़ी। उल्टा यह पहले से बौना हुआ है और अपने बौनेपन से वह भोजपुरी, भोजपुरिया मानस और उसकी प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ रहा है। फिल्में कौन सी बनीं, इसकी चर्चा कैसे करूँ? कौन से गाने रखूँ, यह भी समझ से परे है। फिल्मों के नाम भी ढ़ंग के रख लेते तो शाबाशी दी जाती। समझना मुश्किल होता है कि इन फिल्मों में किस गोला की भोजपुरी बोली जा रही है, किस लोक संस्कृति की बात हो रही है। कला और मनोंरंजन के नाम पर हरवाही में कीर्तन हो रहा है। कोई पूछे इनसे कि गीत लिखे जा रहे हैं या शब्दों का चीरहरण हो रहा है, संगीत बन रहा है या म्यूजिकल पॉर्न।

आइए, भोजपुरी सिनेमा के तीसरे अध्याय के कुछ गीत देख लें।

https://youtu.be/7_o7ulA692Y

https://youtu.be/JkXdmyEnYDk

https://youtu.be/tx0Dml5zdCU

 

भोजपुरी फिल्मों की दुर्दशा के क्रम में एक पोएटिक जस्टिस जाने-अनजाने हुआ है। भोजपुरिया लोग देश भर में रोजगार के लिए जातें और रोजगार पाते हैं। बदला चुकाते हुए भोजपुरी फिल्म उद्योग ने ऐसे अवसर पैदा किए हैं कि देश भर की फिल्मों का स्क्रैप भोजपुरी फिल्मों में आराम से खपाया जा रहा है। बड़े बड़े नाम छोटे काम के साथ भोजपुरी में खिंचे चले आते हैं, कम लागत और अधिक मुनाफा देखकर।

अन्हर कोठरी में एगो दीया दिख गया – ‘देसवा’। इस बेजोड़ भोजपुरी फिल्म के निर्माता थे नीतिन चन्द्रा और नीतू चन्द्रा एवं निर्देशक थे नितिन चन्द्रा। मुख्य भूमिकाओं में कांति प्रकाश झा, दीपक सिंह, अजय कुमार, आरती पुरी, पंकज झा और आशीष विद्यार्थी थे। ‘देसवा’ के लिए चंपारण टॉकीज पूरे भोजपुरिया समाज का सल्यूट डिजर्व करता है।

‘देसवा’ बिहार के उस कालखंड का सजीव सिनेमाई चित्रण है जिसमें पूरा देश बिहार से हाथ धो चुका था। आधुनिकता का पुट है, बिना फूहड़ हुए। प्रस्तुति और शैली लाजबाब है। ठेंठ भोजपुरी ऐसी कि आरा, बलिया, छपरा और बक्सर में आप कहीं भी सुन लें। ‘देसवा’ देखकर तीसरे अध्याय की अनेक फिल्मों से स्वयं को दिए गए टॉर्चर का मेरा दर्द कम हो गया। दुर्भाग्य यह है कि इस फिल्म को डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिल रहे थे। इससे यही लगा कि भोजपुरिया समाज वही फिल्में डिजर्व करता है जो इसे आज परोसी जा रही हैं। बहरहाल, ‘देसवा’ 2011 में प्रदर्शित हुई लेकिन उसका व्यवसायिक प्रदर्शन ऐसा रहा कि दुबारा ऐसी भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए चन्द्रा बंधुओं को जाँबाज बनना पड़ेगा। यह फिल्म देखकर यह प्रश्न उठा कि भोजपुरिया कथानक पर हिन्दी फिल्में बनाने वाले बड़े फिल्मकार प्रकाश झा ने कभी भोजपुरी फिल्मों की सुध क्यों नहीं ली।

इस फिल्म के संगीतकार थे आशुतोष सिंह और फिल्म के गीत गाये सोनू निगम, श्रेया घोषाल, भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा, सुनिधि चौहान और मिका ने।

बिहार कोकिला शारदा सिन्हा का करुणा से ओत-प्रोत माधुर्य … लेके आईल सवेरवा …

https://youtu.be/4mIdC_knkV4

नीतू चन्द्रा पर फिल्माया गया यह आइटम नंबर … सईंया मिले लरकईंया में …

https://youtu.be/wgqi7HH8Vv8

बिना फूहड़ हुए फिल्म के संगीत को आधुनिक बनाने की कोशिश भी हुई, मिका के इस रैप से …

https://youtu.be/qFNfO4tqgLM

तीसरे अध्याय में भोजपुरी सिनेमा की चाल थोड़ी अलग थी। दर्शकों का टार्गेट वर्ग मइया-बहिनी से बदलकर वह वर्ग हो गया था जिसे फूहड़ भोजपुरी एलबम की लत लग चुकी थी। कच्ची उम्र के दर्शक भी शिकार हुए जिन्हें अच्छे-बुरे के पहचान की समझ नहीं थी। बहरहाल, भोजपुरी सिनेमा ने वह रफ्तार पकड़ी कि पिछले बीस सालों से वह रुकने का नाम नहीं ले रही। अत्यधिक रफ्तार कहें या आधुनिकता से कदमताल पर भोजपुरी सिनेमा ‘साठा का पाठा’ हो चुका है लेकिन वह बचकानी हरकतें कर रहा है। इस प्रौढ़ अवस्था में बचकानी हरकतों का कोढ़ है एवं फूहड़ता और अश्लीलता का खाज। कुणाल सिंह दुखी होकर कहते हैं कि कुछ साल में भोजपुरी सिनेमा एक और मृत्यु को प्राप्त होगा लेकिन भोजपुरी सिनेमा इतिहास पर पुस्तक लिखने वाले मनोज भावुक उनसे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि विकृति चाहे जितनी बढ़े पर भोजपुरी सिनेमा जहाँ है, वहाँ से बंद नहीं होगा।

भोजपुरी सिनेमा की दशा को दुर्दशा कहना अन्डरस्टेटमेंट होगा। उसकी दिशा कतई उत्साहवर्द्धक नहीं दिखती। भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरिया समाज और संस्कृति के चित्रण के बेसिक पर वापस आना होगा। फूहड़ता और अश्लीलता के दीमक को तिलांजलि देनी होगी और स्वस्थ प्रयोगधर्मिता को अपनाना होगा। भोजपुरिया मानस का प्रदूषण रोकने के लिए एक बड़े जन जागृति की अवश्यकता है। बड़े फिल्मी नाम जैसे शत्रुघ्न सिन्हा, मनोज वाजपेयी, प्रकाश झा आदि भोजपुरी सिनेमा के लिए कुछ करें। मनोज तिवारी और रवि किशन बड़े स्टार हैं और अब सांसद भी। अब भोजपुरी मनोरंजन उद्योग के स्वास्थ्य और गुणवत्ता पर उनके कुछ कर गुजरने का समय है। दो बड़े प्रदेशों में भोजपुरिया आबादी बहुत बड़ी संख्या में है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ये सरकारें भोजपुरी सिनेमा की फूहड़ता समाप्त करने और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कुछ करें?

अंत में एक कहानी सुनिए। एक गरीब परिवार था। खाने के लाले पड़ते थे पर संस्कारों की थाती के साथ पूरा परिवार खुशी खुशी जीवन यापन करता था। कुछ दिनों बाद परिवार ने शराब का व्यापार किया और खूब पैसे बनाए। व्यापार से पैसे बनाने के क्रम में संस्कारों की थाती गुम हो गयी। परिवार संपन्न हुआ पर घर में डोमघाउच होने लगा, बात-बेबात गारी गुत्ता भी। भोजपुरी सिनेमा इसी संपन्नता की गिरफ्त में है – लंगई में नयका धनिक पछुआ में लालटेन टँगले बा। गरीबी को ठोकर मारकर परिश्रम से संपन्न बनना पुरुषार्थ है लेकिन संस्कार गंवाकर धनाढ्य होने से अच्छा है दरिद्रता की चादर लपेटे रहना – सैयद गरीब हो जइहन तs तरकारी ना बेचे लगिहन

(समाप्त)

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

2 thoughts on “भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्याय

  1. बहुत लंबा हो गया यह लेख पर जागृत भोजपुरिया समाज का दर्द आपने सही सही बयान किया है। जिस तरह से आजकल के भोजपुरी गीत और फिल्में बनती है उसको देख कर पहले पहल तो ऐसा ही लगेगा जैसे सारे उत्तर प्रदेश और बिहार वासना से भरपूर है और इन राज्यो में लस्ट से ज्यादा कुछ होता ही नहीं है। हर फिल्म में १० गाने और एक से एक फूहड़ जो कि सुन कर कान से खून आ जाए पर हररोज यही परोसा जा रहा है भोजपुरी दर्शकों के सामने और अन्य प्रंतियो को लगता है कि यही सच्चाई है जो कि दिल दुखाती है।

    कई बार तो ऐसा लगता है मानो काले धन को साफ सुथरा बनाने का करेंसी एक्सचेंज है यह जहा की पैसे लगाओ और घाटा हो या नफा पर को भी निकलेगा वो चरणामृत सा पवित्र होगा। उम्मीद करता हूं कि आने वाले कुछ सालो में इस अश्लीलता के बाजार को भी लॉकडाउन किया जाएगा।

    1. लेख बेशक लंबा है लेकिन विषय भी वृहद था। इसलिए तीन खंडों में लिखा गया जिसमें भोजपुरी सिनेमा के तीन अध्यायों की बात की गयी। तीन भागों में लिखे जाने के बावजूद बहुत बातें छूट गयीं, अनेकों फिल्में रह गयीं। बाद में पाठकों की सुविधा के लिए इन तीन खंडों को एक साथ प्रकाशित किया गया। पढ़ने और सराहने के लिए धन्यवाद।

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