मंडली

भादो की मूसलाधार बारिश

शेयर करें

 

दोपहर से ही बादल मानो एक ही दिन में सारी प्यास बुझाने को आतुर हो रहे हों। अमर को बरसात बहुत पसंद थी। बूँदा-बाँदी शुरू होते ही वह तृष्णा को बाइक पर बिठा शहर के चक्कर कटवा ले आता। यूँ ही बेवजह तृष्णा को अमर के साथ घूमना बहुत रास आता लेकिन वह ऐसा कहती नहीं।

“त्रिशु ….उउउउउउ…”

और एक पल में तृष्णा जैसे नींद से जागी हो।

“अमर …”

आँसू अपनी जगह बना चुके थे। बड़ी ढीठता से वे बाँध तोड़ना सीख चुके थे। अब तो तृष्णा को भी इनके साथ रहने की आदत सी हो चुकी थी।

भादो की मूसलाधार बारिश में खिड़की के पास बैठी तृष्णा को यह वक़्त बाँहें थामे, यादों की गलियों में ले चला। बारहवीं क्लास में उसने पहली बार अमर को देखा था। अमर उसकी सहेली चारु के बड़े पापा का बेटा था। चारु, तृष्णा और अमर का छोटा भाई आदित्य एक ही क्लास में थे। लंबा कद, साँवला रंग, घने बाल और गहरी आँखे … तृष्णा को पहली नजर में ही प्यार हो गया था।

कॉलेज का फाइनल ईयर तक आते ही उसने मल्टी नेशनल कंपनी की मार्केटिंग डिपार्टमेंट में लगे अमर को सीधे कहा था,”अमर! आपको तीन साल से प्यार करती आ रही हूँ और चाहती हूँ कि बुढ़ापे तक ऐसे ही प्यार करूँ। क्या आप मेरा साथ देंगे? “

अमर झेंप सा गया था पर उसके पास त्रिशु को ना कहने का कोई बहाना नहीं था। सच तो ये था कि उसे भी वह बकबकाती लड़की बहुत पसंद थी पर वह इस संशय में था कि एक राजनीतिक घराने की अमीर लड़की उसके मीडिल क्लास फ़ैमिली में माता-पिता और छोटे भाई के साथ कैसे रह पाएगी। वहाँ दसियों नौकर-चाकर थे और यहाँ माँ हर काम खुद करती। तृष्णा चलती फिरती गुड़िया ही तो थी। लेकिन तृष्णा की ज़िद और निश्छल प्रेम के आगे अमर निशब्द था।

बड़े धूम-धाम से शहर में बारात निकली थी। सवा रुपए दहेज लेकर अमर ने छोटे से शहर में बड़ा सा नाम कमा लिया। जहाँ तृष्णा की सहेलियाँ अमर को देख तृष्णा के भाग्य को सराह रहीं थीं, वहीं अमर के दोस्त उसकी किस्मत को तेज़ बता रहे थे।

तृष्णा ने आते ही माँ पापा का दिल जीत लिया। माँ उसे कोई काम नहीं करने देती। अमर वक़्त बेवक़्त काम के सिलसिले में निकल जाता। आदित्य भी एम बी बी एस करके पीजी में प्रवेश ले चुका था। इस दौरान वह दूसरे शहर में ही रहा था। माँ पापा के साथ त्रिशु छोटे बच्चे सी उलझी रहती।

और एक दिन खुश ख़बरी मिली कि माँ पापा दादा-दादी बनने वाले हैं।

उस दिन कितने खुश थे सब … आदित्य भी जब छुट्टियों में आया तो खुशी से रो पड़ा, “मैं चाचू बनूँगा।“

कहते हैं बहुत हँसने वालों को नियति ज़्यादा देर हँसने नहीं देती। और एक शाम ऐसी ही मूसलाधार बरसात के थमते ही “अभी आता हूँ” कहकर गए अमर का मृत शरीर लौटा। ट्रक ने कुचल दिया था। अमर के साथ एक भरे पूरे परिवार के अनगिनत सपने कुचले गए। सात माह का बच्चा माँ की कोख में ही अनाथ हो गया। तृष्णा बेसुध थी। वो मांग जिसे भरकर वो चलती फिरती गुड़िया से सुंदर सी सुहागन बन जाती, अब सूनी थी। माँ पापा पत्थर से हो गए थे और आदित्य एकदम शांत।

सब रस्में होने के बाद तृष्णा के माँ बाप अपनी बच्ची को लेने आ गए।

“अमर के बाद इस निशानी को भी उसके माता पिता से दूर करने का पाप मैं नहीं करूँगी।” तृष्णा ने दृढ़ता से कहा था।

बात पर बात बढ़ती गई और तृष्णा की माँ बोल पड़ी, “कल को आदित्य के ब्याह के बाद तेरा यहाँ कुछ नहीं रहेगा। अपना भविष्य और बच्चे का भविष्य भी तो देख, चाचा ताऊ कब तक सगे होते हैं  “

“आदित्य चाचा नहीं, इस बच्चे का पिता होगा। तृष्णा मेरी बहू ही रहेगी।”, अमर की माँ ने मज़बूत शब्दों में अपनी बात रख दी।

बच्चे के जन्म के बाद विवाह की तारीख तय हुई।

अमर की डिट्टो कॉपी ही था अंकित। वही नाक, वही माथा, वही आँखे, बस रंग में माँ जैसा था – गोरा चिट्टा।

तय कार्यक्रम के अनुसार आदित्य की धूम धाम से बारात निकली। एक बार फिर त्रिशु उसी घर में वापस आ गयी, जहाँ वह पहले भी दुलहन बनकर आ चुकी थी। इस बार उस गुड़िया की मांग में भरा सिंदूर किसी और का नाम ले रहा था।

ज़ोर की एक फुहार आई, तृष्णा वापस लौट आई। रात के नौ बजने वाले थे। आदित्य लौटा नहीं, उसे थोड़ी चिंता सी हुईं। तीन साल बीत गए, उसे आदित्य की पत्नी का दर्ज़ा मिले पर आज तक आदित्य को वह पति रूप में स्वीकार नहीं कर पाई थी। उसे अब भी अमर के अलावा कुछ सूझता नहीं था।

माँ पापा आज ही बीमार चाचा जी से मिलने जयपुर गए थे। अपनी कार और ड्राइवर लेकर, अंकित दादा-दादी के बिना कभी नहीं रहता था, सो उसे भी ले गए। तृष्णा इसी साल से स्कूल में पढ़ाने जाने लगी थी। त्रैमासिक परीक्षा के कारण वह नहीं जा पाई।

अमर के जाने के बाद आदित्य पीजी करके इसी शहर में अपने दोस्त के साथ हॉस्पिटल चलाने लगा था। अब वह पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी लेकर चल रहा था। रोज़ तो वो नौ बजे तक आ जाता है या इमरजेंसी हो तो कॉल कर देता है पर आज??

बाहर बारिश ज़ोर पर थी। माँ पापा ने पहुँचने की सूचना दे दी थी पर आदित्य के ना आने से वो अब तक परेशान हो चुकी थी। खाना बनाकर इंतज़ार करते करते 11 बज चुके पर आदित्य नहीं लौटा। उसने हॉस्पिटल कॉल किया तो पता चला कि वो साढ़े नौ बजे ही घर जाने का बोलकर निकल चुका था। मात्र आधे घंटे से भी कम की दूरी है अस्पताल की।

वो अब तक आया क्यों नहीं?

तृष्णा के मन में आज पहली बार आदित्य को लेकर, उसकी सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता हुई थी। उसे याद है जब पिछले साल एक ही कमरे में दो अलग बिस्तरों पर सोते हुए एक रात आदित्य अपने पति होने के अधिकार से उसके पास आया था। तृष्णा ने आँखें बंद कर के करवट बदल ली थी, वह काँपने लगी थी।

आदित्य सॉरी बोलकर चला गया था। माँ पापा के सामने घर परिवार, अंकित की बातें दोनों ही कर लेते है पर एकांत में दोनों एक दूसरे की ओर पीठ करके या तो कोई काम करेंगे या गाना लगाकर सो जायेंगे। तृष्णा के सोने के बाद आदित्य गाने बंद कर सो जाता ।

मोबाइल भी स्विच्ड ऑफ था। आखिर कहाँ चला गया आदित्य। कहीं अमर की तरह आदित्य भी तो … उसे लगा कि उसके पैरों के नीचे से बलुई माटी खिसक सी रही है। जिस पेड़ की छाँव में वह सुरक्षित है, उस पेड़ को उसने कभी सींचा ही नहीं लेकिन अब उसके दूर होने की कल्पना मात्र से वह सिहर उठी। उसका मन आत्मग्लानि से भर गया। आखिर आदित्य को उसने पति होने के अधिकार से क्यों वंचित रखा?  उससे ब्याह करना उसका अपराध तो नहीं था।

वह एक योग्य बेटा है, उससे भी योग्य पिता है और एक आदर्श पति भी। उसकी इच्छा का मान आदित्य ने रखा लेकिन वह कैसी पत्नी है? तृष्णा को आदित्य के लिए आज जो अनुभूति हुई वह पहले कभी नहीं हुई या हुई भी हो तो वह जान नहीं पाई। उसने अमर की यादों से खुद को कभी स्वतंत्र किया ही नहीं और आज आदित्य के लिए सोच सोच कर वह परेशान थी।

वह लगभग सभी दोस्तों को कॉल कर चुकी थी। माँ पापा से कुछ कहकर तृष्णा उन्हें इस समय परेशान नहीं करना चाहती थी। बेचैन हो उसने स्कूटी लेकर बाहर जाने की हिम्मत जुटाई कि तभी डोर बेल बजी। दौड़ती हुई तृष्णा ने दरवाज़ा खोला और सामने आदित्य को सही सलामत देख उससे कसकर लिपट गई और पागलों की तरह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। खोने के दर्द से वह गुज़र चुकी थी, अब और नहीं। आदित्य हक्का बक्का सा सॉरी बोले जा रहा था।

“वो आपके पिता जी सीढ़ियों से फ़िसल गए थे। अस्पताल से निकलते ही कॉल आया तो मैं वहीं चला गया। कोई खास चोट नहीं है। फोन बंद हो गया था, इसलिए बता नहीं पाया। सॉरी … “

तृष्णा ने अपने होंठ आदि के होंठ पर रख उसकी बात बीच में ही काट दी।

भादो की मूसलाधार बारिश नए रिश्ते को सींचने आई थी।

लेखिका कहानियाँ, संस्मरण और कविताएँ लिखती हैं। इनकी कहानियाँ कभी मर्म उकेरती हैं, कभी इनसे मृदुल भावनाएँ टपकती है और कभी पलकें भिंगोने वाली करुणा। उनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखिका पेशे से शिक्षिका होते हुए भी एक कुशल गृहिणी हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *