मंडली

बेबसी

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होश में आने के बावजूद शिव में आँख तक खोलने की हिम्मत नहीं बची थी। तभी दहिने हाथ पर कुछ चुभा और उसने कुनमुना कर आह भरते हुए आँखें खोल दी। शिव के सामने गोरी सी अंग्रेज़न सफ़ेद यूनिफॉर्म पहने खड़ी थी – दूध से धुली छोटी नीली आँखें मानो रात के आकाश की सारी नीलिमा सोख बैठी हों, गुलाबी कमल की तरह कोमल होंठ, झक सफ़ेद दाँत, लंबी व सुराहीदार गर्दन पर भूरे बालों की लटें पिन लगे जूड़े से विद्रोह कर शैतानी कर रही थीं। पहली नज़र में शिव को वह प्यारी लगी थी। वह धीमे से मुस्कुरा दिया।

उसने पूछा, “आपको कैसा लग रहा है अब?” “जी! ठीक लग रहा है, पर मैं यहाँ?”

शिव के मन में सवालों के बादल उमड़ रहे थे कि तभी बुआ जी दरवाजें से आती दिख गईं। सिस्टर ट्रे लिए आगे बढ़ चुकी थी।

“अरे हमार बबुआ! पूरा सात दिन बाद आँख खुला है तुम्हारा। बरम बाबा ने सुन ली हमारी,गंगा मइया को चुनरी मिठाई चढ़ाएँगे,छठी माई का कोसी भरेंगे”, बुआ रोते हुए बोले जा रही थीं और शिव का माथा भी चूम रही थीं।

तकिए पर सिर टिकाए वह अतीत की यादों में खो गया… बलिया जिले से कई किलोमीटर दूर घाघरा के तट पर चाँदपुर दीयरा गाँव। बरसात में कई रातें बाँध पर ही गुजरती थीं। तीन बहनों का इकलौता भाई था कुशाग्रबुद्धि शिव। शिक्षक बाबू जी ने इकलौते बेटे के भविष्य को सँवारने के लिए उसे इंटर कॉलेज बलिया भेजा। सन १९४० के दौर में बागी बलिया में क्रांतिकारी गतिविधियाँ चरम पर थीं। जवानी को देश ने पुकारा और शिव जुड़ गए दल से। बाबूजी को भनक लगी और बबुआ को वापस बुला लिया गया। निःसंतान फुआ अपने दुलारे भतीजे को मुम्बई लेती आईं…पढ़ाने…

“योर इंजेक्शन टाइम…” सुबह वाली सिस्टर…धत्त सिस्टर नहीं “ओह” शिव की तंद्रा टूटी। जाने क्या था इस नर्स में जो उसे पहली नज़र में ही खींचें जा रहा था। “आपका नाम?”, वो ‘सिस्टर’ नहीं बोल सका। “रोज़ी” वो मुस्कुराकर आगे बढ़ गई।

दोनों की आँखें मिलीं … शिव ने कुछ तो अलग सा महसूस किया था और शायद रोज़ी ने भी … कम से कम शिव को ऐसा उसे लगा।

अगली सुबह आठ बजे रोज़ी को देखकर ही उसकी आँख खुली। फूफा जी जाने कब से बगल में बैठे थे। शिव चरण स्पर्श के लिए झुका कि स्वयं को संभाल न पाया, संतुलन बिगड़ा पर रोज़ी ने उसे झट संभाल लिया।

दिन काटना मुश्किल होता शिव के लिए जब तक रोज़ी न आती। शिव ने देखा कि वो कई बार आती जाती रहती थी वहाँ। शिव इस रास्ते नहीं जाना चाहता था पर जाने रोज़ी का सरल प्रेम चुंबक के समान उसे खींचे जा रहा था।

रात का दूसरा पहर, तेज़ शोर, लाठी, गोली, इंकलाब ज़िंदाबाद……और भीड़…फिर शोर …शिव पसीने से तरबतर उठ बैठा। सपना था, पर सच यही था, बाबू जी के चिठ्ठी तार और फूफा जी सलाह को दर किनार कर सन ४२ की आज़ादी वाली जंग कूद ही पड़ा वह और उसी कारण अस्पताल में पिछले १३ दिनों से बेसुध पड़ा था।

आज रोज़ी कुछ अलग सी लग रही थी। शिव ने उसे गौर से देखा जब वो उसके फूटे घुटने पर मलहम लगा रही थी। रोज़ी ने नज़रें ऊपर की तो शिव लजा ही गया। चोरी पकड़ी गई पर शिव ने अलग लगने का कारण खोज ही लिया। आज रोजी ने काजल और बिंदी जो लगाई थी।

गलत है ये… अपराध है…शिव ने नज़रें झुका लीं। रोज़ी इस तटस्थता को ताड़ चुकी थी, उदास आँखें बेबस हो आगे बढ़ गईं।

“कहीं प्यार तो नहीं है ये?” ख़ुद से सवाल शुरू थे। “ना..नहीं तो..वो अच्छी लगती है बस…”

उसने समझाया अपने मन को पर मन पर हर दलील हारे जा रही थी। ये तड़प, ये बेचैनी उसने कभी गौरी के लिए तो कभी नहीं महसूस की। उसे कोई हक़ नहीं कि वो रोज़ी को इस कदर याद करे जब यहाँ से कोसों दूर कोई उसके नाम का सिंदूर माँग में भरे उसका इंतजार कर रही है – गौरी….सीधी, सरल और गंगा सी पवित्र।

मात्र ११ बरस का था वो जब अम्मा ने कहा तेरा ब्याह होगा।

“अभी काहे अम्मा? हम पढ़ेंगे, बाबू जी के जइसे साइकिल पर सब्जी ना ला पाएँगे।” “अरे बबुआ! तोहरा कपड़ा, लत्ता, खाना-पीना के लिए मददगार लाएँगे। वो काम करेगी, तुम बस पढ़ना।”

आठ बरस की गौरी को उसने अपना काम करने वाली ही जाना, रौब से सब काम कराता। मईया के डर से वो सब करती। बस एक काम जो उसे पसंद ना था वो था शिव का लंगोट धोना। कितनी ही बार शिव ने उसे चोटी पकड़कर मारा था पर हर बार रोने पर उसे ही मईया से डाँट पड़ती।

दसवीं में गाँव के बड़े लड़कों से दोस्ती होने पर पहली बार उसने गौरी को अलग नज़रिए से देखा। दिन भर गौरी मईया के साये में रहती। दुपहरिया में वह घर के पीछे बने अहाते में गोबर पाथने जाती थी। शिव को यही मौका मिला था। दोनों हाथ गोबर सनी गौरी को पीछे से बाजुओं में बाँधते हुए झट से एक चुंबन जड़ दिया उसके गाल पर। हकबकाकर उसी गोबर वाले हाथ से एक तमाचा जड़ दिया था गौरी ने और भाग आई।

रो रोकर गौरी बीमार हो गयी। मईया की अनुभवी आँखें बात समझ गईं। चौदह बरस की कच्ची उम्र में तन-मन के घाव से बचाने के लिए बहुरिया को पति धर्म तो सिखाया ही पर बबुआ को अपने से दूर बलिया भेज दिया…पढ़ाई के नाम पर।

बंबई जाने से पहले शिव गाँव आया पर गौरी से नज़र नहीं मिला पा रहा था। एक रात छत पर बुआ का बिस्तर बिछाते हुए गौरी को मौका मिल गया। वह वहीं शिव का पैर पकड़ बैठ गई, “हमसे भूल हो गया था, आप पर हाथ उठा दिए। कब तक सज़ा देंगे?”

शिव ने उसे उठाकर सर पर हाथ फेरकर कहा, “गलत हम थे गौरी,माफ़ी हमको माँगनी चाहिए।” “आप पति हैं,अधिकार था आपका।” “ये है हमारा अधिकार” शिव ने उसकी माँग चूमकर धीमे से गले लगा लिया। वह लता की मानिंद लिपट कर रो पड़ी।

अगली सुबह शिव जा रहा था, दरवाज़े के ओट से गौरी देखती रही।

रात का जाने कौन सा पहर था। शिव का गला सूख गया,देखा पानी भी नहीं जग में। ओह…रोज़ी आज नहीं आई। वह धीमे कदमों से बाहर निकला पर आँखों के आगे अँधेरा छा गया। फिर खुद को पलंग पर पड़ा पाया। बगल में बैठी रोज़ी बोली, “आप गिर पड़े थे, अभी उठना नहीं है।”

रोजी ने फिर कहा, “मैं कुछ कहना चाहती हूँ।”

शिव चुप सा बैठा रहा। रोज़ी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहना शुरू किया,”यहाँ हर रोज़ मरीज़ आते हैं, जाते हैं पर ये कैसे हो गया, नहीं पता। आपके मन में क्या है, नहीं पता, पर मेरा मन जानता है कि इसे आपसे प्यार हो गया है। बताइए अब मैं क्या करूँ?”

नीली आँखों से पवित्र गंगा बह चुकी थी, निश्छल प्रेम के आँसू शिव की उँगलियों पर गिर रहे थे। रोज़ी ने उन गीली उँगलियों में अपनी तर्जनी उँगली फँसाया और बोली, “आज शाम तक आपको छुट्टी मिल जानी है,जवाब दे दीजिए।”

शिव का गला रूँध गया, उसने आँखें मूँद ली। उसे दरवाज़े से झाँकती गौरी की वो एक आँखें याद आ गयी। गला साफ़ करते हुए बोला,”रोज़ी! मेरा सौभाग्य है तुम्हारा प्यार पाना पर कोई है जो मेरे नाम का सिंदूर माँग में भरे मेरा इंतज़ार कर रहा है।”

रोज़ी एक झटके से उठी और दौड़ती हुई आँखों से ओझल हो गई, शिव की आँखों के कोर सुलगते आँसुओं से गरम हो रहे थे।

शाम को फुआ-फूफा उसे लेने आए पर शिव की नज़र रोज़ी को ढूँढ रही थी। गाड़ी में बैठने तक वह नहीं दिखी। फुफा ने गाड़ी स्टार्ट किया, तभी रोजी आती दिखी। गाड़ी बढ़ चली और शिव ने रोजी की बेबसी का एक शब्द महसूस किया, “शिव!”

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