मंडली

बे-कार: भाग-3

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… गतांक से आगे

“चालीस हज़ार किस बात के”, माड़साब अचंभित होकर उसे देख रहे थे। माड़साब से भी ज्यादा अचंभित वह हुआ, “अरे रजिस्ट्रेशन, स्टेट ट्रांसफर, इंश्योरेंस आदि का चार्ज तो आपको ही देना पड़ेगा ना।” माड़साब चिंतित हो गए। वे जब भी थोड़े से खुश होते, कोई न कोई समस्या आन खड़ी होती थी। सारे पैसे तो वे अस्पताल, थाने और होटल में खर्च कर चुके थे। अब तो उनके पास केवल इतने पैसे थे कि वे  वापस घर जा सकें।

“लेकिन इतने पैसे तो मेरे पास हैं ही नहीं”

“ये चार्ज तो आपको जमा करवाना ही होगा, वरना हम गाड़ी की डिलीवरी नहीं देंगे।”

“क्या डिलीवरी नहीं देंगे, डिलीवरी नहीं देंगे! जब भी कोई समस्या बताओ, आप घूम फिर कर उसी बात पर आ जाते हो। दो दिन में मुझ पर क्या बीती है, आप जानते हैं। मुझे कोई शौक नहीं है आप से बहस करने का पर मेरे पास सचमुच इतने पैसे नहीं हैं।”  माड़साब फट पड़े और अंत तक आते आते रुआँसे हो गए। आसपास के लोग उन्हीं की ओर देख रहे थे। माड़साब सकपकाकर वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गए। अब वह व्यक्ति भी कुछ ठंडा हो गया था। माड़साब ने अपनी दो दिन की पूरी आपबीती उसे सुनाई। पूरी बात सुनने के बाद उसके मन में माड़साब के लिए थोड़ी सद्भावना जागी।

“ठीक है मैं साहब से बात करता हूँ और देखता हूँ कि आपके लिए क्या किया जा सकता है।” वह उठकर चला गया और कुछ देर बाद लौटा । मैंने आपके लिए साहब से बहुत रिक्वेस्ट की और मैँ इतना कर पाया हूँ कि आपका इंश्योरेंस आप बाद में  कहीँ भी करवा सकते हैँ लेकिन रजिस्ट्रेशन और स्टेट ट्रांसफर का पैसा जो लगभग 30 हजार बनता है, वह तो आप को देना ही होगा क्योंकि वह आरटीओ के पास जमा होता है। और हाँ आपको हमें यह लिखकर देना होगा कि कार की घटनाओं-दुर्घटना की जिम्मेदारी आपकी रहेगी।”

“ठीक है। बहुत बहुत धन्यवादI” माड़साब के चेहरे पर वापस प्रसन्नता लौट आई उन्होंने पैसे जमा करवा दिए और लिखकर दे दिया कि जवाबदारी उनकी रहेगी। हालाँकि उनके अकाउंट में वह तीन लाख में से बचे रुपए पड़े थे जो उन्होंने कार के लिए बचाए थे। यह सारा खर्चा उसी में से हो रहा था I

“मगर सारे पैसे ही इन्हें दे देंगे तो फिर लॉटरी का मतलब ही क्या रहा”, माड़साब ने आज फिर अपनी वाक्पटुता से दस हजार बचा लिए थे। भले ही वह बाद में उन्हें इंश्योरेंस के लिए देने पड़ेंगे मगर इंश्योरेंस वह अपने मित्र रमेश जी से करवा लेंगे। कम से कम उन्हें कमीशन तो नहीं देना पड़ेगा कुछ तो बचत होगी। अपनी चतुराई का सिक्का माड़साब ने मुंबई में भी चला लिया था। माड़साब के हाथ में अब वाकई अपनी कार की चाबी थीI

‘अपनी कार’  वे भावुक हुए बिना ना रह सके। वे बार-बार अपनी कार की चाबी को निहार रहे थे। फिर उन्होंने कार पर प्यार से हाथ फेरा क्या-क्या नहीं सहना पड़ा उन्हें इस दिन के लिए। अनायास उन का ध्यान पिछवाड़े की टीस पर चला गया। लेकिन कार की गद्देदार सीट पर बैठते ही सारा दर्द काफूर  हो गया। कुछ समय बाद उनकी कार मुंबई की सड़कों पर दौड़ रही थी और माड़साब वापस अपने शहर की ओर लौट चले थेI बाबूलाल अच्छी ड्राइविंग कर रहा था।  माड़साब अगली सीट पर सिर टिकाये आँखें मूँदे बैठे थे।  A.C. की हवा उन्हें हिमालय से आती प्रतीत हो रही थी, मस्तिष्क में एक सात्विक शांति थी। जो चाहा वो पा लेने का गर्व था। हल्की शाम ढल रही थी तभी बाबूलाल ने माड़साब की तंद्रा तोड़ी, “अगर बुरा न मानो तो एक बात कहूँ माड़साब।”

“हाँ बोल भाई क्या बात है”, माड़साब ने अपनी सीट पर सीधे होते हुए कहा।

“वो जो कल आपने अंग्रेजी मंगाई थी वो आधी बची हुई है, अगर आप कहें तो एक गुलाबी-गुलाबी हो जाए”

“नहीं नहीं भाई। अभी तुझे रात भर गाड़ी चलानी है, बहुत रिस्की है।”

“इसीलिए तो कह रहा हूँ माड़साब जहाँ रिस्की है वहीं तो व्हिस्की है। हल्का हल्का लेने से ध्यान बना रहता है” उसने बात इस अंदाज से कही की माड़साब हँस पड़े I

“चल ठीक है, लेकिन सिर्फ एक पेग” बाबूलाल ने थोड़ी आगे जाकर साइड में गाड़ी रोक दी। दोनों ने एक-एक पैग लिया। फिर बाबूलाल के बहुत आग्रह पर एक-एक और लिया। बाबूलाल बोतल को डिक्की में  रखने के बहाने कार से बाहर उतरा और पीछे आकर देर सारी नीट गटका गया। फिर वापस आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। लगभग एक घंटे ड्राइविंग के बाद उसने नासिक से पहले खाना खाने के लिए रोड के साइड में बने एक ढाबे पर गाड़ी रोकी। गाड़ी उसने कुछ इस तरह से खड़ी की थी कि उसका मुँह ढाबे की ओर था और पिछला भाग रोड की ओर।

वे दोनों कार से उतरकर ढाबे पर आ गए। उनका मुँह ढाबे की ओर था। वे ढाबे वाले से बात कर ही रहे थे कि एक जोरदार धड़ाम की आवाज आई। दोनों ने पीछे पलट कर देखा तो दिखाई दिया कि उनकी कार पिछले हिस्से पर ट्रक की टक्कर से एक चक्कर गोल घूम रही थी। रोड से परे ढ़ाबे की ओर आकर रुक गई थी। दरअसल बाबूलाल ने कार का हैंड ब्रेक नहीं लगाया था। इसीलिए वह गुड़कती हुई रोड पर चली गई थी और ट्रक ने उसके पिछले हिस्से को टक्कर मार दी थी। ट्रकवाला न रुका और ना उसने पीछे पलटकर गाड़ी को देखा। वह ट्रक और तेज भगाकर ले गया। माड़साब पागलों की तरह दौड़ते हुए कार के पास पहुँचे। कार की हालत देखकर उनके आँसू निकल आए। कार के पीछे का पूरा हिस्सा डेमेज हो चुका था। माड़साब अपना आपा खोकर बाबूलाल को मारने दौड़े, “कमीने तूने हैंड ब्रेक क्यों नहीं लगाया?”

“मुझे क्या पता कि इसमें हैंड ब्रेक भी होता है। हमने ट्रैक्टर में तो कभी नहीं लगाया” बाबूलाल ने ना पचने लायक झूठ बोला। ढाबेवाला और लोग भी वहाँ इकट्ठे हो गए थे। लोगों ने उनके बीच बीच-बचाव किया, “भाई साहब इसकी क्या गलती है। ऐसा नौसीखिया ड्राइवर आप लेकर आए तो गलती आपकी है।”

“बाबूलाल इसका सारा खर्चा तुझे देना होगा गलती तेरी है”

“माड़साब मैँ आपके घर नहीं आया था कि मुझे कार लेने ले चलो। आपकी गरज थी तो आपने मुझे बुलाया था।”

उसके बाद काफी देर तक दोनों एक दूसरे की माँ-बहन को याद करते रहे। अंत में बाबूलाल ने कह दिया, “ठीक है अब मैं बस से चला जाता हूँ। आपकी गाड़ी आप ही ले आना।” माड़साब एकदम घबराए गये। फिर स्वर बदलकर बोले, “यार पूरे सफर में मैंने तुझे छोटे भाई जैसा रखा और तूने लास्ट में इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी। खैर, अब क्या हो सकता है। नासिक चलते हैं, वहीं इसे सुधरवायेंगे।” बाबूलाल को अन्य लोगों की मदद से समझा बुझाकर वे नासिक शोरुम पर ले आये। रास्ते में बाबूलाल ने उनसे कहा कि हमें थाने में एफआइआर कर देनी चाहिए। लेकिन थाने के नाम से माड़साब को लॉकअप याद आ गया। कहीं लेने के देने न पड़ जाए इसलिए उन्होंने पुलिस का नाम ही छोड़ दिया।

शोरुम वाले ने तीन चार घंटे का समय माँगा और गाड़ी ठीक करने में जुट गया। इतने समय में माड़साब ने घर पर बात की और बताया कि वे सकुशल सुबह तक घर पहुँच जाएंगे। कार ठीक होने पर वह वापस शोरुम पर पहुँचे। शोरुम वाले ने उन्हें कार का रिपेयरिंग बिल थमा दिया। बिल देखते ही बाबूलाल का हलक सूख गया फिर उसने बिल माड़साब को दिया तो उन्हें हार्ट अटैक ही आ गया – पूरे पैतालीस हजार आठ सौ पच्चीस रुपए का बिल था। माड़साब और बाबूलाल दोनों एक दूसरे का मुँह देख रहे थे

“इतना बिल कैसे हो गया भाई, ठीक से चार्ज लगाओ।”

“यह इसी कंपनी का ही शोरुम है साहब कोई ऐरा गैरा मैकेनिक शॉप थोड़ी है, सब ओरिजिनल रेट हैं।”

अब कुछ नहीं हो सकता था। बिल बन गया था तो देना ही था और वैसे भी गाड़ी को ऐसे तो घर ले जा नहीं सकते थे। माड़साब को इन्श्योरेन्स वाले बीस हज़ार रूपए याद आ गए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि इतनी जल्दी गाडी ठुक जायेगी और पैतालीस हज़ार का बिल बनेगा। माड़साब को गुस्सा बहुत आ रहा था। वे एटीएम पर पैसे लेने पहुँचे। वहाँ से बाहर निकलते हुए गेट को गुस्से से जोरदार धक्का दे दिया। “ओ साब, ज्यादा गुस्सा है तो घर बीवी को जाकर मारो यह बैंक प्रॉपर्टी है”, दरबान चिल्लाया I” माड़साब मुँह बनाते हुए आ गए, पैसे दिए और वहाँ से भी विदा हुए। बाबूलाल को हाथ जोड़ते हुए बोले, “अब ठीक से घर पहुंचा दे मेरे बाप। अब अगर कुछ हुआ तो मैँ झेल नहीं पाऊँगा और हाँ दारु का विचार भी दिमाग में मत लाना।” बाबूलाल हँसता हुआ गाड़ी चलाने लगा।

आखिरकार सबसे निपटकर माड़साब कार लेकर घर के दरवाजे पर सकुशल पहुँच गए। घर पहुँचते ही उन्होंने राहत की साँस ली। बीवी-बच्चे कार को देखने के लिए गेट पर ही खड़े थे। मगर कार का हुलिया देखते ही उनकी खुशी हवा हो गई। गाड़ी का कुछ जगह से कलर उतरा हुआ था। कुछ हल्के-हल्के डेंट भी दिखाई दे रहे थे।

जैसे ही माड़साब घर के बाहर गाड़ी से उतरे, उन्हें उनके जैसी ही एक और कार खड़ी दिखाई दी। फर्क बस इतना था कि वह लाल रंग की थी। उसमेँ से माड़साब के साढू भाई उतरे। उन्होने माड़साब को देखते ही कहा, “अरे क्या बात है शैलेश जी, आपने भी कार ले ली।” माड़साब ने  फीकी सी मुस्कान के साथ हामी भरी। “मैंने भी यही मॉडल लिया है 2003 का मॉडल है, अपने एक मिलने वाले ने सौदा कराया, 60 हजार में पड़ी। आपकी कितने में पड़ी?” इस प्रश्न ने  माड़साब को ऊपर से नीचे तक पूरा परेशानी में डाल दिया, उन्हें एक-एक कर अस्पताल, थाना, शोरुम ,होटल, एक्सीडेंट सब घटनायें याद आ गई। उन्होंने हिसाब लगाना शुरु किया – ऐसी ट्रेन के, हॉस्पिटल के, थाने के, शोरुम के, रिपेयरिंग के, पेट्रोल के और कुछ अन्य खर्चों के और अभी बीस हज़ार का इंश्योरेंस बाकी है। अतः ‘लगभग एक लाख साठ हजार पड़ी”  माड़साब के  मुँह से अनायास निकल गया।

“अरे यार, कितनी महँगी ले ली। मुझसे कह देते मैँ सस्ती दिलवा देता और गाड़ी की कंडीशन देख कर लग रहा है कि यह मेरे वाली से भी पुराना मॉडल है। खैर अब ले ली तो ले ली।”

उनकी बात सुन कर माड़साब चक्कर खाकर कार के बोनट पर ही बेहोश होकर गिर गए।

समाप्त

बे-कार भाग-1 का लिंकhttp://mandli.in/post/be-car-1

बे-कार भाग-2 का लिंकhttp://mandli.in/post/be-car-2

लेखक – @fictionhindi और आशीष सोनी

 

 

 

 

 

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